कुंभ, हज, वेटिकन मास... तीन धर्मों के 3 बड़े जमघट, समझें दुनिया के सबसे बड़े आयोजनों का अर्थशास्त्र!

कुंभ हो या हज यात्रा या फिर क्रिश्चयन समुदाय का वेटिकन मास, धर्म की पुकार सदियों से इंसानों को एक स्थान पर खींचती आई है. हर सभ्यता में मनुष्य एक तय समय पर अपने ही जैसे विश्वास के लोगों से मिलता है और अनुष्ठान कर एक बेहतर जिंदगी की कामना करता है. कैसे एक स्थान पर जमा होते हैं लोग, क्या है परंपराएं, क्या होता है वहां अर्थशास्त्र? पढ़ें इस विस्तृत रिपोर्ट में.

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हर धर्म में लगता है आस्था का जमघट (फोटो डिजाइन-आजतक) हर धर्म में लगता है आस्था का जमघट (फोटो डिजाइन-आजतक)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 4:05 PM IST

धर्म और आस्था की डोरी सदियों से मानवों को अपनी ओर खींचती आई है. धर्म का भाव, मुक्ति की कामना लाखों लोगों को एक सूत्र में पिरोती है. इसलिए ऐसी गतिविधियों में मनुष्य बिना बुलाये ही भारी संख्या में जमा हो जाता है. दुनिया में हर स्थान पर धार्मिक क्रियाओं के लिए हर कोने में एक निश्चित जगह पर लाखों-करोड़ों लोग जमा होते हैं. 

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सनातन, इस्लाम, ईसाइयत हर धर्म के लोग अपनी परंपरा को मनाने के लिए एक निश्चित स्थान पर जमा होते हैं. मान्यता है कि सनातन में कुंभ की परंपरा लगभग 2500 साल से ज्यादा समय से चलती आ रही है, इस्लाम के मानने वाले लगभग 1400 सालों से हज पर जाते रहे हैं जबकि क्रिश्चयन समुदाय के लोग 1700 सालों से ईस्टर संडे मनाते आ रहे हैं. वेटिकन मास का आयोजन भी सालों से होता आ रहा है. 

सवाल उठता है कि लोगों का कौन सा जुटान 'मास गेदरिंग' कहलाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार “किसी निश्चित स्थान पर किसी निश्चित उद्देश्य के लिए एक निश्चित अवधि के लिए एक निश्चित संख्या से अधिक व्यक्तियों का एकत्र होना” मास गेदरिंग है. यहां व्यक्तियों की संख्या 1000 से कम भी हो सकती है, लेकिन उपलब्ध दस्तावेज से पता चलता है कि 25,000 से अधिक व्यक्तियों की सभा को सामूहिक सभा माना जाता है.

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महाकुंभ

कुंभ की चर्चा वेदों में तो हैं बावजूद इसके इस वृहद धार्मिक आयोजन के शुरू होने की कोई तारीख स्पष्ट नहीं है. लेकिन आज के स्टैंडर्ड के लिहाज से ये पृथ्वी पर सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है. 

कुंभ मेला हर 12 साल में एक बार आयोजित किया जाता है. हिन्दुओं को विश्वास है कि विशेष तिथियों में गंगा, यमुना और सरस्वती (अदृश्य) के संगम में स्नान से मनुष्य जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है. 

कुंभ का आयोजन भारत के चार धार्मिक शहरों में बारी बारी से होता है ये शहर हैं प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक. 

कुंभ के दौरान अखाड़ों से जुड़े संतों का स्नान कुंभ का मुख्य आकर्षण होता है. भारत में अभी कुल 13 अखाड़े हैं, जिन्हें तीन श्रेणियों- शैव, वैष्णव और उदासीन में बांटा गया है. अपने विचित्र जीवन शैली, लिबास और खान-पान को लेकर ये साधु-संत लोगों के बीच गहरी जिज्ञासा पैदा करते हैं. 

महाकुंभ को लेकर सरकार की तैयारियां

महाकुंभ का प्रबंधन उत्तर प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है. इस बार के महाकुंभ के सफल संचालन के लिए यूपी की योगी सरकार ने व्यापक इंतजाम किये हैं. 

इस बार का प्रयागराज का महाकुंभ मेला करीब 4000 हेक्टेयर भूमि पर फैला है और इसे 25 सेक्टरों में बांटा गया है. यूपी सरकार ने महाकुंभ मेला परिक्षेत्र को राज्य का 76वां जिला घोषित किया है. मेले में आकस्मिक घटनाओं से निपटने और श्रद्धालुओं को त्वरित चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रत्येक सेक्टर में एक सेंट्रल हॉस्पिटल के अलावा 20 बिस्तरों वाला एक अस्पताल भी बनाया गया है. 

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महाकुंभ के लिए प्रशासन ने संगम तट पर कुल 41 घाट तैयार किए हैं. इनमें 10 पक्के घाट हैं, जबकि बाकी 31 घाट अस्थायी हैं. संगम घाट प्रयागराज का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण घाट है.

