सतलुज पार्ट 2... उस पार भी सिर्फ लाशें ही लाशें हैं

पंजाब में आतंकवाद के दौर की एक कहानी दिलजीत दोसांझ ने अपनी फिल्म सतलुज में कही है. ये दास्तान है पंजाब पुलिस की ज्यादती के चलते मारे गए लोगों और उनकी गुमनामी की. लेकिन, जिस तरह हर नदी के दो किनारे होते हैं, उसी तरह इस सतलुज का भी दूसरा किनारा है. जहां हजारों बेगुनाहों का खून बिखरा है. आतंकवादियों के शिकार लोगों की लाशें हैं.

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1980 और 90 के दशक में पंजाब ने सिर्फ खूनखराबा देखा, जिसके शिकार बेगुनाह ही हुए. 1980 और 90 के दशक में पंजाब ने सिर्फ खूनखराबा देखा, जिसके शिकार बेगुनाह ही हुए.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 09 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 6:49 AM IST

पंजाब में 440 किमी बहने वाली सतलुज नदी सूबे को दो हिस्सों में चीरती हुई गुजरती है. एक तरफ मालवा है, दूसरी तरफ दोआबा और माझा. लेकिन पंजाब के इतिहास में एक और ’सतलुज’ है. वह नक्शे पर नहीं, यादों में बहती है. उसके एक किनारे पर पुलिस की कथित ज्यादतियों की कहानी है, जिसे सिनेमा के पर्दे पर दिलजीत दोसांझ ने कहा है. दूसरे किनारे पर खालिस्तानी आतंकवाद के शिकार हजारों बेगुनाह लोग हैं. 

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दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' उस दौर के एक अहम और दर्दनाक पहलू को सामने लाती है. फिल्म यह सवाल उठाती है कि जिन लोगों को पुलिस ने कथित तौर पर फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया और जिनकी पहचान तक मिटा दी गई, क्या उनके परिवारों को इंसाफ नहीं मिलना चाहिए? यह सवाल पूरी तरह जायज है. जसवंत सिंह खालड़ा की लड़ाई भी इसी सवाल से शुरू होती है. उन्होंने उन लावारिस शवों का हिसाब मांगा जिन्हें कथित तौर पर पुलिस ने बिना पहचान के जला दिया. बाद में खुद उनका अपहरण हुआ और उनकी हत्या कर दी गई.

लेकिन क्या पंजाब की पूरी कहानी सिर्फ इतनी ही है? अगर नहीं, तो सतलुज के दूसरे किनारे पर क्या है?

इस सवाल का जवाब खुद ह्यूमन राइट्स वॉच की 1994 की रिपोर्ट देती है. यही रिपोर्ट पुलिस की ज्यादतियों की आलोचना भी करती है और उतनी ही मजबूती से यह भी दर्ज करती है कि 1981 से 1992 के बीच खालिस्तानी आतंकी संगठनों ने निहत्थे नागरिकों के खिलाफ सुनियोजित खूनखराबा किया. बाजारों, बसों, ट्रेनों, मंदिरों, गांवों और घरों तक को निशाना बनाया गया. और हजारों बेगुनाहों की जान ले ली.

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पंजाब की उपजाऊ जमीन पर 1980 और 90 के दशक में खूनखराबे की खरपतवार उगने की कहानी दुर्भाग्यपूर्ण है. दरअसल, पंजाब में अकाली दल और कांग्रेस की सियासी लड़ाई के बीच जरनैल सिंह भिंडरावाले का उभार हुआ. जो बाद में धार्मिक पहचान और सिख अस्मिता का चेहरा बन गया. पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद का सबसे अहम चैप्टर बना ऑपरेशन ब्लू स्टार, और सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का सिख बॉडीगार्ड द्वारा मारा जाना और फिर एंटी-सिख दंगे.

वो लॉ एंड आर्डर का मामला नहीं, वॉर थी

1981 से 1992 के बीच पंजाब आतंकवाद की आग में जलता रहा. इस दौरान खालिस्तान समर्थित दो धड़ों में बंटे छह आतंकी संगठन एक्टिव थे- 

1. खालिस्तान कमांडो फोर्स (पंजवार), बब्बर खालसा, खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (बुधिसिंहवाला) और 'भिंडरांवाले टाइगर फोर्स ऑफ खालिस्तान (संघा) नामक संगठन सबसे ताकतवर 'पंथिक कमेटी' से जुड़े हुए थे. इस कमेटी के मुखिया डॉक्टर सोहन सिंह थे. जिन्हें नवंबर 1993 में पकड़ा गया. 

