नई दिल्ली सीट पर क्यों हार गए अरविंद केजरीवाल, ये हैं 4 बड़े कारण और समीकरण

पिछले तीन चुनावों में अरविंद केजरीवाल को नई दिल्ली सीट पर 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिलते रहे हैं. जाहिर है कि उन्हें हराना इतना आसान भी नहीं था. फिर भी बीजेपी कैंडिडेट प्रवेश वर्मा ने उन्हें धूल चटा दिया. जाहिर है कि कांग्रेस कैंडिडेट संदीप दीक्षित भी उनकी हार के लिए एक अहम कारण थे. पर वह केवल एक कारण ही थे.

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अरविंद केजरीवाल और प्रवेश वर्मा अरविंद केजरीवाल और प्रवेश वर्मा

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 08 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 2:30 PM IST

दिल्ली विधानसभा चुनावों में इस बार नई दिल्ली विधानसभा सीट हॉट केक बना हुआ था. पिछले तीन चुनाव यहां पर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए बहुत आसान थे. पर बीजेपी ने इस बार उनके सामने अपना तुरूप का इक्का लगा दिया था. इसके साथ ही कांग्रेस ने भी आम आदमी पार्टी को हराने के लिए यहां से अपना हेवीवेट उम्मीदवार उतारा. बीजेपी से प्रवेश वर्मा जो पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह के बेटे थे, तो वहीं कांग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित कैंडिडेट थे. जाहिर है कि अरविंद केजरीवाल के लिए इस बार मैदान पहले जैस साफ नहीं था. फिर भी अरविंद केजरीवाल पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं आम आदमी पार्टी के वैचारिक तौर पर आधार भी हैं. उनकी नई दिल्ली सीट पर हारने का मतलब है कि जनता ने उनकी पार्टी को ही नहीं उनको भी नकार दिया है.पिछले तीनों चुनावों में उन्हें इस सीट पर 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले हैं. जाहिर है कि उन्हें हराना इतना आसान भी नहीं था.फिर भी बीजेपी कैंडिडेट प्रवेश वर्मा ने उन्हें धूल चटा दिया. आइये देखते हैं कि कौन से कारण रहे जिसके चलते नई दिल्ली सीट की जनता ने अरविंद केजरीवाल को नकार दिया.

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1-नई दिल्ली सीट पर मिडिल क्‍लास का बीजेपी को जबरदस्त सपोर्ट

नई दिल्ली सीट पर अधिकतर सरकारी कार्यालय हैं. कुछ झुग्गी बस्तियों और कॉलोनियों को छोड़कर अधिकतर इलाके पॉश हैं, जहां रईस रहते हैं या अपर मिडिल क्लास और मिडिल क्लास की आबादी है. सांसदों के सरकारी आवास भी इसी सीट के इलाके में आते हैं. यहां केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों के सरकारी क्वार्टर बड़ी तादाद में हैं. जाहिर है कि अधिकतर आबादी मिडिल क्लास की ही है. 

अपने पहले, दूसरे और तीसरे चुनाव में अरविंद केजरीवाल को सपोर्ट करने वालों में केवल झु्ग्गी वाले और गरीब लोगों ने ही सपोर्ट नहीं किया था. उन्हें हर विधानसभा चुनाव में 50 प्रतिशत से अधिक मिलने वाला वोट इस बात की तसदीक करता है कि उन्हें सभी वर्गों का प्यार मिल रहा था. पर दिल्ली में साफ सफाई की व्यवस्था, ओवरफ्लो होते सीवर, गंदे पानी की सप्लाई, यमुना नदी का सीवर बन जाना आदि इतना बढ़ गया कि लोगों को पूरी दिल्ली ही झुग्गी नजर आने लगी. दिल्ली में अधिकांश लोगों को मुफ्त की बिजली की कीमत पर महंगी बिजली मिल रही थी.नई दिल्ली सीट पर अधिकांश लोग मध्य वर्ग के ही हैं. उन्हें लगता था कि उनके साथ धोखा हो रहा है.

