28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमले की शुरुआत करते हुए अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और इजरायल ने ऑपरेशन रेजिंग लायन का ऐलान किया था. चार महीने बाद ईरान पर दोबारा हमले करते हुए ट्रंप ने अमेरिकी ‘फ्यूरी’ जारी रखी हुई है, लेकिन इजरायली ‘लायन’ पिंजरे में दिखाई पड़ रहा है. दुनिया में यह सवाल पूछा जा रहा है कि ईरान पर हो रहे ताजा अमेरिकी हमलों में इजरायल कहां है?
इस सवाल की तह तक जाने के लिए अमेरिका, इजरायल और ईरान का एक-दूसरे के प्रति रवैया और समीकरण को समझना होगा. और इसमें आ रहे बदलावों को भी. सीजफायर के लिए ईरान अपनी सरहद से हजारों किलोमीटर दूर बैठे अमेरिका से तो बात कर लेता है, लेकिन इजरायल के साथ दुश्मनी पर वह कोई समझौता नहीं करना चाहता. वहीं अमेरिका इस जंग की शुरुआत तो इजरायल के साथ मिलकर करता है, लेकिन सीजफायर में वह इजरायल को ही सबसे बड़ी अड़चन मानता है. यानी, दोनों ही पक्ष इजरायल को लेकर कंफर्टेबल नहीं हैं.
CNN ने इजरायली सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि अमेरिका अब नहीं चाहता कि इजरायल ईरान के खिलाफ किसी भी कार्रवाई में शामिल हो. जबकि, नेतान्याहू उत्सुक हैं ताजा स्ट्राइक्स में भूमिका निभाने के लिए. अमेरिका का मानना है कि इजरायल के कूदने से युद्ध का दायरा बहुत बढ़ जाएगा और फिर सीजफायर कराना नामुमकिन होगा. इतना ही नहीं, ईरानी हमलों से इजरायल को बचाने के लिए उस पर अतिरिक्त दबाव आएगा, और उसे अपने रिसोर्स को डायवर्ट करना पड़ेगा.
ब्रिटिश अखबार 'द टेलीग्राफ' के एक शो में 'इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी' की सीनियर रिसर्चर सिमा शाइन ने भी इसकी पुष्टि की है. ईरान-शिया एक्सिस पर रिसर्च प्रोग्राम की पूर्व डायरेक्टर शाइन का मानना है कि अमेरिका इस ईरान वॉर के अगले चरण को अपने तरीके से कंट्रोल करना चाहता है. वह एक तरफ ईरान पर हमले कर रहा है, तो दूसरी तरफ बैकचैनल से ईरानी लीडरशिप से बातचीत भी कर रहा है. अमेरिका को अच्छी तरह पता है कि उसे इस जंग को कब और कैसे रोकना है.
फिलहाल ईरान भी यह बात समझता है. इसीलिए वह खाड़ी के उन देशों पर हमले कर रहा है जहां अमेरिकी मिलिट्री बेस हैं. वह जानता है कि जैसे ही उसने इजरायल पर हमला किया, मामला हाथ से निकल जाएगा. असल में, यह नेतान्याहू या इजरायल की अपनी चाहत नहीं है, बल्कि अमेरिका और ईरान दोनों ने मिलकर सोची-समझी रणनीति के तहत इजरायल को इस जंग से दूर रखा हुआ है.
ईरान जंग के 5 चैप्टर: ऐसे बदलती गई इजरायल की भूमिका
चैप्टर 1: जब यूएस और इजरायल साथ-साथ थे
तकरीबन सौ दिन तक अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर भारी बमबारी की. उसके कई बड़े नेताओं को चुन-चुनकर मार गिराया और ईरान की नेवी व एयरफोर्स को तबाह कर दिया. लेकिन, इन सबके बीच 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का पेंच फंस गया.
ईरानी टोल वसूली और अमेरिकी घेराबंदी के बीच G7 देशों के सम्मेलन में डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक युद्धबंदी का MoU साइन कर लिया. दिलचस्प बात यह रही कि इस पूरी कवायद में इजरायल पर्दे के बाहर रखा गया. माना गया कि बेंजामिन नेतान्याहू ईरान के साथ किसी सुलह के पक्ष में नहीं हैं. ट्रंप ने इसकी परवाह किए बगैर पर्शियन गल्फ में अमन कायम होने का ऐलान कर दिया.
चैप्टर 2: अमेरिका की नेतान्याहू को नसीहतें
MoU साइन होने के बाद नेतान्याहू ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में ट्रंप को बधाई दी कि उनकी वजह से होर्मुज का संकट हल हो गया है. लेकिन दूसरी तरफ, उन्होंने लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बमबारी जारी रखी. यहीं से ईरान को अपना रंग दिखाने का बहाना मिल गया. ईरान समेत अरब देश इजरायल को सीजफायर उल्लंघन का दोषी ठहराने लगे.