2. भिंडरांवाले टाइगर फोर्स (मनोचहल) और खालिस्तान कमांडो फोर्स (राजस्थानी ग्रुप) उस पंथिक कमेटी का साथ दे रहे थे जिसके मुखिया गुरबचन सिंह मानोचाहल थे. वहीं, 'जफ़रवाल पंथिक कमेटी' को 'खालिस्तान कमांडो फोर्स (जफ़रवाल)' का समर्थन मिला हुआ था.

पंजाब में एक तरफ ये आतंकी संगठन थे, दूसरी तरफ पुलिस और सुरक्षा बल. इसी दौर में मानवाधिकार उल्लंघन भी हुए और आतंकवाद भी अपने सबसे क्रूर रूप में सामने आया.

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निशाना बना आम आदमी

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट बताती है कि आतंकी संगठनों ने सिर्फ पुलिस या सरकारी अधिकारियों को नहीं मारा. उन्होंने जानबूझकर निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाया. बाजारों में अंधाधुंध फायरिंग की गई, हिंदुओं को चुनकर मारा गया, सरकारी कर्मचारियों की हत्या हुई, पत्रकारों को धमकाया गया, पुलिस वालों के परिवारों तक को नहीं छोड़ा गया. यानी आतंक का मकसद सिर्फ हत्या नहीं था. मकसद था पूरे समाज में डर पैदा करना.

जैसे- मार्च 1992 में, AK-47 राइफलों से लैस चार सिख अलगाववादियों ने लुधियाना शहर में अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें बीस आम लोग मारे गए और कई अन्य घायल हो गए. बंदूकधारी पहले कार से शहर के विश्वकर्मा रिहायशी इलाके में गए और वहां के एक बाजार में दस लोगों को गोलियों से भून दिया. इसके बाद वे आगे बढ़े और दो मील लंबे रास्ते पर जो भी मिला उस पर गोलियां चलाते रहे, जिससे आठ और लोग मारे गए. उन्होंने एक मुख्य चौक पर दो और लोगों की जान ली और फिर वहां से भाग गए.

हिंदू होना अपराध बन गया

पंजाब में हजारों हिंदू परिवारों के लिए उस दौर में सिर्फ उनकी पहचान ही मौत की वजह बन गई. रिपोर्ट बताती है कि कई इलाकों में आतंकियों ने हिंदुओं को पंजाब छोड़ने की धमकी दी. अक्सर उन इलाकों में हमले होते थे जहां बड़ी संख्या में हिंदू रहते थे. मंदिरों को निशाना बनाया गया. 

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20 नवंबर 1990, शाम करीब 7:30 बजे, चेहरे पर शॉल लपेटे और AK47 राइफलों से लैस चार लोगों ने इस्लामाबाद के व्यस्त बाजार में गोलियां चलानी शुरू कर दीं. वे सड़क पर आगे बढ़ते गए और दुकानों के अंदर, दुकानदारों, ग्राहकों और आने-जाने वाले लोगों पर गोलियां बरसाते रहे. इस अटैक में 12 लोग मारे गए और कई घायल हुए. जब दिसंबर 1990 की शुरुआत में एशिया वॉच की टीम वहां गई, तो दुकानों की दीवारों, फर्श और बाहरी दीवारों पर गोलियों के निशान साफ दिख रहे थे. एक स्थानीय पत्रकार के अनुसार, इस हमले की जिम्मेदारी 'खालिस्तान कमांडो फोर्स' ने ली थी.

दिसंबर 1992, चंडीगढ़ जा रही एक सरकारी बस को 'खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट' के छह उग्रवादियों ने रोक लिया. उन्होंने हिंदू यात्रियों को सिखों से अलग खड़े होने को कहा. इसके बाद उन पर AK47 से सैकड़ों गोलियां चलाईं, जिससे 16 लोग मारे गए और 9 घायल हो गए. इससे पांच हफ्ते पहले भी इसी तरह के एक बस हमले में 25 हिंदू प्रवासी मजदूरों की जान गई थी.

