जानें-कितना ताकतवर है महान दल, जिसे अखिलेश ने बनाया 2022 के लिए साथी

समाजावादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अब बड़े दलों के बजाय छोटे दलों के साथ हाथ मिलाने के फॉर्मूले को लेकर चल रहे हैं. इस कड़ी में सपा ने महानदल के साथ हाथ मिलाकर राजनीतिक समीकरण बनाने की कवायद की है. ऐसे में सवाल उठता है कि महान दल का अपना राजनीतिक वजूद क्या है और सूबे के किन क्षेत्रों और समुदाय के बीच राजनीतिक ग्राफ है, जिसके साथ मिलकर अखिलेश यादव सत्ता में वापसी करना चाहते हैं? 

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अखिलेश यादव और उनके बाएं काली सदरी में महान दल के केशव देव मौर्या अखिलेश यादव और उनके बाएं काली सदरी में महान दल के केशव देव मौर्या

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 23 सितंबर 2020,
  • अपडेटेड 11:53 AM IST
  • महान दल और सपा के साथ यूपी में गठबंधन
  • 2008 में केशव देव मौर्य ने महान दल बनाया
  • महान दल का जनाधार मौर्य, कुशवाहा समाज में

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भले ही अभी डेढ़ साल से भी ज्यादा का वक्त बाकी हो, लेकिन सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. ऐसे में समाजावादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अब बड़े दलों के बजाय छोटे दलों के साथ हाथ मिलाने के फॉर्मूले को लेकर चल रहे हैं. इस कड़ी में सपा ने महान दल के साथ हाथ मिलाकर राजनीतिक समीकरण बनाने की कवायद की है. ऐसे में सवाल उठता है कि महान दल का अपना राजनीतिक वजूद क्या है और सूबे के किन क्षेत्रों और समुदाय के बीच राजनीतिक ग्राफ है, जिसके साथ मिलकर अखिलेश यादव सत्ता में वापसी करना चाहते हैं? 

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केशव देव मौर्या ने बसपा छोड़कर 2008 में महान दल का गठन किया था, जिसके बाद से सूबे में अपने राजनीतिक वजूद को स्थापित करने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. यूपी में मौर्य समाज के लोग बौद्ध धर्म तेजी से अपना रहे हैं, क्योंकि ये सम्राट अशोक के वंशज मानते हैं. ये कुशवाहा, शाक्य, मौर्य, सैनी, कम्बोज, भगत, महतो, मुराव, भुजबल और गहलोत बिरादरी का समूह है. उत्तर प्रदेश में यह आबादी 6 फीसदी है, जो एक समय में बसपा का मजबूत वोटबैंक हुआ करता था. 

हालांकि, स्वामी प्रसाद मौर्या और बाबू सिंह कुशवाहा के पार्टी से बाहर होने के बाद इस समुदाय का बसपा से मोहभंग हुआ. केशव प्रसाद मौर्य और स्वामी प्रसाद मौर्य के चलते समुदाय बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा है. ऐसे में महान दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष केशव देव मौर्या सूबे के इन्हीं 6 फीसदी वोटों के बीच अपना आधार मजबूत करने की कवायद में है. महान दल सूबे के मौर्य समाज को प्रतिनिधित्व देने की नहीं बल्कि अपना राजनीतिक वजूद खड़ा करने की बात करता है. 

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केशव देव मौर्या अपनी रैली में एक ही बात कहते हैं कि समाज के लिए लड़ो, लड़ नहीं सकते तो लिखो, लिख नहीं सकते तो बोलो, बोल नहीं सकते तो साथ दो, साथ नहीं दे सकते तो जो लिख बोल और लड़ रहा है उसका सहयोग करो और अगर यह भी नहीं कर सकते हो तो उनका मनोबल न गिराओ जो आपके हिस्से की लड़ाई लड़ रहा है. यह सब कुछ ही समाज को उसका हक दिलाएगा. इस तरह से वो अपने समाज के लोगों के दिल में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, महान दल हर चुनाव में किसी न किसी दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही है, लेकिन अभी तक पार्टी का खाता नहीं खुल सका है. 

बता दें कि 2008 में वजूद में आए महान दल ने पहली बार 2009 लोकसभा में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ी थी. 2009 में प्रदेश की दो लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था. हालांकि, उस चुनाव में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था. इसके बाद 2014 में महान दल ने तीन लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी पार्टी को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. 2019 में फिर कांग्रेस के साथ मिलकर लड़े, लेकिन इस बार जीत नसीब नहीं हुई. 

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हालांकि, 2012 के विधानसभा में महान दल जीत नहीं सकी थी, लेकिन 20 सीटों पर प्रदर्शन काफी बेहतर रहा था. मुरादाबाद की ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट से महान दल के प्रत्याशी विजय कुमार 46 हजार 556 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे. बिजनौर के चांदपुर में अरविंद कुमार को 31 हजार 495 मत मिले थे. ऐसे ही नूरपुर के गौहर इकबाल को 32 हजार 141, नोगांव सादात से महमूद अली को 32 हजार 184, बहेड़ी से वैजंति बाला को 28 हजार, ददरौल से देवेंद्र पाल को 28 हजार, पटियाली से श्याम सुंदर सिंह को 28 हजार 181 और कांठ से महान दल के प्रत्याशी को 24 हजार वोट मिले थे. 

वहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव में महान दल ने 71 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिन्हें करीब साढ़े 6 लाख वोट मिले हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में महान दल के प्रदर्शन में 2012 की तुलना में गिरावट आई और सिर्फ चार विधानसभा कासगंज, मधुगढ़, अमांपुर और पटियाली में ही उनके प्रत्याशी को 10 हजार से ज्यादा वोट हासिल हुए थे. महान दल का जनाधार बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत, मुरादाबाद के इलाका में अच्छा खासा है. ऐसे में अब देखना है कि यादव और मौर्य मिलकर सूबे में क्या सियासी गुल खिलाते हैं? 

 

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