इन बयानों के बीच इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर बेन गविर ने तल्ख टिप्पणी की- "अमरीकियों के प्रति पूरे सम्मान के साथ, इजरायल को पूरी दुनिया को यह साफ कर देना चाहिए कि हमारे बेटों का खून और हमारे नागरिकों की सुरक्षा सौदेबाजी की चीजें नहीं हैं. पूरा लेबनान जलना चाहिए."
इस बयान के बाद इजरायल और अमेरिका के बीच तनातनी शुरू हो गई. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो और वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने इजरायल को अमेरिका के साथ रिश्तों की इज्जत करने की नसीहत दी, लेकिन इजरायल लेबनान में अपनी कार्रवाई से पीछे नहीं हटा. और उधर, ईरान अमेरिका और इजरायल पर सीजफायर का उल्लंघन करने का आरोप लगाता रहा.
चैप्टर 3: ईरान का होर्मुज पर दावा
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धबंदी को लेकर जो MoU साइन हुआ था, उसकी भाषा में शुरू से ही गफलत थी. इसी बीच ईरान ने अचानक होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से दोबारा टोल वसूलने का ऐलान कर दिया. इससे दोनों देशों में फिर तनाव बढ़ गया.
इस आग में घी का काम किया अयातुल्ला अली खामनेई के जनाजे में लगे नारों ने, जहां 'revenge' (बदला) और 'Kill Trump' (ट्रंप को मारने) के नारे गूंजे. ईरान की लीडरशिप कई दिनों तक अमेरिका से बदला लेने की कसमें खाती रही. इन बयानबाजियों से अमेरिका में उबाल था ही कि इसी बीच ईरान ने पर्शियन गल्फ में कुछ जहाजों पर हमला कर दिया. जंग की आग एक बार फिर भड़क गई, लेकिन इस पूरे एपिसोड में इजरायल मूकदर्शक बना रहा.
चैप्टर 4: जंग की वापसी, लेकिन बिना इजरायल के
जिस दिन अली खामनेई को दफनाया जाना था, उसी सुबह अमेरिकी सेना ने युद्धबंदी का MoU कचरे के डिब्बे में डाल दिया. पर्शियन गल्फ से सटे ईरान के पोर्ट्स से लेकर उत्तर में मौजूद खामनेई के जन्मस्थान 'मशाद' तक भीषण बमबारी की गई.
पिछले एक हफ्ते से ईरान और अमेरिका के बीच सीधी जंग छिड़ी हुई है. यूएस सेंट्रल कमांड पर्शियन गल्फ में मौजूद ईरान की सारी ताकत को नष्ट करने पर आमादा है. दूसरी ओर, ईरान भी अपने तहखानों से मिसाइल और ड्रोन निकालकर कतर, बहरीन, सऊदी अरब, कुवैत और जॉर्डन जैसे अमेरिका के GCC सहयोगियों पर हमले कर रहा है. लेकिन ईरान जंग के इस नए चैप्टर में एक अनोखा समीकरण दिखा- ईरान का निशाना अब इजरायल पर बिल्कुल नहीं है.
चैप्टर 5: अब्राहम अकॉर्ड के दो साझेदार जंग से बाहर
पश्चिम एशिया में ईरान विरोधी एक्सिस के दो सबसे बड़े साझेदार हैं- इजरायल और यूएई, और ये दोनों ही अमेरिका के रणनीतिक पार्टनर्स हैं. 28 फरवरी 2026 को जब इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमले किए थे, तब पलटवार में ईरान का निशाना सबसे ज्यादा इजरायल और यूएई पर ही था.
लेकिन पिछले चार महीनों में इस इलाके की जियो-पॉलिटिक्स ने बड़ी करवट ली है. यूएई ने तेल निर्यातक अरब देशों के संगठन OPEC से खुद को अलग कर लिया है और सऊदी अरब व कतर जैसे देशों से उसकी तल्खी अब साफ दिख रही है. दूसरी तरफ इजरायल है, जिसने अमेरिका-ईरान MoU के बाद से खुद को सिर्फ लेबनान की चुनौतियों तक सीमित कर लिया है. दिलचस्प यह भी है कि युद्धबंदी का सम्मान न करने के लिए ट्रंप प्रशासन नेतान्याहू को इतने उलाहने दे चुका है कि अब उसके पास इजरायल से दोबारा युद्ध में शामिल होने के लिए कहने का नैतिक हक नहीं बचा है. और न ही वो ऐसा करना चाहता है.
धीरेंद्र राय