15 जून 1991 (रात करीब 9:30 बजे), बंदूकधारियों ने लुधियाना के बाहर रुकीं दो ट्रेनों के अंदर गोलियां बरसा दीं, जिसमें कम से कम 75 यात्री मारे गए. यह एक सोची-समझी साजिश थी, क्योंकि दोनों ट्रेनों की इमरजेंसी चेन खींचकर उन्हें स्टेशन से करीब एक मील पहले ही रोक दिया गया था. जीवित बचे लोगों ने बताया कि एक ट्रेन में हिंदुओं की पहचान करके उन्हें गोली मारी गई. वहीं दूसरी ट्रेन में बिना देखे अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं, जिसमें हिंदुओं के साथ-साथ कई सिख भी मारे गए. हालांकि किसी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली, लेकिन माना जाता है कि यह हमला उन समूहों ने किया था जो 22 जून को होने वाले चुनावों के खिलाफ थे.

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यह सिर्फ हत्याएं नहीं थी. यह पूरी आबादी को डराकर पलायन कराने की रणनीति थी. और ऐसा हुआ भी.

नामधारी भी नहीं बचे

खालिस्तानी आतंकवाद सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं था. जो सिख उनकी विचारधारा से सहमत नहीं थे, वे भी निशाने पर थे. नामधारी समुदाय लंबे समय से अलग धार्मिक पहचान रखता है और उसने उग्रवाद का समर्थन नहीं किया. इसी वजह से उसके कई लोग आतंकियों के निशाने पर आए. पंजाब के उस दौर के अनेक दस्तावेज बताते हैं कि जो भी अलग सोच रखता था, उसके लिए 'गद्दार' का ठप्पा काफी था. ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट भी साफ कहती है कि सरकार का सहयोगी समझे जाने वाले सिखों और विरोध करने वालों की चुन-चुनकर हत्या की गई.

वोट देना, यानी अपनी मौत लिख लेना

उग्रवादियों ने 1991 और 1992 में पंजाब के चुनावों को रोकने के लिए हिंसा और धमकियों का सहारा लिया. 1991 में, भारत सरकार ने राज्य में विधानसभा चुनाव कराने का फैसला किया ताकि राष्ट्रपति शासन यानी दिल्ली का पांच साल का सीधा शासन खत्म हो सके. उग्रवादियों ने चुनावों के बहिष्कार का आदेश दिया. उनका कहना था कि वोट डालने से भारत का शासन सही साबित हो जाएगा और एक अलग देश बनाने की सिखों की कोशिशें कमजोर पड़ जाएंगी. इस दौरान भारी हिंसा हुई जिसमें 24 उम्मीदवारों की हत्या कर दी गई, जिसके कारण भारत सरकार को 1991 के चुनाव रद्द करने पड़े.

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अगले साल 19 फरवरी 1992 को फिर से चुनाव तय हुए. सिख उग्रवादियों ने एक बार फिर बहिष्कार की बात कही और हिंसा की धमकी दी. कुछ राजनीतिक दलों ने भी चुनावों से दूरी बना ली. आम दिनों के मुकाबले सिर्फ एक-चौथाई उम्मीदवार ही मैदान में उतरे और जो चुनाव लड़ रहे थे उन्हें अपनी जान का डर था. एक पत्रकार ने लिखा:

’उत्तरी राज्य पंजाब में चुनाव प्रचार पर निकलने वाले उम्मीदवार कंवलजीत सिंह के आसपास उनके समर्थकों से ज्यादा बॉडीगार्ड दिखाई देते हैं.’

उग्रवादियों ने राज्य के सभी 14,659 पोलिंग बूथों पर पहले पांच वोटरों को जान से मारने की कसम खाई थी. एक अखबार की रिपोर्ट में बताया गया:

‘22 साल के एक बेरोजगार युवक देविंदर सिंह ने बुधवार को खुद को मौत की सजा सुना दी. यानी उसने वोट डाल दिया. खुद सिख होने के नाते, जब उससे पूछा गया कि क्या उसे डर नहीं लगता, तो उसने कहा, 'यहां लोग बसों में सफर करते हुए मारे जाते हैं. बाजारों में रोज लोग मरते हैं. बाहर टहलते हुए भी लोग मारे जाते हैं. तो फिर मैं वोट देते हुए ही मर जाऊंगा.’

यह एक वाक्य उस पूरे दौर की तस्वीर बन जाता है.

