मक्का में तुर्किए, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ को ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है. तीनों देशों ने घोषणा की है कि किसी एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा और वे संयुक्त रूप से पलटवार करेंगे. नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना वाले तुर्किए, तेल संपदा और पवित्र स्थलों के संरक्षक सऊदी अरब तथा एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न मुस्लिम देश पाकिस्तान का यह गठबंधन कागजों पर प्रभावशाली लगता है.
क्षेत्रीय तनाव, खासकर ईरान से जुड़े संकट के बीच इसे सुन्नी मुसलमानों की धुरी मजबूत करने वाला कदम करार दिया जा रहा है. लेकिन वास्तविकता यह है कि यह समझौता शायद ही कभी सफल हो. जाहिर है कि यह प्रतीकात्मक बयानबाजी से आगे बढ़ पाएगा इसमें संदेह की गुंजाइश ज्यादा है.
सबसे बड़ा कारण तीनों देशों के परस्पर विरोधी राष्ट्रीय हित हैं. तुर्किए की महत्वाकांक्षा ऑटोमन विरासत को पुनर्जीवित करने, सीरिया, लीबिया और कॉकेशस में प्रभाव बढ़ाने की है. सऊदी अरब का फोकस खाड़ी सुरक्षा, तेल निर्यात और ईरान को रोकने पर है, वह अमेरिका के सुरक्षा छत्र पर निर्भर रहता है.
पाकिस्तान का मुख्य ध्यान भारत के साथ सीमा विवाद, अफगानिस्तान और आंतरिक सुरक्षा पर केंद्रित है. जाहिर है कि सभी के आपसी हित टकराएंगे.जैसे तुर्किए-ग्रीस तनाव या सऊदी की यमन नीति तो संयुक्त कार्रवाई असंभव हो जाएगी. कोई भी देश अपने मूल हितों की बलि नहीं चढ़ाएगा.
ऐतिहासिक अविश्वास और पुरानी रंजिशें भी इन देशों को आपस में मिलने नहीं देंगी. तुर्किए और सऊदी अरब के बीच मुस्लिम ब्रदरहुड, कतर संकट और सीरिया को लेकर गहरे मतभेद रहे हैं. एर्दोगन और मोहम्मद बिन सलमान के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे. पाकिस्तान भी दोनों के बीच संतुलन साधता रहा है. ऐसे गठबंधन में विश्वास की कमी इसे कमजोर बनाती है. अतीत के इस्लामी गठबंधनों में सैन्य पहल कभी सफल नहीं हो सके. क्योंकि सदस्य देश अपने संकीर्ण हितों से ऊपर नहीं उठ सके.
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तुर्किए की सेना नाटो मानकों पर आधारित है, सऊदी अरब मुख्य रूप से अमेरिकी हथियारों पर निर्भर है, जबकि पाकिस्तान के पास चीनी, अमेरिकी और स्वदेशी उपकरण हैं. परमाणु हथियारों वाला पाकिस्तान अपनी क्षमता को आसानी से साझा नहीं करेगा, क्योंकि इससे उसकी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित होगी. सऊदी अरब पाकिस्तान के परमाणु छत्र की चाहत रखता है, लेकिन इस्लामाबाद भारत जैसे खतरे के रहते हुए इसे विस्तार देने से जरूर हिचकेगा.
पाकिस्तान में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अशांति तथा सेना का अत्यधिक इस्तेमाल पाकिस्तान को विश्वसनीय साझेदार नहीं बनाते. सऊदी अरब भी अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है और किसी ऐसे संघर्ष में नहीं उलझना चाहेगा जो उसके तेल हितों को नुकसान पहुंचाए. तुर्किए अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए अकेला आगे बढ़ना पसंद करता रहा है. भू-राजनीतिक समस्याएं भी कम नहीं हैं. यह गठबंधन अमेरिका के सहयोगी देशों का है, लेकिन वाशिंगटन इसे पूरी तरह समर्थन दे या नियंत्रण में रखे, यह अभी तक अनिश्चित है. ईरान के खिलाफ एकजुटता दिखाने के बावजूद तीनों की रणनीति अलग-अलग है. सऊदी संयम चाहता है, तुर्किए स्वतंत्र रुख अपनाता है. मिडिल-ईस्ट के जटिल समीकरणों में इस समझौते की परिणति क्या होगा, इसके बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी ही होगा.
दुनिया में ऐसे अनेक रक्षा समझौते हुए हैं जो संयुक्त अभ्यासों और राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित रह गए हैं. किसी भी सैन्य गठबंधन की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब उसके किसी सदस्य पर संकट आता है तो बाकी सदस्य बिना किसी हिचकिचाहट के उसके लिए सैन्य जोखिम उठाने को तैयार हों.
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इतिहास भी यही सिखाता है कि केवल धार्मिक या सांस्कृतिक समानता स्थायी सामरिक गठबंधन की गारंटी नहीं होती. मुस्लिम देशों के संगठन, क्षेत्रीय मंच और अनेक साझा घोषणाएं दशकों से मौजूद हैं, लेकिन जब-जब किसी बड़े संकट की घड़ी आई, सदस्य देशों ने अक्सर अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लिए हैं. यमन, सीरिया, लीबिया और कतर संकट इसके उदाहरण हैं, जहां मुस्लिम दुनिया स्वयं कई खेमों में बंटी दिखाई दी.
इसका अर्थ यह नहीं कि यह नया रक्षा सहयोग पूरी तरह महत्वहीन है. रक्षा उद्योग, सैन्य प्रशिक्षण, खुफिया सहयोग और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों में इससे तीनों देशों को लाभ मिल सकता है. तुर्किए का रक्षा उद्योग तेजी से विकसित हुआ है, सऊदी अरब के पास वित्तीय संसाधन हैं और पाकिस्तान के पास सैन्य अनुभव तथा मानव संसाधन हैं. इन क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता.
संयम श्रीवास्तव