इन दिनों मिडिल-ईस्ट में हर पल हालात बदल रहे हैं. ईरान में लगी अमेरिका विरोधी आग अब इराक तक पहुंच चुकी है. पिछले महीने जब ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा इराक के शिया बहुल इलाके करबला और नजफ पहुंची तो लाखों की भीड़ उन्हें श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ी. इस शव यात्रा ने ईरान पर हुए अमेरिकी हमले के खिलाफ इराक की शिया आबादी की संवेदना को इसने कुरेदने का काम किया.
बगदाद का माहौल तेजी से बदल रहा है. क्योंकि, वहां ईरान से सिम्पैथी रखने वाले मिलिशिया ग्रुप बदला लेने पर उतारू हैं. इस आग को इराक पर हुए अमेरिका और सऊदी के संयुक्त हवाई हमले ने और हवा दे दी है. वहां की सरकार वैसे तो स्थिति को कंट्रोल करने की पूरी कोशिश करने का दावा कर रही है. फिर भी स्थिति बेकाबू होती नजर आ रही है. इराक की सड़कों पर दौड़ रहे सैन्य वाहन और ग्रीन जोन में तब्दील हो चुके यूएस एम्बेसी वाले इलाके वहां की पूरी कहानी बयां कर रही है.
बगदाद के हालात 1979 वाले तेहरान जैसी बनती जा रही है. जब वहां अमेरिकी एम्बेसी को कब्जे में लेकर एक कट्टरपंथी ग्रुप ने अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया था. आखिर, अचानक से बगदाद के हालात क्यों बदल रहे हैं. इसे समझने के लिए वहां चल रहे घटनाक्रम पर एक नजर डालना जरूरी है.
इराक पर हमले के बाद बगदाद में बिगड़े हैं हालात
29 जुलाई को इराक पर अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त रूप से हवाई हमला किया था. इस हमले ने अमेरिका के खिलाफ ईरान के प्रति संवेदना रखने वाले अलग- अलग इराकी शिया मिलिशिया ग्रुप के गुस्से को बढ़ा दिया. हालांकि, यह हमला पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF) के कई ठिकानों पर किया गया था. इसमें दर्जनों लोग मारे गए थे. मारे गए लोगों में 20 पीएमएफ के लड़ाके थे.
इस हमले को लेकर अमेरिकी और सऊदी रक्षा अधिकारियों ने कहा था कि यह कार्रवाई इराकी क्षेत्र से सऊदी ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाकर किए गए ड्रोन हमलों के खिलाफ की गई थी. वहीं इराक में इस्लामी रेजिस्टेंस ने इन छापों की निंदा करते हुए इसे इराक की संप्रभुता का उल्लंघन बताया था. इराक की सरकार ने भी इस हमले की निंदा की थी.
इस्लामी रेजिस्टेंस ने इराक में अमेरिका पर पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज के सदस्यों और पवित्र कर्बला में तीर्थयात्रियों की सेवा कर रहे एक काफिले को निशाना बनाने का आरोप लगाया है. वहीं समूह ने सऊदी सुविधाओं पर किसी भी हमले की जिम्मेदारी से भी इनकार किया.
इस हमले के बाद इस्लामिक रेजिस्टेंस, हिज्बुल्लाह,पीएमएफ और अन्य मिलिशिया गुटों में खलबली मच गई. इराक पर हुआ अमेरिकी-सऊदी हमला उस वक्त हुआ. जब इराक की सरकार अलग- अलग सशस्त्र गुटों से हथियार डालने और सेना में शामिल होने का अभियान चला रही थी. हमले के बाद इस्लामिक रेजिस्टेंस और दूसरे मिलिशिया गुटों से हथियार डालने की मांग कर रही सरकारी संस्थाओं को एक अल्टीमेटम दिया गया था.
सशस्त्र गुटों ने इराक की सरकार को दिया अल्टीमेटम
समूह ने सऊदी अरब पर अमेरिकी पॉलिसी के एक मशीनरी के रूप में काम करने का भी आरोप लगाया है. इराक में हुए हमलों का ऐतिहासिक रेफरेंस देते हुए आरोप लगाया कि रियाद का इस्तेमाल एक बार फिर अमेरिकी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है.
साथ ही यह भी सवाल उठाया गया कि अगर रेजिस्टेंस गुट अपने हथियार और मिसाइलें सरकार को सौंप देते हैं तो इराकी सरकार कैसे प्रतिक्रिया देगी. इसमें पूछा गया कि इराक की संप्रभुता और उसके क्षेत्र की रक्षा के लिए सरकार क्या ठोस कदम उठाएगी और क्या वह भविष्य के हमलों को रोकने और पीड़ितों की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाब देने में सक्षम होगी.
समूह ने कहा कि वह उन सरकारी संस्थाओं को, जिन्होंने रेजिस्टेंस गुटों से हथियार डालने की मांग की थी. 6 अगस्त तक की समय सीमा देगा. इसमें कहा गया है कि यह अवधि सरकार को यह प्रदर्शित करने का अवसर देगी कि वह हमलों के जवाब में क्या कार्रवाई करेगी और क्या वह इराक की रक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी को पूरा कर सकती है.