पत्रकार भी टारगेट

सिख उग्रवादियों के निशाने पर पत्रकार भी थे. विशेष रूप से, 'ह्यूमन राइट्स वॉच/एशिया' ने बताया कि 'हिंद समाचार अखबार समूह’ उनका फेवरेट निशाना था. 1981 से फरवरी 1991 के बीच उग्रवादियों ने इस अखबार समूह से जुड़े 60 लोगों की हत्या की थी.

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22 नवंबर 1990 को, सिख पंथिक कमेटी ने प्रेस के लिए कुछ नियम जारी किए. इसके तहत सभी पत्रकारों को सिख अलगाववादियों को 'आतंकवादी', ’चरमपंथी’ या 'उग्रवादी' न कहकर 'मिलिटेंट', 'फ्रीडम फाइटर' या 'मुजाहिदीन' कहना जरूरी था, और पंजाब को 'खालिस्तान' लिखना था. उन्होंने धमकी दी कि बात न मानने पर ऐसी सजा दी जाएगी जो हमेशा याद रहेगी.

फरवरी 1991 में, जफरवाल पंथिक कमेटी ने एक और नियम जारी किया, जिसमें पत्रकारों को सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार करने और सरकारी सामग्री या उग्रवादियों के खिलाफ कोई भी भ्रामक खबर न छापने का आदेश दिया गया. चेतावनी दी गई कि बात न मानने वालों को मौत की सजा दी जा सकती है. सोहन सिंह पंथिक कमेटी ने भी ऐसा ही निर्देश जारी किया, जिसमें अंग्रेजी टाइपराइटर का इस्तेमाल करने वाले पत्रकारों, सरकारी कर्मचारियों और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों को सख्त सजा देने की धमकी दी गई थी.

पुलिसकर्मियों के निर्दोष परिवारों से बदला

वैसे तो पंजाब में कई तरह की पुलिस और सेना की टुकड़ियां काम कर रही थीं, लेकिन उग्रवादियों से मुकाबला करने में पंजाब पुलिस ही मुख्य सरकारी ताकत थी. अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, युद्ध या संघर्ष के दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हमला किया जा सकता है क्योंकि वे सीधे मुकाबले का हिस्सा होते हैं.

लेकिन, उग्रवादियों ने पुलिसकर्मियों के परिवारों को भी अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया, खासकर 1992 में. एक बड़े उग्रवादी नेता की मौत के बाद, उग्रवादियों ने पुलिस के परिवारों से बदला लेने का कैंपेन चलाया. इसमें बच्चों समेत दर्जनों लोग मारे गए. इस बदले का मकसद पुलिस का मनोबल तोड़ना और उग्रवादियों के खिलाफ मिली कामयाबी के अहसास को खत्म करना था. पुलिसकर्मी ड्यूटी पर हों या न हों, उनके बेकसूर परिवार के सदस्यों पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून का बहुत बड़ा उल्लंघन है.

लेकिन आतंकवाद किसी कानून को नहीं मानता. जरा सोचिए, जिस पुलिस वाले का बेटा या बेटी किसी स्कूल में पढ़ रहा हो, जिसका अपराध सिर्फ इतना हो कि उसके पिता पुलिस में हैं, क्या वह भी युद्ध का हिस्सा था?

सरकार समर्थक सिखों का कत्ल

यह कहना गलत होगा कि आतंकियों के टारगेट सिर्फ गैर-सिख ही थे. रिपोर्ट बताती है कि जिन सिख नेताओं ने समझौते की बात की, चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाई या सरकार के साथ काम किया, उन्हें भी मार दिया गया. 

पूर्व वित्त मंत्री बलवंत सिंह की हत्या कर दी गई क्योंकि उन्हें समझौते की राजनीति का चेहरा माना गया. मध्यममार्गी नेता मनींदर सिंह बिट्टा पर कार बम हमला हुआ. वे हमेशा के लिए अपाहिज बन गए. जगदेव सिंह तलवंडी पर जानलेवा हमला किया गया.

