'सेकुलर पार्टियों' के ल‍िए क‍ितने काम के रह गए हैं आजम खान और नसीमुद्दीन जैसे नेता

देश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी को छोड़कर मुस्लिम नेताओं के प्रभाव और उनकी प्रासंगिकता सवालों के घेरे में आ चुकी है. उत्तर प्रदेश में आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं का प्रभाव काफी कम हो गया है - पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले हुमायूं कबीर को टीएमसी से निकाला जाना भी एक उदाहरण है.

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समाजवादी पार्टी के दो बड़े मुस्लिम चेहरे - आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी.  (Photo: ITG) समाजवादी पार्टी के दो बड़े मुस्लिम चेहरे - आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी. (Photo: ITG)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:00 AM IST

क्या देश में मुस्लिम राजनीति के अच्छे दिन जा चुके हैं? राष्ट्रीय स्तर पर तो ऐसा ही लगता है, क्षेत्रीय राजनीति थोड़ी अलग जरूर है. एक दौर था जब वोट किसे देना है, उसके लिए फतवा जारी होता था. फतवा भी किसी पार्टी विशेष के लिए मुस्लिम समुदाय में खास दखल रखने वाले नेता की बदौलत ही मुमकिन हो पाता था. 

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बिहार विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में भी मुस्लिम वोट का प्रभाव साफ देखा जा रहा है. पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी उत्तर प्रदेश में 2027 के लिए वैसी ही तैयारी कर रहे हैं. अखिलेश यादव के पीडीए में ए तो मुस्लिम वोटर के लिए ही है.

तमाम चुनौतियों से जूझते रहने के बावजूद ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल चुनाव में सबसे ज्यादा भरोसा मुस्लिम वोटर पर ही है. पश्चिम बंगाल में करीब 85 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने 291 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 47 पर मुस्लिम नेताओं को टिकट दिया है. 

चुनावों से पहले बाबरी मस्जिद के बहाने हुमायूं कबीर ने बंगाल में मुस्लिम राजनीति के लिए माहौल बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन अब तो मामला ठंडा ही लग रहा है. बंगाल में मुस्लिम वोट पाने के लिए हुमायूं कबीर को पहले असदुद्दीन ओवैसी बनना होगा. वैसे असदुद्दीन ओवैसी भी 2021 के बंगाल चुनाव में फेल रहे. बिहार चुनाव में तो 2020 की तरह असदुद्दीन ओवैसी 2025 में भी सफल रहे हैं.

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उत्तर प्रदेश की समाजवादी राजनीति में आजम खान का दबदबा धीरे धीरे कम होने के बाद, कांग्रेस से अखिलेश यादव के साथ आए नसीमुद्दीन सिद्दीकी खासे एक्टिव नजर आ रहे हैं - सवाल यह है कि क्या धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए ऐसे नेताओं की अहमियत बची है?

मुस्लिम वोटर पर नेताओं का कितना प्रभाव

2014 में बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से ही माहौल बदलना शुरू हो गया था. 2017 में यूपी में बीजेपी की सरकार, और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद चीजें और भी बदल गईं. अखिलेश यादव तो 2022 में भी चूक गए, लेकिन 34 मुस्लिम विधायकों के चुनकर आ जाने से समाजवादी पार्टी को तो नहीं, लेकिन आजम खान जैसे नेताओं की राजनीतिक सेहत पर काफी असर पड़ा. चुनावों में असर कम नजर आने लगा - आजमगढ़ उपचुनाव में धर्मेंद्र यादव की हार की वजह बनने वाले गुड्डू जमाली के बाद, अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी समाजवादी पार्टी में आ गए हैं. और, सक्रिय भी हो गए हैं. 

1. आजम खान: आजम खान का नाम समाजवादी पार्टी के ही एक नेता ने विवादों में ला दिया है. खबर आई थी कि मुरादाबाद के सपा नेता यूसुफ मलिक ने जेल जाकर आजम खान से मुलाकात की थी. और, आजम खान ने यूसुफ मलिक को मीडिया के जरिए मुस्लिम समुदाय तक अपना संदेश पहुंचाने को कहा था. संदेश था क ईरान-अमेरिका जंग को लेकर मुसलमान काले कपड़े पहनें और काली पट्टी बांध कर नमाज के बाद प्रदर्शन करें. 

