जहरीला पानी, अनदेखी और सिस्टम की सुस्ती... इंदौर में 10 मौतों का जिम्मेदार कौन? भागीरथपुरा की दर्दनाक कहानी

इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में जो हुआ, वह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की खतरनाक लापरवाही की कहानी है. पीने का पानी जहर बन गया, कई लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग बीमार पड़ गए. महीनों तक गंदे पानी की शिकायतें होती रहीं, लेकिन किसी ने नहीं सुना. अब जब मौतें हो चुकी हैं, तो जांच, कार्रवाई और सियासत शुरू हो गई है. सवाल है कि देश के सबसे स्वच्छ शहर कहे जाने वाले इंदौर में आखिर यह त्रासदी कैसे हो गई और इसका जिम्मेदार कौन है?

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इंदौर के भागीरथपुरा की दर्दनाक कहानी. (Photo: Screengrab) इंदौर के भागीरथपुरा की दर्दनाक कहानी. (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • इंदौर,
  • 02 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:23 PM IST

इंदौर… वही शहर, जिसे पिछले आठ साल से देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता रहा है. वही इंदौर, जिसकी सफाई की मिसाल दी जाती है, जहां लोग गर्व से स्वच्छता की बातें करते हैं. लेकिन इसी शहर के भागीरथपुरा इलाके में बीते दिनों जो हुआ, उसने इस चमकते तमगे पर एक गहरा और बदनुमा दाग छोड़ दिया. यहां पानी सिर्फ गंदा नहीं था, पानी जहर बन चुका था. ऐसा जहर, जिसने कई जिंदगियां लील लीं और सैकड़ों लोगों को अस्पताल के बेड तक पहुंचा दिया.

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इस घटना के बाद मौतों की संख्या को लेकर मेयर, मंत्री और अफसरों के बयान सामने आए तो सबके आंकड़े अलग थे. मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बयान सामने आया. उन्होंने कहा कि 1400 लोग बीमार हुए, जिसमें से 200 लोग अस्पताल में भर्ती हैं. डेंजर जोन में कोई मरीज नहीं, सिर्फ एक पेशेंट वेंटीलेटर पर है.

उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि लोगों की जान बचाई जाए. उनकी सूची बना ली है, जिन्होंने अस्पताल में पैसे देकर इलाज कराया है, उन्हें पैसे वापस करेंगे. आधिकारिक मौत की पुष्टि 4 है, लेकिन मेरे पास 9 लोगों की मौत की जानकारी है. वहीं इंदौर के मेयर ने कहा है कि हमें जानकारी मिली है कि दूषित पानी से फैले डायरिया से अब तक दस लोगों की मौत हो चुकी है.

भागीरथपुरा की गलियों में पानी के दूषित होने की कहानियां हैं. कई घर अपनों को खोने के गम में डूबे हुए हैं. कहीं मां की मौत का मातम है, कहीं बेटी की, तो कहीं बच्चे की. सवाल सबके मन में एक ही है- आखिर हमारी गलती क्या थी? क्या सिर्फ इतना कि हमने वही पानी पिया, जो सरकार हमें पीने के लिए देती है?

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यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं है. यह कहानी लापरवाही, अनदेखी, सिस्टम की सुस्ती और जवाबदेही से बचने की कोशिशों की है. यह कहानी उन शिकायतों की है, जिन्हें महीनों तक अनसुना किया गया. यह कहानी उन लोगों की है, जिन्होंने बार-बार कहा- पानी गंदा आ रहा है, बदबू आ रही है, लेकिन किसी ने नहीं सुना.

जब पानी से उठी बदबू, नहीं जागा सिस्टम

भागीरथपुरा के लोगों के मुताबिक, यह सब अचानक नहीं हुआ. कई दिनों से घरों में जो पानी आ रहा था, उसमें बदबू थी. रंग बदला हुआ था. कई लोगों ने पानी उबालकर पीना शुरू कर दिया, तो कई मजबूरी में वही पानी इस्तेमाल करते रहे. शिकायतें पार्षद तक पहुंचीं, विधायक तक बात गई, लेकिन हुआ कुछ नहीं.

मगर ये परेशानी हल होने से पहले पानी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. इलाके में एक-एक कर लोग बीमार पड़ने लगे. उल्टी, दस्त, बुखार... शुरुआत में लोगों ने इसे सामान्य बीमारी समझा. लेकिन जब अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने लगी और मौतों की खबर आई, तो हड़कंप मच गया.

