एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भूगर्भीय हलचलें अचानक बेहद तेज हो गई हैं, जिसके कारण दो बड़े पड़ोसी देशों में धरती हिल उठी है. मंगलवार, 16 जून 2026 को एक के बाद एक आए दो शक्तिशाली भूकंपों ने जापान और चीन को दहला दिया.
यूरोपियन-मेडिटेरेनियन सीस्मोलॉजिकल सेंटर (EMSC) के अनुसार, पहला बड़ा भूकंप जापान के होनशू द्वीप के पूर्वी तट के पास आया, जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.0 मापी गई है. इसके ठीक बाद चीन के किंगहाई प्रांत से भी आपदा की खबर आई, जहां चीनी भूकंप नेटवर्क केंद्र (CENC) के मुताबिक 6.1 तीव्रता का एक बेहद तेज भूकंप दर्ज किया गया. बैक-टू-बैक आए इन भूकंपों के बाद दोनों देशों की आपदा प्रबंधन एजेंसियां हाई-अलर्ट पर आ गई हैं. प्रभावित इलाकों में नुकसान का आकलन किया जा रहा है.
जापान में आए भूकंप का केंद्र होनशू के तटीय क्षेत्र में समुद्र के नीचे था, जिसके कारण तटीय शहरों में बहुमंजिला इमारतें और दफ्तर काफी देर तक तेजी से हिलते रहे. गनीमत यह रही कि इस भूकंप के तुरंत बाद प्रशांत महासागर में सूनामी की कोई बड़ी चेतावनी जारी नहीं की गई, जिससे तटीय इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों ने राहत की सांस ली.
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दूसरी ओर, चीन के उत्तरी किंगहाई प्रांत में आया भूकंप जमीनी हिस्से में था, जिसका केंद्र सतह से लगभग 35 किलोमीटर की गहराई पर दर्ज किया गया. पहाड़ी और सुदूर इलाका होने के बावजूद इस भूकंप के झटके इतने तीव्र थे कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हड़कंप मच गया और लोग डर के मारे अपने घरों से बाहर निकल आए.
जापान के होनशू में 6.0 की तीव्रता: रिंग ऑफ फायर का साया
जापान का होनशू क्षेत्र देश का सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है, जहां राजधानी टोक्यो भी स्थित है. इस द्वीप के पूर्वी तट पर आए 6.0 तीव्रता के भूकंप ने एक बार फिर जापान की भौगोलिक संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है.
भूकंप वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रशांत प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच होने वाली रस्साकशी के कारण इस क्षेत्र में अक्सर ऐसे शक्तिशाली झटके लगते रहते हैं. चूंकि जापान पूरी तरह से पैसिफिक 'रिंग ऑफ फायर' पर स्थित है, इसलिए यहां की इमारतें भूकंपरोधी तकनीक से बनाई जाती हैं, जिसके कारण इतने बड़े झटके के बाद भी किसी बड़े बुनियादी ढांचे के ढहने या तत्काल जानमाल के भारी नुकसान की खबर नहीं आई है.
तटीय क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को अगले 48 घंटों तक सतर्क रहने की सलाह दी गई है, क्योंकि मुख्य झटके के बाद अक्सर शक्तिशाली आफ्टरशॉक्स आने का खतरा बना रहता है.
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स्थानीय प्रशासन ने बुलेट ट्रेनों और परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा प्रणालियों की तुरंत जांच शुरू कर दी है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित तकनीकी खराबी या शॉर्ट-सर्किट से होने वाले हादसों को रोका जा सके. समुद्र के भीतर आए इस झटके ने कुछ समय के लिए जहाजों के परिचालन को भी प्रभावित किया.
चीन के किंगहाई में 5 तीव्रता का झटका: जमीनी इलाकों में दहशत
जापान के समानांतर ही चीन के उत्तरी किंगहाई प्रांत में आए भूकंप ने चीनी प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. शुरुआत में सीएनसी (CENC) ने इसकी तीव्रता 5 के आसपास होने का अनुमान लगाया था, लेकिन अंतिम वैज्ञानिक विश्लेषण में इसकी तीव्रता 6.1 (प्रारंभिक रिपोर्टों में 6.3 तक) दर्ज की गई, जो कि एक बेहद खतरनाक और विनाशकारी श्रेणी का भूकंप माना जाता है.
किंगहाई प्रांत तिब्बती पठार के करीब स्थित है, जो टेक्टोनिकली बेहद सक्रिय है क्योंकि भारतीय टेक्टोनिक प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट को उत्तर की तरफ धकेल रही है, जिससे इस क्षेत्र के पहाड़ों और फॉल्ट लाइनों में भारी तनाव पैदा होता है.
भूकंप का केंद्र जमीन के अंदर 35 किलोमीटर की गहराई पर होने के कारण इसके झटकों का दायरा काफी बड़ा था. झटके महसूस होते ही स्थानीय गांवों में मिट्टी और ईंटों से बने कुछ पुराने घरों की दीवारों में दरारें आने की खबरें मिली हैं.
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चीनी सरकार ने प्रभावित काउंटी में तुरंत स्थानीय राहत और बचाव दलों को रवाना कर दिया है. पहाड़ी रास्ता होने के कारण भूस्खलन की आशंका को देखते हुए सड़कों को साफ रखने के निर्देश दिए गए हैं. कड़ाके की ठंड और सुदूर इलाका होने के कारण प्रशासन टेंट, कंबल और आपातकालीन चिकित्सा सामग्री का बैकअप तैयार कर रहा है.
वैश्विक टेक्टोनिक प्लेटों में बढ़ती हलचल और सुरक्षा की चुनौती
एक ही दिन के भीतर एशिया के दो प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक केंद्रों में 6 या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप आना इस बात का साफ संकेत है कि पृथ्वी के भीतर मौजूद टेक्टोनिक प्लेटों में इस समय बड़े पैमाने पर ऊर्जा रिलीज हो रहा है.
फिलीपींस और इंडोनेशिया में आए विनाशकारी भूकंपों के बाद अब जापान और चीन में सक्रिय हुई ये फॉल्ट लाइनें वैश्विक भू-वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बन गई हैं. दोनों ही देशों के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती पहाड़ों में फंसे सुदूर समुदायों तक समय पर संचार और सहायता बहाल करना है, क्योंकि ऐसे तीव्र भूकंपों के बाद बुनियादी ढांचे को पहुंचने वाली अंदरूनी क्षति का पता लगाने में कई दिनों का समय लग जाता है.
आजतक साइंस डेस्क