आंकड़ों में महाकुंभ

इस बार महाकुंभ में करीब 45 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है. इस समागम में ग्लोब के हर कोने से श्रद्धालु भारत पहुंच रहे हैं. 

महाकुंभ 2025 में पहला शाही स्नान मकर संक्रांति के अवसर पर यानी कि 14 जनवरी को हो रहा है. 14 जनवरी को सुबह 10 बजे तक 1 करोड़ 38 लाख संगम में स्नान कर चुके थे. 

महाकुंभ की यात्रा आसान करने के लिए रेलवे ने 3000 स्पेशल ट्रेनें शुरू की हैं. ये ट्रेनें 13 हजार से अधिक फेरे लगाएंगी. प्रयागराज जंक्शन के अलावा 8 सब-स्टेशन बनाए गए हैं.

मेला क्षेत्र में 10 लाख लोगों के रुकने की व्यवस्था की गई है. इसके आसपास 2000 कैंप की टेंट सिटी बनाई गई है. यहां ठहरने के लिए आपको 3 हजार से लेकर 30 हजार रुपए तक देने होंगे. इसके लिए बुकिंग भी पहले करानी होगी. संगम के आसपास लोगों के ठहरने के लिए कुल 3000 बेड के रैन बसेरे बनाए गए हैं. इसके अलावा महाकुंभ जिले में कुल 204 गेस्ट हाउस, 90 धर्मशालाएं हैं. 

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महाकुंभ मेले में क्राउड मैनेजमेंट और सुरक्षा के प्रभावशाली इंतजाम किये गए हैं. इसके लिए AI संचालित कैमरे, ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाए गए हैं. महाकुंभ में संदिग्ध लोगों पर नजर रखने के लिए स्पॉटरों के अलावा सिविल पुलिस के 15 हजार जवानों को तैनात किया गया है. मेला क्षेत्र के एंट्री पॉइंट्स की निगरानी और नियंत्रण के लिए 7 प्रमुख मार्गों पर 102 चौकियां स्थापित की गई हैं. संगम और उसके आसपास के जलमार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और निगरानी के लिए 113 ड्रोन तैनात किए गए हैं. इसके अलावा केंद्र की की एजेंसियां भी अपने-अपने स्तर पर यहां सक्रिय हैं. 

उत्तर प्रदेश सरकार को अनुमान है कि महाकुंभ से प्रदेश में बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियां भी पैदा होंगी. राज्य सरकार ने इस महाकुंभ के आयोजन के लिए लगभग 7,000 करोड़ रुपये से ज्‍यादा का बजट आवंटित किया है. राज्य सरकार के एक आकलन के अनुसार 25,000 करोड़ रुपये का योगदान दे सकता है. इसके परिणामस्वरूप 2 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ हो सकता है. सरकार का मानना है कि अगर यहां आने वाला हर आदमी कम से कम 5000 रुपये भी खर्च करता है तो इससे 2 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ होगा. 

इस आयोजन से स्थानीय स्वयं सहायता समूहों, कारीगरों, होटल व्यवसायियों, होमस्टे मालिकों, रेस्तरां संचालकों और खाद्य विक्रेताओं को फायदा होगा. 

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हज 

हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है. हर साल, दुनिया भर से लाखों मुसलमान हज करने के लिए सऊदी अरब के मक्का में इकट्ठा होते हैं. इस्लामी मान्यता के मुताबिक हज हर मुस्लिम पर फर्ज है. हर मुस्लिम को जिंदगी में एक बार हज जरूर करना चाहिए, लेकिन इसके लिए उसके पास आर्थिक संसाधन होना जरूरी है. 

हज इस्लामिक कैलेंडर के 12वें महीने, धू अल-हिज्जा में मनाया जाता है. ये धार्मिक गतिविधि आमतौर पर साल के किसी भी महीने में हो सकती है, इसकी तिथियां हर साल बदलती रहती हैं क्योंकि इस्लामिक कैलेंडर चंद्रमा से संचालित कैलेंडर है. 

साल 628 में ये यात्रा शुरू हुई थी. यानी कि आज से 1400 साल पहले. ये यात्रा ही इस्लाम की पहली तीर्थयात्रा बनी जिसे बाद में हज कहा गया. हर साल दुनियाभर से सभी मुस्लिम सऊदी अरब हज के लिए पहुंचते हैं. हज में पांच दिन लगते हैं और ये बकरीद यानी ईद उल अदहा के साथ पूरी होती है.

हज यात्रा (फाइल फोटो- रॉयटर्स)

हज एक वार्षिक आयोजन है.2022 में 40 लाख मुस्लिम हज करने पहुंचे. जबकि 2024 में ये संख्या 1 करोड़ 30 लाख हो गई. 

आंकड़ों के अनुसार सऊदी अरब हर साल हज के जरिये 12 अरब डॉलर का बिजनेस जेनेरेट करता है. वेबसाइट Le Monde diplomatiqe के अनुसार सऊदी अरब हज से प्रति वर्ष औसतन 10-15 बिलियन डॉलर कमाता है और उमरा करने वाले 8 मिलियन यात्रियों से 4-5 बिलियन डॉलर कमाता है. 