और शिकार बनी महिलाएं

इंडिया टुडे मैगजीन में छपी 1992 की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में आतंकवाद के दौर में महिलाओं को सेक्सुअल टेररिज्म का शिकार होना पड़ा था. उग्रवादियों ने बंदूक की नोंक पर कई युवा लड़कियों का अपहरण किया, उनके साथ बलात्कार किया और जबरन शादी की. रिपोर्ट में इसके कुछ मुख्य उदाहरण दिए गए हैं: 

मंजीत कौर का मामला- जून 1992 में 'खालिस्तान लिबरेशन फोर्स' (KLF) के उग्रवादियों ने तरनतारन से 18 वर्षीय मंजीत कौर का अपहरण किया, उसका यौन उत्पीड़न किया और बंदूक की नोंक पर एक गुरुद्वारे में जबरन शादी कर ली.

भूपिंदर कौर की त्रासदी- भूपिंदर कौर को उग्रवादियों द्वारा दो बार अलग-अलग मौकों पर बंदूक की नोंक पर जबरन शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे उनके तीन बच्चे हुए.

जसबीर कौर का संघर्ष- जनवरी 1991 में 'भिंडरांवाले टाइगर फोर्स ऑफ खालिस्तान' (BTFK) के उग्रवादियों ने जसबीर कौर के घर में घुसकर उनके साथ बलात्कार किया. बाद में सुरक्षा के लिए उन्होंने दूसरे गुट से मदद मांगी, तो वहां भी उन्हें बंधक बनाकर जबरन शादी और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा.

आतंकवादी इन शादियों का इस्तेमाल पुलिस की जांच से बचने और समाज में अपनी हरकतों को सही ठहराने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में करते थे. इस हिंसा ने महिलाओं को गहरे मानसिक सदमे, सामाजिक कलंक और अकेलेपन में ढकेल दिया.

मानवाधिकार संगठनों ने दर्ज किया कि आतंकवाद और जवाबी कार्रवाई, दोनों के बीच सबसे ज्यादा कीमत आम परिवारों ने चुकाई. महिलाओं का दर्द अक्सर आंकड़ों में दिखाई ही नहीं देता.

क्या सतलुज के सिर्फ एक किनारे की कहानी काफी है?

पुलिस की कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच होनी चाहिए. जसवंत सिंह खालड़ा को न्याय मिलना चाहिए. जिन परिवारों के लोग गायब हुए, उनकी पीड़ा को स्वीकार करना चाहिए.

लेकिन क्या इसके साथ उन हजारों परिवारों को भी याद नहीं किया जाना चाहिए जिनके पिता बस से उतारकर मार दिए गए? जिन बच्चों ने अपने पुलिस अधिकारी पिता के साथ मां को भी खो दिया? जिन पत्रकारों ने सिर्फ खबर लिखने की कीमत जान देकर चुकाई? जिन सिख नेताओं ने आतंकवाद का विरोध किया और मारे गए?

अगर एक कहानी सुनाई जाएगी और दूसरी छिपा दी जाएगी, तो इतिहास अधूरा रह जाएगा. 

सतलुज का हिसाब

पंजाब में पिछली सदी के आखिरी दो दशकों में सिर्फ खून बहता देखने वाली में अब साफ पानी बह रहा है. पंजाब आखिरकार आतंकवाद से बाहर निकल आया. यह जीत सिर्फ पुलिस की नहीं है. यह आम पंजाबी की जीत है. उस सिख की भी जिसने आतंकवाद का विरोध किया. उस हिंदू की भी जिसने डर के बावजूद घर नहीं छोड़ा. उस पत्रकार की भी जिसने सच लिखा. उस पुलिस वाले की भी जिसने जान दी. और उस मानवाधिकार कार्यकर्ता की भी जिसने कानून का सवाल उठाया.

सतलुज के दोनों किनारों पर दर्द है. एक तरफ बिना पहचान के जलाए गए शवों की राख है. दूसरी तरफ बसों, ट्रेनों, बाजारों, मंदिरों और घरों में बिखरा खून है.

सच्चा इतिहास वही होगा, जिसमें जसवंत सिंह खालड़ा भी होंगे और बस से उतारकर मारे गए हिंदू यात्रियों की कहानी भी. पुलिस की कथित ज्यादतियां भी होंगी और आतंकियों द्वारा मारे गए पुलिसकर्मियों के बच्चे भी. सरकार समर्थक सिख भी होंगे और आतंकवाद के खिलाफ खड़े पत्रकार भी. क्योंकि सच यह है कि सतलुज के इस किनारे पर लाशें हैं, तो उस किनारे पर भी सिर्फ लाशें ही लाशें हैं.

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