दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में सोमवार को विपक्षी INDIA ब्लॉक की बैठक हो रही है. कांग्रेस ने इसे 'इंडिया जनबंधन' की बैठक कह रही है, जिसमें 23 विपक्षी दल के नेता शिरकत कर रहे. देश के बदलते सियासी समीकरण के बीच हो रही बैठक को विपक्षी 'एकजुटता' के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन डीएमके और आम आदमी पार्टी शामिल नहीं हो रही.
विपक्ष के दो बड़े क्षत्रप डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन और AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने INDIA ब्लॉक से दूरी बना ली है. इंडिया ब्लॉक की 'बिग ब्रदर' यानी कांग्रेस से नाराज होकर ये दोनों नेता अब अपनी अलग सियासी रास्ता चुन रहे हैं.
सवाल यह उठता है कि INDIA ब्लॉक से बाहर हो रहे विपक्ष के दोनों ही दलों का आगे का रास्ता क्या होगा? केजरीवाल और स्टालिन क्या तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद करेंगे या फिर अलग राजनीतिक राह तलाशेंगे?
डीएमके ने इंडिया ब्लॉक से तोड़ा नाता
तमिलनाडु की राजनीति में दशकों तक एक-दूसरे का हाथ थामने वाले द्रमुक (DMK) और कांग्रेस के रास्ते अब पूरी तरह अलग हो चुके हैं. डीएमके ने इंडिया ब्लॉक की बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार किया है. स्टालिन की नाराजगी इस बात को लेकर है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नतीजे आते ही कांग्रेस ने उनका साथ छोड़कर अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी 'टीवीके' (TVK) से हाथ मिला लिया.
डीएमके ने इसे सीधा विश्वासघात करार दिया है. डीएमके ने संसद में अपने सांसदों के बैठने की जगह पर कांग्रेस से दूर करने की मांग कर रखी है. एमके स्टालिन ने विपक्ष गठबंधन में शामिल नहीं होने की बात कही है. डीएमके के प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने कहा कि उनकी पार्टी ने इंडिया ब्लॉक मीटिंग का बॉयकॉट करने का फैसला किया है, क्योंकि हम ऐसी जगह नहीं रहना चाहते जहां कांग्रेस मौजूद हो.
एमके स्टालिन अब आगे क्या करेंगे
तमिलनाडु की सत्ता और इंडिया ब्लॉक से अलग होने के बाद एमके स्टालिन अब किसी राष्ट्रीय एजेंडे के दबाव में रहने के बजाय पूरी तरह से 'द्रविड़ियन मॉडल' और क्षेत्रीय राजनीति पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. वे तमिलनाडु में अपनी जमीन मजबूत रखने के लिए वामपंथी दलों और छोटे क्षेत्रीय संगठनों को अपने पाले में बनाए रखने की कोशिश में है.
स्टालिन की नजर अब राष्ट्रीय स्तर पर एक नए समीकरण पर हो सकती है. ममता बनर्जी और अखिलेश यादव जैसे नेता के साथ उनके बेहतर रिश्ते हैं. कांग्रेस की कार्यशैली से असहज स्टालिन कोई नया विपक्ष खेमा तैयार कर सकते हैं. ऐसे में वो भविष्य के लिए एक 'फेडरल फ्रंट' या तीसरे मोर्चे की नींव रख सकते हैं, लेकिन सपा और टीएमसी उनके साथ आएंगी, ये कहना मुश्किल है, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अखिलेश यादव यूपी में कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ सकते हैं.
'एकला चलो' की राह पर केजरीवाल
आम आदमी पार्टी का कांग्रेस के साथ रिश्ता हमेशा से ही"दिल मिले न मिले, हाथ मिलाते रहिए जैसा रहा है. पंजाब में धुर विरोधी होने के बावजूद दिल्ली में गठबंधन की मजबूरी ने दोनों को बांध रखा था, लेकिन अब अरविंद केजरीवाल ने साफ कर दिया है कि वह स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ेंगे. कांग्रेस के साथ दूरी बनाकर चलेंगे, जिसके चलते इंडिया ब्लॉक की बैठक से दूरी बना रखी है.
'AAP' के नेताओं ने खुलेआम कांग्रेस पर क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की साजिश का आरोप लगाया है. केजरीवाल अब कांग्रेस के प्रभाव वाले राज्यों (जैसे गुजरात और गोवा) में खुद को भाजपा के मुख्य और 'कट्टर ईमानदार' विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं. इसके अलावा पंजाब में उनकी सियासी लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी दोनों से है, जिसके लिए दोनों दलों से बराबर दूरी बनाकर चलने की है.
केजरीवाल पूरी तरह से गठबंधन की राजनीति से तौबा कर चुके हैं. संसद में केंद्र सरकार की नीतियों (जैसे जांच एजेंसियों का दुरुपयोग, महंगाई) का विरोध तो करेंगे, लेकिन कांग्रेस के मंच को साझा करने से बचेंगे. उनका पूरा ध्यान दिल्ली में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने और पंजाब की सत्ता को बचाए रखने पर होगा.
बिखरता कुनबा और क्षत्रपों का उदय
INDIA ब्लॉक से बाहर हो रहे दलों का आगे का रास्ता एक बात साफ करता है. देश की राजनीति अब द्विध्रुवीय होने के बजाय बहुध्रुवीय बनती जा रही है. आम आदमी पार्टी को यह समझ आ गया है कि कांग्रेस के छाते के नीचे रहने से उनके अपने वजूद पर संकट आ सकता है.
स्टालिन और केजरीवाल जैसे कद्दावर नेता अब अपनी शर्तों पर राजनीति करेंगे. वे न तो भाजपा के साथ जाएंगे और न ही कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करेंगे. इस तरह से दिल्ली की बैठक में भले ही विपक्षी एकजुटता के नारे लग रहे हों, लेकिन इसकी असली ताकत इसके बिखरते हुए किनारों में छिपी है.
लोकसभा और राज्यसभा में डीएमके के पास अच्छी संख्या में सांसद हैं. स्टालिन केंद्र की भाजपा सरकार का विरोध जारी रखेंगे, लेकिन अब वे कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'इंडिया ब्लॉक' के फैसलों या किसी साझा न्यूनतम कार्यक्रम के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे. संसद या राष्ट्रीय मुद्दों पर केजरीवाल और 'आम आदमी पार्टी' विपक्ष के साथ खड़े नजर आ सकते हैं, लेकिन वे किसी औपचारिक गठबंधन का हिस्सा बनने से बचेंगे.
कुबूल अहमद