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ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी को बयान जारी करके ऐसा न करने के लिए कहना पड़ा. मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने कहा कि ईद के दिन कोई भी काले कपड़े ना पहने. कोई प्रदर्शन न करे, बस ईरान की कामयाबी के लिए दुआ करे.

बाद में जांच के दौरान मालूम हुआ कि आजम खान ने उस दिन जेल में कोई मुलाकात नहीं की थी. अब रामपुर पुलिस ने भ्रामक और भड़काऊ संदेश फैलाने के आरोप में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. सपा नेता यूसुफ मलिक अपने तो फंसे ही, आजम खान को भी बिलावजह विवादों में ला दिया. 

जेल से आने के बाद आजम खान ने जिस तरह से मीडिया इंटरव्यू में अपना दर्द जाहिर किया था, निशाने पर तो अखिलेश यादव ही थे. आजम खान के राजनीतिक महत्व को देखते हुए, अखिलेश यादव भी फूंक फूंक कर कदम बढ़ा रहे हैं, लेकिन सब रस्मअदायगी ही लगती है. 

2. नसीमुद्दीन सिद्दीकी: एक जमाने में बीएसपी के कद्दावर नेता रहे, नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस होते हुए अब समाजवादी पार्टी में आ गए हैं. और, दावा कर रहे हैं कि अखिलेश यादव ही उनके नेता थे, नेता हैं और नेता रहेंगे. नसीमुद्दीन सिद्दीकी हाल फिलहाल मेरठ में एक्टिव नजर आ रहे हैं. बता रहे हैं कि अपना वजन उन्होंने कम जरूर किया है, लेकिन समाजवादी पार्टी का वजन बढ़ाना है. 

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नसीमुद्दीन सिद्दीकी 2027 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने का वैसे ही दावा कर रहे हैं, जैसे 2017 में बीएसपी नेता मायावती की सत्ता में वापसी के दावे कर रहे थे. या फिर, 2024 में कांग्रेस को लेकर. गुजरते वक्त और लगातार मिली चुनावी नाकामी के कारण नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कोई खास प्रभाव तो नहीं रह गया है, लेकिन समाजवादी पार्टी के पीडीए में नाम जुड़ने का कुछ फायदा तो हो ही सकता है. 

पहले बीएसपी के प्रभावी नेता होने के कारण हो सकता है, नसीमुद्दीन सिद्दीकी पश्चिम यूपी में बीएसपी की तरफ से मिलने वाली चुनौतियों को काउंटर करने में समाजवादी पार्टी के लिए कहीं कहीं मददगार साबित हों. जैसे गुड्डू जमाली के बीएसपी छोड़ देने के बाद आम चुनाव में आजमगढ़ सीट पर धर्मेंद्र यादव की राह आसान हो गई.  

3. हुमायूं कबीर: तृणमूल कांग्रेस से निकाल दिए जाने के बाद हुमायूं कबीर ने अपनी पार्टी बनाई है. जनता उन्नयन पार्टी. हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण को लेकर हाल में चर्चा में रहे. टीएमसी ने इसी वजह से उन्हें पार्टी से निकाल दिया था. अब हुमायूं कबीर की भरतपुर सीट से टीएमसी ने मुस्तफिजुर रहमान को उम्मीदवार बनाया है. 

लेकिन, हुमायूं कबीर भरतपुर में ममता बनर्जी को चैलेंज करने की जगह मुर्शिदाबाद की ही दो अन्य सीटों से चुनाव लड़ने जा रहे हैं. ये सीटें हैं, रेजिनगर और नाओदा. हुमायूं कबीर फिलहाल भरतपुर से ही विधायक हैं. हुमायूं कबीर ने पश्चिम बंगाल की 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, और 15 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी भी हो चुकी है - 4 मई को मालूम भी हो जाएगा कि हुमायूं कबीर को टीएमसी से बाहर कर देने से ममता बनर्जी को फायदा हुआ या नुकसान.

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4. बदरूद्दीन अजमल: असम के प्रभावशाली मुस्लिम नेता बदरुद्दीन अजमल 2009 से 2024 तक ढुबरी से लोकसभा सांसद रहे हैं. 2024 में कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने 10 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया था. हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले भूपेन बोरा ने रकीबुल हुसैन पर 2021 के असम विधानसभा चुनाव से पहले बदरुद्दीन अजमल के साथ चुनावी गठबंधन महाजोट के लिए भी जिम्मेदार ठहराया है, जिसे पिछले चुनाव में कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण माना गया था. चुनाव नतीजे आने के कुछ दिन बाद ही कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ बने महाजोट खत्म करने का ऐलान कर दिया था.

