AMU विवाद पर पूर्व कुलपति बोले- राष्ट्र विरोधी नहीं हैं छात्र

कुलपति का यह बयान विश्वविद्यालय परिसर में जिन्ना की एक तस्वीर को लेकर उपजे विवाद के बीच आया है. पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय के छात्र संघ के कार्यालय में होने की वजह से विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी थी.

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थमा नहीं है AMU विवाद थमा नहीं है AMU विवाद

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2018,
  • अपडेटेड 9:05 AM IST

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का विवाद अभी थमा नहीं है, लगातार कई तरह के बयान सामने आ रहे हैं. इस बीच अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ( एएमयू ) के पूर्व कुलपति ( सेवानिवृत्त ) लेफ्टिनेंट जनरल जमीर उद्दीन शाह ने कहा कि इस विश्वविद्यालय के छात्र राष्ट्र विरोधी नहीं हैं और पाकिस्तान के समर्थन वाली भावना भी नहीं रखते हैं.

कुलपति का यह बयान विश्वविद्यालय परिसर में जिन्ना की एक तस्वीर को लेकर उपजे विवाद के बीच आया है. पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय के छात्र संघ के कार्यालय में होने की वजह से विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी थी. विश्वविद्यालय में भड़की हिंसा के चार दिन बीतने के बाद भी विश्वविद्यालय के छात्र शैक्षणिक गतिविधियों का बहिष्कार करते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं.

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शाह ने कहा कि यदि अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के समक्ष मुद्दे को उठाया था तो इस मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सकता था. सांसद एएमयू कोर्ट के सदस्य भी हैं.

गौतम ने एएमयू के अधिकारियों को जो पत्र लिखा उसे साधारण पोस्ट से भेजा जिसे विश्वविद्यालय पहुंचने में पांच दिन लग गए. शाह ने कहा कि इस बीच सांसद ने इस पत्र को प्रेस और दक्षिणपंथियों में जारी कर दिया , जिससे यह मामला पेचीदा हो गया.

आपको बता दें कि अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने एएमयू के कुलपति तारिक मंसूर को लिखे अपने पत्र में विश्वविद्यालय छात्रसंघ के कार्यालय की दीवारों पर पाकिस्तान के संस्थापक की तस्वीर लगे होने पर आपत्ति जताई थी.

हालांकि, विश्वविद्यालय के प्रवक्ता शाफे किदवई ने दशकों से लटकी जिन्ना की तस्वीर का बचाव किया और कहा कि जिन्ना विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्य थे और उन्हें छात्रसंघ की आजीवन सदस्यता दी गई थी.

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प्रवक्ता ने कहा, ‘जिन्ना को भी 1938 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्रसंघ की आजीवन सदस्यता दी गई थी. वह 1920 में विश्वविद्यालय कोर्ट के संस्थापक सदस्य और एक दानदाता भी थे.’ उन्होंने कहा कि जिन्ना को मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग किए जाने से पहले सदस्यता दी गई थी.

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