पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। इन चुनावों में दो बड़ी बातें उभरकर सामने आईं: पहला, बीजेपी के हिंदू वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ है और दूसरा, मुस्लिम मतदाताओं पर TMC के एकाधिकार का अंत हो गया है.
सालों से ममता बनर्जी का 'अभेद्य किला' माने जाने वाले मुस्लिम बहुल इलाकों में इस बार तृणमूल को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. मुर्शिदाबाद पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र माना जाता है. यहां की बेलडांगा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 63 प्रतिशत है.
इसके बावजूद, 4 मई को बीजेपी के भारत कुमार झावर ने यहां जीत दर्ज की. झावर की ये जीत मुस्लिम वोटों के बिखराव का नतीजा थी. आंकड़ों पर गौर करें तो 2021 में इस सीट पर बीजेपी को 28.9 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि तृणमूल 55 प्रतिशत वोटों के साथ जीती थी.
बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा
बंगाल में 2026 में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 31.9 प्रतिशत हो गया. जबकि टीएमसी का वोट शेयर गिरकर मात्र 26 प्रतिशत रह गया. कांग्रेस को 17.5 प्रतिशत और हुमायूं कबीर की 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) को 20.4 प्रतिशत वोट मिले. बेलडांगा एक उदाहरण है कि कैसे मुस्लिम वोटों के बंटवारे ने बीजेपी के लिए रास्ता साफ किया.
तीन तरफा बिखराव का गणित
2026 के जनादेश को समझने के लिए 2021 के आंकड़ों से तुलना करना जरूरी है. राज्य की कई अहम सीटों पर टीएमसी को अपने ही गढ़ में हार झेलनी पड़ी. मुर्शिदाबाद की कांडी सीट पर टीएमसी के विधायक अपूर्वा सरकार का वोट शेयर 2021 के 51 प्रतिशत से गिरकर 2026 में 31 प्रतिशत रह गया. यहां बीजेपी की गार्गी दास घोष ने 36.7 प्रतिशत वोट पाकर जीत हासिल की.
कांग्रेस ने 15.6 प्रतिशत और ओवैसी की पार्टी (AIMIM) ने 11.5 प्रतिशत वोट हासिल करके टीएमसी का समीकरण बिगाड़ दिया.
किस सीट पर क्या हाल रहा?
जंगीपुर में टीएमसी के सिटिंग विधायक जाकिर हुसैन को बीजेपी ने लगभग 10,000 वोटों से हराया. कांग्रेस के इमरान अली को 15 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बीजेपी का वोट शेयर 22 से बढ़कर सीधा 42 प्रतिशत हो गया.
उत्तर दिनाजपुर की करणदिघी सीट पर बीजेपी 20,000 वोटों से जीती. CPI-M के सहाबुद्दीन ने 39,000 वोट (18%) लेकर टीएमसी के गौतम पॉल को भारी नुकसान पहुंचाया, जिनका वोट शेयर 55 प्रतिशत से घटकर 35 प्रतिशत पर आ गया.
जलंगी सीट पर टीएमसी की जीत का अंतर 80,000 से घटकर 21,000 रह गया. अगर कांग्रेस और CPI-M के वोटों को मिला दिया जाए, तो वो टीएमसी के नए विधायक बाबर अली से कहीं ज्यादा हैं. भगवानगोला में भी टीएमसी की जीत का अंतर 1 लाख से घटकर 56,000 रह गया, क्योंकि CPI-M और कांग्रेस ने मिलकर लगभग 80,000 वोट अपनी ओर खींच लिए.
उत्तर 24 परगना के अशोकनगर में बीजेपी ने टीएमसी को 9,000 वोटों से हराया, जहां ISF को 29,000 वोट मिले. हरिपाल में बीजेपी की जीत का अंतर 3,500 वोटों से भी कम था, जबकि ISF के मुजफ्फर अली ने 12,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. सुजापुर जैसे मुस्लिम बहुल सीट पर भी टीएमसी के वोट शेयर में 23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.
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हुमायूं कबीर फैक्टर और दूसरे दल
चुनाव से पहले हुमायूं कबीर की स्थिति कमजोर लग रही थी, लेकिन उन्होंने रेजीनगर और नौदा दोनों सीटों पर बड़ी जीत हासिल की. रेजीनगर में उन्होंने 59,000 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और टीएमसी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया. जादवपुर विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अब्दुल मतीन का कहना है कि कबीर की अपील सांप्रदायिक हो सकती है, लेकिन उन्होंने तृणमूल के वोट बैंक में गहरी सेंध लगाई है.
कांग्रेस ने भी टीएमसी को बड़ा घाटा पहुंचाया है. फरक्का में कांग्रेस के मोताब शेख ने बीजेपी को हराकर जीत दर्ज की और टीएमसी यहां तीसरे स्थान पर रही. डोमकल जैसी मुस्लिम बहुल सीट CPI-M के मुस्तफिजुर रहमान ने जीती। हंसन, सुती और मुरारई जैसी सीटों पर भी वामपंथ और कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर ममता बनर्जी की पार्टी को नुकसान पहुंचाया।
टीएमसी से मोहभंग क्यों?
2021 में CAA-NRC के डर ने मुस्लिमों को टीएमसी के पक्ष में एकजुट किया था. लेकिन 2026 में मुद्दे बदल गए. आलिया विश्वविद्यालय के डॉ. मोहम्मद रियाज के मुताबिक, वक्फ बोर्ड का मुद्दा, मुस्लिम युवाओं द्वारा ओबीसी आरक्षण की मांग और रोजगार की कमी ने तृणमूल के खिलाफ माहौल बनाया.
रियाज का कहना है कि 'मुस्लिम बहुल सीटों पर 90 प्रतिशत हिंदू वोट बीजेपी को गए.' इससे टीएमसी पर दोहरी मार पड़ी. साथ ही, फुरफुरा शरीफ के समर्थकों को दबाने की कोशिशों ने भी समुदाय में नाराजगी पैदा की.
विशेषज्ञों का कहना है कि ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक 'कैप्टिव वोट बैंक' की तरह समझा, जो इस बार समुदाय को रास नहीं आया. अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर खालिद अनीस अंसारी कहते हैं कि क्षेत्रीय दल मुस्लिम वोट तो चाहते हैं, लेकिन हिंदू वोटों के खोने के डर से वे समुदाय के मुद्दों पर मुखर होकर नहीं बोलते. इसी असमंजस और असंतोष ने बंगाल में टीएमसी के वर्चस्व को हिलाकर रख दिया और बीजेपी के लिए नए रास्ते खोल दिए.
अमित भारद्वाज