महंगाई के दौर में चीनी ने बढ़ाई चिंता, आखिर क्यों उठ रही 'लेवी सिस्टम' लौटाने की मांग?

राशन की दुकानों तक कम कीमत में चीनी पहुंचाने वाला यह सिस्टम करीब एक दशक पहले बंद कर दिया गया था. अब बढ़ती कीमतों के बीच इसकी वापसी की मांग ने पुराने सिस्टम को फिर चर्चा में ला दिया है.

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चीनी के बढ़ते दामों के बीच एक बार फिर से लेवी सिस्टम को वापस लाने की मांगें उठ रही हैं. (Photo- ITG) चीनी के बढ़ते दामों के बीच एक बार फिर से लेवी सिस्टम को वापस लाने की मांगें उठ रही हैं. (Photo- ITG)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्लाी,
  • 22 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:43 AM IST

चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है. खुदरा बाजार में सामान्य चीनी का भाव करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है. खाने-पीने की हर जरूरी चीज पर बढ़ती महंगाई ने देश के मिडिल क्लास और गरीब परिवारों के सामने एक संकट खड़ा कर दिया है. इसी बीच करीब चार दशक पुराने लेवी सिस्टम को फिर से लागू करने की मांग उठने लगी है.

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क्या था लेवी शुगर सिस्टम?

लेवी शुगर सिस्टम का मकसद गरीबों को सस्ती चीनी उपलब्ध कराना था. इसके साथ बाजार में जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगाने की कोशिश भी की जाती थी. इसकी शुरुआत आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 ( Essential Commodities Act) के बाद हुई थी. 1976 में संसद ने लेवी शुगर प्राइस इक्वलाइजेशन फंड एक्ट पास किया. इसके बाद 1979 में लेवी शुगर सप्लाई एंड कंट्रोल ऑर्डर लागू हुआ.

इस व्यवस्था के तहत चीनी मिलों को अपने उत्पादन का एक तय हिस्सा सरकार को देना पड़ता था. शुरुआती दौर में यह हिस्सा 40 से 60  प्रतिशत तक था, जिसे बाद में घटाकर करीब 10 फीसदी कर दिया गया. सरकार मिलों से यह चीनी तय कम कीमत पर खरीदती थी. इसके बाद राशन की दुकानों के जरिए गरीब परिवारों को सस्ती दर पर चीनी उपलब्ध कराई जाती थी.

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नुकसान की भरपाई के लिए मिलों को बाकी चीनी खुले बाजार में बेचने की अनुमति थी. हालांकि, समय के साथ इस व्यवस्था को चीनी मिलों और किसानों के लिए परेशानी का कारण माना जाने लगा. मिलों का कहना था कि कम कीमत पर चीनी देने से उनके पास पैसे की कमी पड़ती है. इससे किसानों को गन्ने का भुगतान करने में भी दिक्कत आती थी.

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2013 में खत्म हुई लेवी की बाध्यता

2012 में चीनी उद्योग की स्थिति को देखते हुए तत्कालीन UPA सरकार ने सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई. समिति ने लेवी व्यवस्था खत्म करने की सिफारिश की. इसके बाद अप्रैल 2013 में सरकार ने मिलों के लिए लेवी चीनी देना अनिवार्य नहीं रखा. इसके बाद चीनी बाजार को धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण से बाहर किया गया.

इसके बदले राज्यों को बाजार से चीनी खरीदने और केंद्र से सब्सिडी लेने की व्यवस्था दी गई. इस बदलाव के बाद मिलों को अपनी चीनी खुले बाजार में बेचने की ज्यादा आजादी मिली.

अब चीनी की कीमतें बढ़ने के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार गरीबों को राहत देने के लिए लेवी सिस्टम का कोई नया रूप लागू कर सकती है. सरकार पहले ही प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज दे रही है. ऐसे में सस्ती चीनी उपलब्ध कराने को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है.
 

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