2021 के चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF ने असम विधानसभा में 16 सीटें जीती थी. लेकिन, 2024 का लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद प्रभाव कम होने लगा है. अपडेट यह है कि बदरुद्दीन अजमल अब असम विधानसभा चुनाव में अपना हाथ आजमाने का फैसला किया है. बदरुद्दीन अजमल असम के होजाई जिले की बिन्नाकांडी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने जा रहे हैं.  

5. असदुद्दीन ओवैसी: सत्ता की राजनीति में चुनावी जीत सबसे ज्यादा मायने रखती है. बदरुद्दीन अजमल कांग्रेस उम्मीदवार से बुरी हार के कारण अपना दबदबा गंवाने लगे हैं, वरना असम में उनका प्रभाव भी असदुद्दीन ओवैसी जैसा ही रहा है. 

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असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में लगातार दो विधानसभा चुनावों में 5-5 सीटें जीतकर अपना प्रभाव बरकरार रखा है. असदुद्दीन ओवैसी खुद हैदराबाद से पांचवीं बार सांसद हैं, और उनकी पार्टी AIMIM का तेलंगाना और बिहार के साथ साथ महाराष्ट्र में भी अपना काफी प्रभाव बनाए हुए हैं. और, बिहार चुनाव के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश का रुख करने से पहले बंगाल में हुमायूं कबीर के साथ 8 सीटों के लिए गठबंधन की भी घोषणा की है.

राजनीतिक दलों में मुस्लिम नेताओं की अहमियत

सिर्फ आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी का ही मामला भर नहीं है, कई राजनीतिक दलों में नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुमायूं कबीर इस बात के मिसाल हैं कि क्षेत्रीय दलों को मुस्लिम नेताओं की परवाह कितनी है. अगर हुमायूं कबीर असर होता तो क्या चुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी हुमायूं कबीर को इस तरह बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला लेतीं? 

राहुल गांधी बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे पर सीधा अटैक जरूर करते हैं, लेकिन सॉफ्ट हिंदुत्व जैसी तरकीब कांग्रेस की ही निकाली हुई है. मुस्लिम पार्टी के ठप्पे से बचने के लिए कांग्रेस अब पहले की तरह सख्त लहजे में बात नहीं करती. 2024 में राम मंदिर उद्घाटन समारोह को लेकर भी कांग्रेस नेतृत्व पसोपेश में था. खुलकर कांग्रेस का बयान तभी आया जब ममता बनर्जी ने समारोह का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया. 

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पहले तो कांग्रेस का लहजा भी थोड़ा सख्त ही था, लेकिन कुछ कांग्रेस नेताओं के अयोध्या जाने की बात करने पर राहुल गांधी नरम पड़ गए. और, राहुल गांधी को कहना पड़ा कि जो जाना चाहता है, उसके अयोध्या जाने पर कोई पाबंदी नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी अपने स्टैंड पर कायम रहेगी. 

समाजवादी पार्टी में भी पहले वाली बात नहीं रही. मुलायम सिंह यादव जब तक थे, तब तक अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने की याद जरूर दिलाते थे, लेकिन अखिलेश यादव के तेवर वैसे नहीं लगते. मुलायम सिंह यादव ने तो बलात्कार केस में मुस्लिम युवकों को सजा मिलने पर बोल दिया था, लड़के हैं. गलती हो गई, तो क्या फांसी पर चढ़ा दोगे?

अखिलेश यादव का रुख वाराणसी की एक घटना से समझा जा सकता है. गंगा में इफ्तार करने के आरोप में हुई गिरफ्तारी पर अखिलेश यादव का कहना था, उन लोगों ने पुलिस की हथेली पर ईदी नहीं रखी होगी. रख देते तो सब सही चलता. त्योहार कहीं भी मनाया जा सकता है, चाहे वह घर की छत हो या नाव - लेकिन अखिलेश यादव के बयान में वैसा टोन नहीं था, जैसा मुस्लिम युवकों के बचाव में मुलायम सिंह यादव की बातों में महसूस किया गया था.

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