हम सभी ने फिल्मों में एक हीरो या फिर विलेन को यह कहते हुए जरूर सुना होगा कि औरत की 'ना' में 'हां' होती है. लेकिन वास्तव में यह फिल्मी लाइन महज एक डायलॉग ही है और असल जिंदगी में सहमति यानी कंसेंट का नियम बहुत सीधा और साफ है. जब कोई महिला 'ना' कहती है, तो वो किसी पहेली में बात नहीं कर रही होती बल्कि वो अपनी असहमति और सीमाएं स्पष्ट कर रही होती है.
किसी भी हेल्दी रिलेशनशिप, दोस्ती या सोशल बिहेवियर में सामने वाले की मर्जी और उसकी 'ना' का सम्मान करना बुनियादी शिष्टाचार है. इंडिया टुडे ने एक सर्वे कराया है ये जानना के लिए कि सहमति के इस सीधे नियम को समझने में अक्सर पुरुष क्यों चूक जाते हैं और क्यों 'नो मीन्स नो' को बिना किसी किंतु-परंतु के स्वीकार किया जाना चाहिए.
सर्वे में सामने आई ये चीज
सर्वे में यह भी बताया गया है कि सहमति सिर्फ एक बार कहा गया हां नहीं है बल्कि अपनी मर्जी से लगातार फैसले लेने की प्रक्रिया है. इसमें मना करने, अपनी इच्छा जाहिर करने और अपना फैसला बदलने का अधिकार शामिल है और अक्सर प्यार और नजदीकी रिश्तों में ही इन अधिकारों पर सबसे ज्यादा दबाव होता है, यानी प्यार, सम्मान और गिल्ट के कारण हां कहने का दबाव जिसमें हां कहने वाली की मर्जी वास्तव में नहीं होती है.
महिलाओं ने दिया ये जवाब
सर्व के दौरान बहुत बड़ी संख्या में 79 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं कि हर हाल में 'ना का मतलब ना' ही होता है. लेकिन सिर्फ 56 प्रतिशत महिलाओं ने ही यह स्वीकार किया कि वे किसी ऐसी चीज के लिए सीधे मना कर सकती हैं जो उन्हें नहीं चाहिए.
यानी 41 प्रतिशत महिलाएं बहाने बनाकर मना करती हैं या फिर न चाहते हुए भी मान जाती हैं. और सिर्फ 36 प्रतिशत महिलाएं साफ तौर पर कहती हैं कि दबाव में ली गई सहमति असल में सहमति नहीं होती जबकि ज्यादातर लोग दबाव में दी गई मंजूरी को भी सहमति ही मानते हैं.
इंडिया टुडे सर्वे के सवाल पसंद और दबाव के बीच की उस स्थिति को समझने की कोशिश करते हैं, जहां प्यार, उम्मीदें और अपराध-बोध (गिल्ट) के कारण फर्क करना मुश्किल हो जाता है. सर्वे के नतीजे एक ऐसे देश की तस्वीर दिखाते हैं जिसने सिद्धांत तो समझ लिया है, लेकिन उसे असल जिंदगी में लागू करने में संघर्ष कर रहा है.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क