कॉमेडी कहानी : CORPORATE PROTEST

उस शहर में कोई आंदोलन, कोई प्रोटेस्ट, कोई नारेबाजी नहीं होती थी... न ही किसी मंत्री का इस्तीफा मांगा जाता था... क्योंकि उस शहर में दफ्तर बहुत थे... रात को लोग जल्दी सो जाते थे कि सुबह दफ्तर जाना है... हर आदमी अपने काम से काम रखता था.... सड़क पर चलता हर आदमी या तो दफ्तर से आ रहा होता था... या दफ्तर जा रहा होता था... न शहर के लोग गुस्से में कहीं जमा होते थे और न ही कोई अनशन करता था... वो बहुत शांत... खामोश... एक तरतीब में चलने वाला शहर था... इसलिए नहीं कि वहां सब कुछ ठीक था... इसलिए कि लोगों को आदत हो गयी थी इसी तरह जीने की... लेकिन एक दिन... सब कुछ बदल गया... शहर में कुछ ऐसा हुआ कि हज़ारों लाखों की भीड़ गुस्से में हुक्मरानों की तरफ... चली जा रही थी... उनके हाथों में झंडे थे और ज़बान पर एक मांग थी... क्या थी वो मांग... और वो क्या था जिसने पूरे शहर के लोगों को अचानक क्रांति करने पर मजबूर कर दिया... सुनते हैं कहानी

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • Noida ,
  • 27 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:58 PM IST

ये कहानी है उस शहर की जहां दफ़्तर बहुत थे. इस शहर में रहने वाले क्रांति, इंकलाब या रेवोल्यूशन जैसे लफ़्ज़ भूल चुके थे. पुरानी किताबों से वो पन्ने फाड़ दिये गए थे जिनमें ये लफ्ज़ हुआ करते थे. स्कूलों में नया निसाब लागू हो गया था. इस शहर में जीने वाले लोगों की ज़िंदगी के बस दो ही मकसद थे. एक था दफ़्तर जाना और दूसरा दफ़्तर से लौटना। सुबह-सुबह सड़क पर देखिए तो साफ-सुथरे कपड़े पहने, हाथों में बैग लटकाए लोग दफ्तर जा रहे होते थे. देखने में तरो-ताज़ा लेकिन अंदर से उदास, मायूस और थके हुए. इन लोगों की ज़िंदगी में कोई एक्साइटमेंट नहीं था, सिर्फ एक इंतज़ार था - इंतज़ार वीकेंड का. ये लोग बस वीकेंड के लिए जीते थे. और वाकेंड खत्म होते ही ये फिर वीकेंड के इंतज़ार में दफ्तर जाने लगते थे. ये लोग कुछ बदलना नहीं चाहते थे, बस इनकी ख्वाहिश इतनी ही थी कि ज़िंदगी जैसे चल रही है वैसे चलती रहे. दफ्तर से लौटकर आने के बाद रात को बीवी-बच्चे के साथ आइसक्रीम खाने जा सकें. EMI पर कार ले सकें और इतनी हिम्मत बनी रहे कि ये सोच सकें कि एक दिन हम भी इस शहर में घर खरीदेंगे, अपनी ज़िंदगीभर की कमाई किसी बिल्डर को देकर 90 साल के लिए एक मकान लेंगे. वो बस ज़िंदा रहना चाहते थे क्योंकि उनको बताया गया था कि इस शहर को 'शहर गुरु' बनाने के लिए शहर के हाकिम साहब बहुत मेहनत कर रहे हैं. शहर के हाकिम साहब बहुत मेहनती आदमी थे क्योंकि किसी ने उन्हें कभी खाली बैठे नहीं देखा था. वो कुछ न कुछ करते रहते थे. अख़बारों में रोज़ उनके बारे में बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ खबरें छपती थीं जिसमें बताया जाता था कि कल शहर में बढ़ती बेरोज़गारी की समस्या से लड़ने के लिए हाकिम साहब ने अपने कमरे में 35 कलाबाज़ियां खाईं. लोग पहले कन्फ्यूज़ होते थे कि बेरोज़गारी का कलाबाज़ी से क्या लेना देना, लेकिन फिर सोचते थे कि हाकिम साहब ने किया है तो कुछ सोच कर ही किया होगा. हाकिम साहब बहुत बढ़िया बोलते थे. उनकी तकरीर लिखने वाले मुलाज़िम तकरीर में कुछ पॉज़िटिव लफ्ज़ हमेशा लिखते थे - जैसे समर्पण, प्रतिबद्धता, पुरुषार्थ, निष्ठा, दृढ़ता, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता.... लोग जब गुस्से में होते थे तो तकरीर सुनकर सब्र कर लेते थे. इस शहर में सब कुछ ठीक तो नहीं था, लेकिन सब कुछ ठीक लगता था. पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि दफ़्तर जाने वाले लोगों में अचानक किसी बात को लेकर सुगबुगाहट हुई. कुछ लोगों ने नारेबाज़ी शुरु कर दी और देखते ही देखते शुरु हो गया CORPORATE PROTEST. क्या हुआ था शहर में, देखिए पूरा एपिसोड YOUTUBE पर स्टोरीबॉक्स में, लिंक नीचे दिया है

 

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