रिलायंस इडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी मंगलवार को असम को गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर पहुंचे. अनंत अंबानी ने मंदिर में खास पूजा-अर्चना की और इस दौरान वह भक्ति में लीन नजर आए. मंदिर में अनंत अंबानी की ओर से की गई पूजा और यहां की परंपराओं के अनुसार किए गए अनुष्ठान अब चर्चा का विषय बन रहे हैं. पूजा के दौरान अनंत ने मंदिर परिसर में कबूतर उड़ाए और बकरे छोड़े. इसी के बाद से मंदिर की इस खास परंपरा की चर्चा हो रही है.
तांत्रिक साधना का केंद्र है कामाख्या मंदिर
कामाख्या मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है और तांत्रिक साधना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. यहां देवी के यौनी स्वरूप की पूजा की जाती है जिसे सारे ब्रह्नांड के जन्म, जीवन का सोर्स माना जाता है. माता कामाख्या ही सारे जगत की माता हैं और इसी प्रतीक स्वरूप में इस मंदिर में देवी का रजपर्व मनाया जाता है, अंबुवाची उत्सव के नाम से जाना जाता है.
ये मंदिर तांत्रिक परंपरा का भी सिद्ध स्थान है. समय के साथ मंदिर में कई ऐसी लोक परंपराएं विकसित हुई हैं जो शास्त्रीय पूजा-पद्धति के साथ-साथ स्थानीय असमिया और जनजातीय मान्यताओं से भी प्रभावित हैं. इन्हीं परंपराओं में से एक है कबूतर उड़ाना और बकरा छोड़ना, जिन्हें लोक-आस्थाओं का हिस्सा माना जाता है.
यहां गौर करने वाली बात है कि इन परंपराओं का स्पष्ट जिक्र किसी शास्त्रीय ग्रंथ में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता, लेकिन ये परंपराएं प्रतीकवाद के तौर पर स्थानीय धार्मिक संस्कृति और श्रद्धालुओं की मान्यताओं से विकसित हुई प्रथाएं हैं. जिन्हें अब मंदिर परंपरा का हिस्सा माना जाता है.
मन्नत मांगने और पूरी होने पर उड़ाते हैं कबूतर
कामाख्या मंदिर में लोग मन्नत मांगने या पूरी होने पर कोई भेंट देने के रूप में यहां कबूतर उड़ाते हैं और बकरा छोड़ते हैं. इस तरह ये दोनों जीव देवी को ही अर्पित कर दिए जाते हैं, जिसे जीवित अर्पण या जीवित बलि कहते हैं. इस बलि में कोई खून नहीं बहता है, कोई कष्ट नहीं होता और हिंसा नहीं होती है. इसलिए कामाख्या मंदिर जो कई तांत्रिक परंपराओं और बलि का गढ़ है, वहां ऐसी अहिंसक बलि भी एक सच है.
कबूतर उड़ाकर विकार समर्पण का प्रतीकवाद और मानवता
कहते हैं कि कबूतर हमारे लालच, हमारे विकारों का प्रतीक है. हमारे घमंड के ऊंचे आसमान पर उड़ान भरता पक्षी है. कबूतर उड़ाकर अपने सभी विकार देवी को समर्पित कर दिए जाते हैं. एक लोककथा है कि किसी दंपती ने माता से संतान का आशीर्वाद मांगा और मनौती मानी. इसके बाद जब उस दंपती को संतान हुई तब वह अपनी मनौती पूरी होने के बाद मंदिर में कपोत बलि (कबूतर की बलि) देने आए. इस दौरान कबूतर के साथियों और उनके बच्चों की आवाज से पूरा परिसर गूंज उठा. यह देखकर दंपति का कलेजा भर आया और उनकी आंख से आंसू निकल आए.
इसके बाद उन्होंने कबूतर की बलि देने का विचार छोड़ दिया और उसे माता को समर्पित करते हुए ऐसे ही उड़ा दिया. इसके बाद से यह एक परंपरा बन गई, जहां लोग अभी भी कबूतर उड़ाते हैं. मान्यता है कि पक्षियों को आज़ाद करना पुण्य का कार्य है और इससे देवी की कृपा प्राप्त होती है. कुछ लोग इसे बंधनों, कष्टों या नकारात्मकता से मुक्ति का प्रतीक भी मानते हैं.
कबूतर से जुड़ी मान्यताएं
माना जाता है कि कबूतर आपके शरीर से सारी नेगेटिविटी और सारी बाधाएं, रोग आदि अपने साथ ले जाते हैं. किसी बीमार व्यक्ति के कमरे के बाहर कहीं कबूतर कुछ देर बैठे और फिर उड़ जाए तो ऐसा माना जाता है कि कबूतर उसका रोग उड़ाकर ले गया है.
सनातनी धार्मिक परंपराओं में कबूतर को कामदेव के साथ जुड़ा हुआ बताते हैं. कबूतर और कामदेव का संबंध प्रेम, संदेश और पौराणिक मान्यता से सामने आता है. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कबूतर को प्रेम और वासना के देवता कामदेव और उनकी पत्नी देवी रति का प्रिय पक्षी या वाहन (सवारी) माना गया है。
प्राचीन काल से ही कबूतरों का इस्तेमाल प्यार, लगाव और प्रेम पत्र एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए किया जाता रहा है。कामदेव भी प्रेमियों के बीच अपने संदेश भेजने के लिए कबूतरों का उपयोग करते थे。यह प्रतीकवाद केवल भारतीय संस्कृति तक ही सीमित नहीं है. प्राचीन ग्रीक और रोमन पौराणिक कथाओं में भी, प्रेम की देवी वीनस (या एफ़्रोडाइट) को सफेद कबूतरों के साथ जोड़ा जाता है, जो प्यार, प्रजनन और कामुकता का प्रतीक हैं。
वहीं कामाख्या मंदिर में बकरों की परंपरा भी ऐसी ही है. लेकिन कुछ श्रद्धालु बलि देने के बजाय बकरा देवी को समर्पित कर उसे जीवित छोड़ देते हैं. ऐसे बकरों को मंदिर परिसर या आसपास स्वतंत्र रूप से घूमते देखा जा सकता है. इसे देवी को अर्पण और पशु-जीवन की रक्षा, दोनों का प्रतीक माना जाता है. कई लोग मानते हैं कि मनोकामना पूरी होने पर बकरे को छोड़ना भी एक प्रकार का धार्मिक व्रत पूरा करना है.
विकास पोरवाल