राख से बर्तन मांजना. केले के पत्ते पर खाना खाना. घर में पुराने हो चुके कपड़ों का थैला बनाकर इस्तेमाल करना. मटके में पानी रखना. घर- आंगन की गोबर से लिपाई. ये सारी चीजें कभी भारतीय संस्कृति का हिस्सा थी. शहरीकरण के दौर में ये चीजें अब काफी पीछे छूट गई हैं.
शहरीकरण, एलपीजी, स्टील और नॉन-स्टिक बर्तनों, रेफ्रिजरेटर, प्लास्टिक और आधुनिक डिटर्जेंट के कारण इन पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल काफी घटा है. वैसे हाल के वर्षों में भारत में भी ऑर्गेनिक खेती, प्राकृतिक कंस्ट्रक्शन मटेरियल, कुल्हड़, मिट्टी के बर्तन और कपड़े के थैलों का इस्तेमाल फिर से बढ़ने लगा है. लेकिन, इसका इस्तेमाल अब भी न्यूनतम है.
हां, अब हमारी इन पुरानी लाइफस्टाइल को बाहर के देशों में फॉलो किया जाने लगा है. आज हम जिन चीजों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं. विदेशों में उनका ट्रेंड फिर से शुरू हो रहा है. आज दुनिया के अनेक देशों में सस्टेनेबल लिविंग और जीरो-वेस्ट रहन-सहन फिर से पॉपुलर हो रहे हैं.
चूल्हे की राख
पहले घर में चूल्हे पर खाना बनता था. उसमें लड़की और उपले का इस्तेमाल होता था. उससे बची राख कई सारे काम में इस्तेमाल होती थी. इसी से बर्तन साफ होता था. घर और आंगन में फूल और सब्जियों की क्यारियों में भी खाद के तौर पर इसका इस्तेमाल होता था. आज हम डिटर्जेंट और जेल का इस्तेमाल बर्तन धोने में करते हैं. गैस और इंडक्शन पर खाना बनाते हैं. घर- घर अब गाय-भैंस नहीं पाले जाते.
वहीं यूरोप और जापान में फिर से लकड़ी की राख से बर्तन की सफाई का ट्रेंड शुरू हो गया है. ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर 400 से 500 रुपये किलो की दर से राख मिल रही है. इसी तरह विदेशों में और भारत में भी ऑनलाइन उपले मिलने लगे हैं. अमेरिका में उपले के एक पैकेट की कीमत 2 से 3 डॉलर है. वहीं भारत में यह 30 से 50 रुपये किलो या पीस के हिसाब से भी मिलते हैं.
मिट्टी के घड़े और बर्तन
इसी तरह फ्रीज के आने से हमलोगों ने घड़े का इस्तेमाल बंद कर दिया. वहीं यूरोप और अमेरिकी देशों में इको फ्रेंडली बर्तन के रूप में फिर से मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल किए जा रहे हैं. स्पेन में मिट्टी के बने पारंपरिक घड़े को 'बोटिजो' कहा जाता है. आजकल वहां लोग फिल्टर और फ्रीज होने के बावजूद पानी रखने के लिए बोटिजो का इस्तेमाल कर रहे हैं.
मेक्सिको और लैटिन अमेरिका में भी घड़े का खूब इस्तेमाल हो रहा है. वहां इन्हें ओया और बुकारो कहा जाता है और ये पारंपरिक बर्तन फिर से इस्तेमाल में लौट रहे हैं. अमेरिका में एक घड़ा 150 से 490 डॉलर में ऑनलाइन मिल रहा है. यानी भारतीय रुपये में इसकी कीमत 12 हजार से 41 हजार रुपये है. भारत में भी टेराकोटा कुकिंग पॉट और घड़े 2000 से 6000 रुपये तक बिक रहे हैं.
केला के पत्ते
भारत में केले के पत्तों पर भोजन करना. केले के पत्तों से रैप करके अलग- अलग डिशेज बनाना, यहां की काफी पुरानी परंपरा थी. वैसे केले के पत्ते का भोजन बनाने और करने में इस्तेमाल, दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में एक पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है. फिर भी आज सिर्फ यह एक प्रतीक के तौर पर ही दिखाई देता है.
हालांकि, जापान, अमेरिका और दूसरे देशों में फिर केले के पत्तों में तरह- तरह के खाने और फूड आयटम परोसने और बनाने का ट्रेंड बढ़ा है. यही वजह है कि केले के पत्ते ऑनलाइन भी बिकने लगे हैं. जापान में सुशी को लग्जरी बनाने के लिए केले के पत्तों में बनाया और परोसा जाता है. जापान और अमेरिका जैसे देशों में एक पीस केला का पत्ता 20 से 25 रुपये में बिक रहा है.
गोबर- मिट्टी से लिपाई
किसी जमाने में भारत के गांवों में घर मिट्टी के बने होते थे. ऐसे घरों की लिपाई गोबर और मिट्टी से होती थी. इन घरों की जगह कंक्रीट से बने मकान ले रहे हैं. वहीं हाँ, पश्चिमी और अन्य विकसित देशों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता को लेकर कुछ ईको कंशियस आधुनिक लोग मिट्टी, भूसे और गोबर से प्राकृतिक निर्माण शैली के घर बनवा रहे हैं. ऐसा कर वो सस्टेनेबल और क्लाइमेट-फ्रेंडली घर बना रहे हैं. इनमें गोबर और मिट्टी से लिपाई की जाती है, जो एक नैचुरल थर्मल इंसुलेशन की तरह काम करता है.
भारत में कभी घरों की लिपाई पारंपरिक साफ-सफाई का हिस्सा थी. घरों को अक्सर साफ-सुथरा और पवित्र बनाने के लिए गोबर से लिपा जाता था. आज भारत सहित विदेशों में फिर से 'नैचुरल बिल्डिंग' और 'ईको फ्रेंडली' घर बनाने का दौर लौट रहा है. ऐसे में पारंपरिक निर्माण शैली और गोबर- मिट्टी से लिपाई का इस्तेमाल किया जा रहा है.
कपड़े के थैले
इसी तरह आज कपड़े के थैले का दौर भी लौट आया है. एक समय भारत के हर घर में पुराने कपड़ों से बने थैले होते थे. फिर पॉलीथीन से बने बैग का इस्तेमाल शुरू हो गया. प्लास्टिक और रैक्सिन से बने तरह-तरह के थैले ने कपड़े की होममेड झोले की जगह ले ली. अब एक बार फिर से कपड़े से बने थैले ट्रेंड में हैं. ऑनलाइन विदेशों में इनकी काफी डिमांड बढ़ गई है. विदेशों में यह 150 से शुरू होकर 2000 रुपये तक के मिल रहे हैं.
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ऐसी कई चीजों जो भारतीय परंपरा का हिस्सा थीं. आधुनिक युग में जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं. आज फिर से हमारे रोजमर्रा की जरूरतों का हिस्सा बनती जा रही है. खासकर भारत से बाहर विदेशों में इसकी खूब डिमांड हो रही है.
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