राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर घमासान मचा हुआ है. एक तरफ जहां कांग्रेस इस गीत के दो छंद गाने पर ही अड़ी हुई है. वहीं बीजेपी ने इसे तुष्टिकरण से जोड़कर कांग्रेस पर राष्ट्रीय गीत के टुकड़े करने का आरोप लगाया है. पूरा मामला स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस ऑफिस में झंडोत्तोलन के दौरान पूरा वंदे मातरम् गीत बजने पर शुरू हुआ. जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने इस गीत के दो पैराग्राफ के बाद भी इसे गाते रहने पर आपत्ति जताई.
बीजेपी के नेताओं ने इस घटना को राष्ट्रीय गीत का अपमान बताया. खरगे और सोनिया गांधी की तरफ से गीत को रोकने का इशारा करने वाले वीडियो के वायरल होने के बाद ही विवाद गहराता चला गया. बीजेपी ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस को इस गीत से नफरत है और वो हमेशा से तुष्टिकरण की राजनीति करती आई.
इस पर कांग्रेस ने बैठक कर यह फैसला लिया कि कांग्रेस गीत के शुरुआती दो पैरा ही गाएगी. कांग्रेस की बैठक में 1937 में लिए गए पार्टी के स्टैंड के साथ ही रहने का फैसला किया. इस फैसले के मुताबिक, राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 6 छंद को कांग्रेस नहीं गाएगी. सिर्फ इसके शुरुआती दो छंद ही कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता गाएंगे. जबकि, केंद्र सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण संशोधन अधिनियम, 2026 लाया है. इसके तहत अब राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' का अपमान करने या इसके गायन में बाधा डालने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकता है.
वंदे मातरम को लेकर मचे बवाल के बीच यह सवाल बार- बार उठ रहा है कि आखिर इस गीत के 2 और पूरे 6 छंद को लेकर आखिर विवाद क्यों हैं? इस पूरे गीत को गाने में आखिर समस्या क्या आती है और इसका इतिहास क्या है? इसे समझने के लिए हमें यह जानना पड़ेगा कि इस गीत की रचना किस शख्सियत ने की थी, कब की थी, किन परिस्थितियों में की थी और इसका मकसद क्या था?
कैसे हुई इस गीत की रचना?
वंदे मातरम गीत की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी. उन्होंने इस गीत को अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित किया था. जब 1882 में आनंदमठ पब्लिश हुई तो यह सार्वजनिक और व्यापक रूप से सबके सामने आई. यहीं से यह गीत राष्ट्रवाद की भावना से जुड़ती चली गई. क्योंकि, आनंदमठ के जिस प्रसंग में इसका इस्तेमाल हुआ है, उसमें राष्ट्रभक्ति की भावना जोर-शोर से दिखाई गई है.
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के इस गीत से निकाल नारा - वंदे मातरम, लंबे समय से देशभक्तों और क्रांति का पॉपुलर नारा बन गया. इसे मातृभूमि के प्रति श्रद्धा के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा. धीरे- धीरे वंदे मातरम की व्यापकता ने अंग्रेजों को इतना परेशान किया कि उन्होंने इस गीत और नारे पर बैन लगा दिया.
आने वाले सालों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के कुछ सदस्यों सहित मुसलमानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. विरोध का कारण था - बंकिम चंद्र के काल्पनिक उपन्यास 'आनंद मठ' में इस नारे का इस्तेमाल. इसमें हिंदू सन्यासियों को बंगाल के मुस्लिम शासकों के खिलाफ विद्रोह करते हुए दिखाया गया है. तभी इस गीत और नारे का इस्तेमाल किया गया है.
सिर्फ 2 ही छंद क्यों अपनाया गया
विरोध के बावजूद जब देश को आजादी मिली. तब इस गीत के कुछ हिस्से को स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा के रूप में महत्व देते हुए सहेजा गया. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने वंदे मातरम को भारत का राष्ट्रीय गीत बनाने का फैसला लिया, लेकिन इसके सिर्फ शुरुआती 2 ही छंद को अपनाया गया.
अब तक तो ये समझ में आ ही गया होगा कि वंदे मातरम गीत कैसे ब्रिटिश राज के विरोध का प्रतीक बना और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया. फिर भी सवाल ये बना हुआ है कि आखिर इस गीत में ऐसा क्या था कि मुस्लिम लीग और कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने शुरुआत से इसका विरोध किया. इसके 6 छंद के बदले कांग्रेस ने सिर्फ 2 छंदों को ही मान्यता क्यों दी?
वास्तव में वंदे मातरम गीत आनंदमठ से भी पहले 7 नवंबर 1875 को बंगदर्शन पत्रिका में में छपी थी. तब वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद ही इस पत्रिका में प्राकशित हुए थे. फिर बाद में बंकिंम चंद्र ने इसे 6 छंदों तक विस्तारित किया और 1882 में इसे आनंद मठ में शामिल किया.
इस गीत के जड़ में ही छिपा था इसका विरोध
यह 1880 और 1882 के बीच बंकिम चंद्र की पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित हुई. इसे पहली बार 1886 के कांग्रेस अधिवेशन में हेम चंद्र बंद्योपाध्याय ने एक कोरस के रूप में गया. फिर जल्द ही पूरे देश ने इसकी लय को पहचान लिया. फिर 1896 में, रवींद्रनाथ टैगोर ने उस वर्ष के वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन में इसका पाठ किया. तब इस कविता की कोई आलोचना नहीं हुई. इसके सभी 6 छंद क्रांति के तराने थे.
बंगाल के स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अपना युद्धघोष बना लिया. यह पूरी कविता 1905 के स्वदेशी आंदोलन तक विद्रोह की धड़कन बन चुका था. अंग्रेजों ने बंगाल के कुछ क्षेत्रों में इस पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन जनता ने इसे और भी बुलंद स्वर में गाया.
मुस्लिमों में गीत से नाराजगी की ये है वजह
धीरे- धीरे इस कविता की लोकप्रियता और विस्तार ने विवादों को भी जन्म दिया. इस कविता के शुरुआती 2 छंदों के बाद के हिस्से में मातृभूमि की देवी की छवि ने मुसलमानों को अलग-थलग कर दिया. वहीं बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंद मठ में इस गीत को स्थान मिलने से मुसलमान भड़के थे. क्योंकि, आनंदमठ में इस गीत का इस्तेमाल उस हिस्से में किया गया था, जहां मुस्लिम जमींदारों के खिलाफ संन्यासी विद्रोह की बात की गई है. इस तरह यह गीत कम राष्ट्रवादी और अधिक सांप्रदायिक होता चला गया.
1923 में जब मोहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस की अध्यक्षता संभाली, तो वंदे मातरम गाए जाने के तुरंत बाद वे बैठक से बाहर चले गए. 1930 और 1940 के दशक में, मुस्लिम लीग ने गीत के प्रति अपना विरोध जारी रखा. कांग्रेस को मुस्लिम लीग के दबाव का सामना करना पड़ा और मामला चरम पर पहुंच गया. 1937 से पहले वंदे मातरम के 6 छंद गाए जाते थे.
कांग्रेस ने 1937 में वंदे मातरम को केवल पहले 2 छंदों तक सीमित करने का फैसला लिया. यह मुस्लिम नेताओं द्वारा उठाई गई आपत्तियों के जवाब में लिया गया निर्णय था. इतना ही नहीं, स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के अनुरोध पर इस संक्षिप्त संस्करण का समर्थन किया था.
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