इराक गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा संकट का सामना कर रहा है. क्योंकि सभी हथियारों को राज्य के नियंत्रण तक सीमित करने की 30 सितंबर की समय सीमा नजदीक आ रही है. वैसे तो सराया अल-सलाम, असाइब अहल अल-हक और कटाइब अल-इमाम अली जैसे कई समूहों ने सरकारी सेना में मिल जाने पर सहमति व्यक्त की है, लेकिन कुछ शक्तिशाली शिया मिलिशिया गुटों का रुख अभी भी अलग रहने और अमेरिका से बदला लेने का है.
अब इराक में हालात एकदम तेजी से बदल रहे हैं. इराकी प्रधानमंत्री अली फलेह अल-जैदी, जो इराकी सेना के कमांडर-इन-चीफ भी हैं.उनके आदेश पर कल रात इराकी सुरक्षा बलों की एक बड़ी टुकड़ी को हाई अलर्ट पर रखा गया है. वहीं बदर संगठन के प्रमुख हादी अल-अमीरी ने सभी सशस्त्र समूहों से हाल ही में हुए अमेरिकी-सऊदी हमलों के खिलाफ अपनी जवाबी कार्रवाई को रोकने रिक्वेस्ट किया.
इराकी सुरक्षा मीडिया सेल ने घोषणा की कि सभी सुरक्षा और सैन्य बलों ने ट्रेनिंग अभ्यासों और मिलिट्री एक्टिविटी के जरिए युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है. यह लामबंदी इस्लामिक रेजिस्टेंस की तरफ से 7 अगस्त के अल्टीमेटम खत्म होने की वजह से हो रही है.
बगदाद के वायरल हो रहे फुटेज में वहां की सड़कों पर भारी हथियारों से लैस वाहनों की आवाजाही देखी जा रही है. अमेरिकी एम्बेसी के आसपास टैंक और भारी हथियारों से लैस वाहनों की तैनाती बढ़ रही है. इराकी सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ के प्रवक्ता सबाह अल-नुमान ने कहा कि मिलिशिया गुटों के साथ बातचीत जारी है और राज्य सुरक्षा तंत्र किसी भी एकतरफा सैन्य जवाबी कार्रवाई को रोकेगा.
इस बीच, सऊदी अरब, जॉर्डन और सीरिया ने इराक से होने वाले संभावित सीमा पार हमलों का मुकाबला करने के लिए अपनी सेनाओं को हाई अलर्ट पर रखा है. सूत्रों के अनुसार पड़ोसी देशों ने बगदाद को गैर-सरकारी मिलिशिया गुटों के किसी भी हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है.
इराक में बढ़ने लगी है सरगर्मी
वहीं ईरान समर्थित इराकी शिया मिलिशिया समूह और देश के सबसे अधिक हथियारों से लैस गुटों में से एक, कटाइब हिजबुल्लाह ने सरकार के जनादेश को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है. उसने और भी खतरनाक हथियार विकसित करने और लड़ाई की तैयारी तेज कर दी है.
बगदाद की सड़कों पर दौड़ रहे टैंक और अमेरिकी एम्बेसी के आसपास भारी सैन्य वाहनों का जमावड़ा. ऐसे दृश्य उस दौर की याद दिला रहे हैं, जब 1979 में इस्लामिक क्रांति के दौर में तेहरान में अमेरिका विरोधी गुस्सा उबाल पर था. उस वक्त भी ईरान के कई कट्टरपंथी और अमेरिका विरोधी आतंकी गुट कंट्रोल से बाहर हो गए थे. या फिर जानबूझकर उन्हें ढील दी गई थी. इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है. क्योंकि, तेहरान में स्थित अमेरिकी दूतावास को एक कट्टरपंथी छात्रों के समूह ने अपने कब्जे में ले लिया था. करीब 1 साल तक 52 अमेरिकी नागरिक को बंधक बनाकर रखा गया था.
इन दिनों बगदाद में कुछ ऐसे ही हालात बन रहे हैं. अमेरिकी-सऊदी हमले के बाद इराक में ईरान समर्थित शिया मिलिशिया और कई कट्टरपंथी ग्रुप बौखलाए हुए हैं. किसी भी समय अमेरिका से जुड़े किसी भी इन्फ्रास्ट्रक्चर और उनके सहयोगियों को निशाना बनाया जा सकता है. ऐसे में बगदाद स्थित यूएस एम्बेसी पर भी खतरा मंडराने लगा है. क्योंकि, इराक की सरकार और सेना उस हद तक स्टेबल नहीं है, जो मिलिशिया ग्रुप के कार्रवाई को कंट्रोल कर सके. अगर इराकी सरकार के हाथ से कंट्रोल फिसलता है तो हालात तेहरान होस्टेज क्राइसिस से भी बदतर हो सकते हैं.
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