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लोकसभा चुनावों में नई दिल्ली लोकसभा सीट पर बीजेपी की बांसुरी स्वराज चुनाव जीती थीं. लेकिन नई दिल्ली, दिल्ली कैंट और आरके पुरम जैसी विधानसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी सोमनाथ भारती आगे थे. इन सीटों पर सरकारी कर्मचारी और पेंशनधारक बड़ी संख्या में रहते हैं. बीजेपी ने इसे देखते हुए ही आठवें वेतन आयोग के गठन का फैसला किया और साथ ही इनकम टैक्स स्लैब में बड़ा बदलाव भी काम आया.मध्य वर्ग को लगा कि बीजेपी ही उनकी असली पार्टी है.

2-झुग्गियों में रहने वालों को पक्के आवास का वादा

इस बार दिल्ली के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के प्रचार की शुरूआत पीएम नरेंद्र मोदी के गरीबों को पक्के आवास की चाभी सौंपकर शुरू की थी. भारतीय जनता पार्टी इस बार केजरीवाल के कोर वोटर्स झुग्गीवासियों के वोट को क्रैक करने की रणनीति पर बहुत पहले से ही काम कर रही थी. भारतीय जनता पार्टी ने जहां झुग्गी वहीं मकान देने का वादा किया है. बीजेपी ने झुग्गी बस्तियों में जाकर लोगों को समझाया कि किस तरह नरेंद्र मोदी की गरीबोनमुख योजनाओं को अरविंद केजरीवाल लागू नहीं होने दे रहे हैं. झुग्गियों में लोगों को बताया गया कि किस तरह झुग्गीवासियों के लिए कई जगह मकान बने हैं पर केजरीवाल के असहयोग के चलते आज तक गरोबों को बांटे नहीं जा सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपने हर भाषण में झुग्गी वासियों को मकान देने का वादा करते रहे.

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3-वाल्मीकि समुदाय के वोट भी बीजेपी को मिले

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुमानों के मुताबिक़ यहां वाल्मीकि मतदाताओं की तादाद 20,000 के क़रीब हो सकती है. ऐसा माना जाता है कि दिल्ली में वाल्मीकि वोट इस बार बीजेपी को बड़े पैमाने पर मिले हैं. वैसे भी दलित वोटर्स में जाटव वोट बीएसपी और कांग्रेस को मिलते रहे हैं. इस बार कुछ जाटव वोट कांग्रेस साथ भी गए हैं. संदीप दीक्षित को जो 4568 वोट मिले हैं उसमें अधिकतर जाटव और मुस्लिम वोट ही हैं.

4-और केजरीवाल की हार में पूर्णाहुति संदीप दीक्षित ने की

पूरी दिल्ली की तरह नई दिल्ली सीट पर कांग्रेस का वोट लगातार कम हो रहा है. पिछले चुनाव में कांग्रेस को यहां से सिर्फ चार प्रतिशत के आसपास ही मत मिले थे जबकि बीजेपी के हिस्से लगभग तैंतीस प्रतिशत मत आए थे.पर इस बार कांग्रेस ने संदीप दीक्षित को प्रत्याशी बनाया था. हालांकि संदीप दीक्षित से जितनी उम्मीद थी वो उतना वोट नहीं काट पाए. कांग्रेस से अलग होकर अरविंद केजरीवाल के चुनाव लड़ने की रणनीति थी कि दिल्ली सरकार ने नाराज लोगों के सामने बीजेपी के अलावा एक और विकल्प होगा तो आम आदमी पार्टी को फायदा होगा. संदीप दीक्षित को को इस बार केवल 4568 वोट मिले हैं.  जाहिर है कि अगर ये वोट अरविंद केजरीवाल को मिलते तो वो जीत जाते. अरविंद केजरीवाल को प्रवेश वर्मा से केवल 4089 वोट कम मिले हैं.यानि कि संदीप दीक्षित अगर नहीं होते तो अरविंद केजरीवाल नई दिल्ली सीट जीत गए होते.

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