उर्मिला यादव की कहानी: एक घर, एक मौत और अनगिनत सवाल

उर्मिला यादव के घर में सन्नाटा है. बहू चंद्रकला यादव की आंखें सूखी हैं, चेहरे पर दर्द है. उन्होंने कहा कि 27 तारीख से उल्टी-दस्त शुरू हुआ. अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन 28 की सुबह मां ने दम तोड़ दिया. पानी बहुत दिनों से खराब आ रहा था. नर्मदा का पानी भी गंदा आ रहा था. यह दर्द सिर्फ उर्मिला यादव के परिवार का नहीं है. यही कहानी कई घरों में दोहराई गई.

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उर्मिला यादव की बेटी मीना पूछती हैं कि गंदा पानी बहुत दिन से आ रहा था. बदबू आती थी. भैया ने पार्षद से शिकायत की थी. यह सवाल सिर्फ मीना का नहीं है. यह सवाल पूरे भागीरथपुरा का है.

सीमा प्रजापति का घर: भरोसा टूटा, जिंदगी छिन गई

मृतक सीमा प्रजापति के भाई का दर्द भी कुछ ऐसा ही है. वे कहते हैं कि पार्षद को पानी को लेकर बताया था. कहा गया था कि सुधार करेंगे. लेकिन सुधार कुछ नहीं हुआ. और इसी कुछ नहीं हुआ की कीमत कई लोगों ने अपनी जान देकर चुकाई.

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जांच में जो सामने आया, उसने रोंगटे खड़े कर दिए. शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, इलाके में चल रही खुदाई के दौरान ड्रेनेज लाइन फूट गई. गंदा, टॉयलेट का पानी पीने की सप्लाई लाइन में मिल गया. दूसरी आशंका यह भी जताई गई कि पानी की टंकी दूषित हो गई थी. यानि जिस पानी को लोग रोज पी रहे थे, उसी में सीवेज मिला हुआ था. यही पानी धीरे-धीरे लोगों के शरीर में जहर बनकर उतरता गया.

लैब रिपोर्ट ने खोली पोल

बाद में लैब टेस्ट ने भी इस आशंका की पुष्टि कर दी. अधिकारियों ने बताया कि दूषित पानी के कारण डायरिया फैला और कम से कम चार मौतों की पुष्टि लैब रिपोर्ट में हुई है, जबकि कुल मौतों का आंकड़ा सात तक पहुंच चुका है. 1,400 से ज्यादा लोग प्रभावित बताए गए हैं.

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मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव प्रसाद हसानी ने कहा कि भागीरथपुरा इलाके में पाइपलाइन लीकेज की वजह से पानी दूषित हुआ. एक जगह पीने की मुख्य पाइपलाइन के ऊपर ही शौचालय बना हुआ पाया गया.

अस्पतालों में जंग: मरीज, ICU और जिंदगी की लड़ाई

  • हालात इतने गंभीर हो गए कि स्वास्थ्य विभाग को घर-घर सर्वे करना पड़ा. 1,714 घरों के सर्वे में 8,571 लोगों की जांच की गई.
  • 338 लोगों में उल्टी-दस्त के लक्षण मिले.
  • 272 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.
  • 201 मरीज अब भी अस्पताल में हैं.
  • 32 मरीज ICU में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं.

हर अस्पताल में एक जैसी कहानी... कमजोर शरीर, डिहाइड्रेशन, डरी हुई आंखें और बाहर खड़े परिजनों की बेचैनी. मौतों के बाद सियासत भी गर्मा गई. विपक्षी कांग्रेस ने मोहन यादव सरकार पर हमला बोल दिया. आरोप लगाया गया कि मौतों के आंकड़ों में हेरफेर किया जा रहा है. जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक FIR नहीं हुई. कांग्रेसियों ने आरोप लगाया कि सिर्फ तीन अधिकारियों का निलंबन इस बड़ी त्रासदी के लिए काफी नहीं है.

सरकार का जवाब: जांच, SOP और सख्त कार्रवाई का दावा

मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद इंदौर पहुंचे. अस्पतालों में मरीजों से मिले. सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया. अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय दुबे ने कहा कि पूरे इलाके की पाइपलाइन की जांच की जा रही है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पूरे राज्य में एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू की जाएगी.

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लेकिन सवाल हैं कि क्या मौतों के बाद जागना काफी है? अगर महीनों पहले शिकायतों पर ध्यान दिया जाता, तो क्या सात जिंदगियां बच सकती थीं? देश के सबसे स्वच्छ शहर में पीने का पानी इतना जहरीला कैसे हो गया? और सबसे बड़ा सवाल कि इस लापरवाही की कीमत कौन चुकाएगा? भागीरथपुरा की हर गली में गम है, हर आंख में आंसू हैं और हर दिल में गुस्सा. यहां पानी सिर्फ गंदा नहीं था, कई लोगों के लिए यह मौत बनकर आया था.

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(एजेंसी के इनपुट के साथ)

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