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कोरोना से पहले 2019 में हज और उमरा से सउदी अरब को 12 बिलियन डॉलर की कमाई हुई थी. 

सऊदी सरकार नॉन ऑयल इकोनॉमी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है. इसके लिए मक्का के आस-पास के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है. ताकि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम यात्रियों को स्वागत किया जा सके.

सऊदी सरकार ने मक्का में व्यापक बदलाव किये हैं. मक्का को संगमरमर से बने एक पेड़ रहित कंक्रीट के जंगल में बदल दिया गया है, जिसमें 100,000 होटल के कमरे हैं, 70 प्रतिष्ठित रेस्तरां हैं, पांच हेलीपोर्ट और कई कैंपसाइट हैं. कैंपसाइट वो जगह हैं जहां कम आय वाले तीर्थयात्री कैनवास के नीचे रहते हैं. 

इसके अलावा सऊदी सरकारी होटल बना रही है, सरकारी धार्मिक टूर पैकेज पेश कर रही है और हवाई अड्डों की क्षमता बढ़ा रही है. सऊदी सरकार का लक्ष्य 2030 तक हर साल 30 मिलियन यानी कि 3 करोड़ मुस्लिम जायरीनों को सऊदी लाया जा सके. 

बीबीसी की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार हज के लिए इंडोनेशिया का कोटा सबसे ज्यादा है. यहां से 2,20,000 लोग हर साल हज के लिए सऊदी जा सकते हैं. हज के कोटे का ये 14 फीसदी हिस्सा है.

इसके बाद पाकिस्तान (11 फीसदी), भारत (11फीसदी) और बांग्लादेश (8 फीसदी) की बारी आती है. इस लिस्ट में नाइजीरिया, ईरान, तुर्की, मिस्र जैसे देश भी शामिल हैं. 

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वेटिकन मास

वेटिकन दुनिया भर के लाखों इसाइयों के लिए तीर्थस्थल है. यहां स्थित सेंट पीटर बेसिलिका अदभुत चर्च है. यहां आयोजित होने वाली रोजाना की प्रार्थना सदियों पुरानी परंपराओं में डूबने और वैश्विक समुदाय में शामिल होने का मौका देते हैं. सेंट पीटर बेसिलिका में प्रतिदिन मास यानी कि प्रार्थना होती है. 

यहां शामिल होने के लिए कोई चार्ज नहीं लगता है, लेकिन इसके लिए बुकिंग जरूर करानी पड़ती है. 

वेटिकन में सप्ताह के दिनों में कम से कम पांच प्रार्थनाएं होती है और सप्ताह के अंत में इससे भी ज्यादा. इसलिए यहां शामिल होने के कई मौके हैं. यहां होने वाली प्रार्थनाएं इतालवी भाषा में होती हैं. 

वेटिकन के प्रांगण में प्रार्थना का दृश्य (फोटो- getty)

सेंट पीटर्स बेसिलिका: धार्मिक कैलेंडर के अनुसार अधिकांश पापल मास यानी कि प्रार्थनाएं यहीं होती है. इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हो सकते हैं. इसकी क्षमता 15000 से ज्यादा लोगों को समाहित करने की है. इसाइयों के धर्म गुरु पोप फ्रांसिस यही इसाई मतों के लोगों के साथ संवाद करते हैं. 

माइकल एंजेलो के भव्य गुंबद के नीचे होने वाली प्रार्थनाओं में लोग भव्य सीढ़ियों, चौड़े गलियारों और व्हीलचेयर के जरिये पहुंच सकते हैं.

सेंट पीटर्स स्क्वायर: वेटिकन में बड़े आयोजनों के लिए या जब ज़्यादा लोग आते हैं तो ये प्रार्थनाएं सेंट पीटर्स स्क्वायर में आयोजित की जाती हैं.  यह विशाल क्षेत्र 80,000 तक की क्षमता वाले लोगों की एक बड़ी संख्या की मेज़बानी कर सकता है. 

हर साल 25 दिसंबर यानी कि बड़ा दिन पर यहां भारी भीड़ उमड़ती है. इस दिन की प्रार्थना को खास माना जाता है.

वेटिकन बहुत छोटा देश है. इसके खर्चे के हिसाब-किताब बहुत गुप्त रहते हैं. वैटिकन आने वाले ज्यादा तीर्थयात्री इटली के होटलों में रहते हैं. वेटिकन सिटी के फाइनेंस में वेटिकन बैंक की भूमिका शायद सबसे विवादास्पद और कम समझा जाने वाला हिस्सा है. धर्म के कार्यों के लिए एक संस्थान की भूमिका निभाने वाले वेटिकन बैंक वेटिकन सिटी में स्थित एक निजी बैंक है जिसकी स्थापना 1942 में पोप पायस XII ने की थी. ये बैंक इस बहुत छोटे से देश के इकोनॉमी को कंट्रो करता है.

वेटिकन में पहुंचने वाले दुनिया भर के ईसाई दान में जो पैसे देते हैं उसे पीटर्स पेंस कहा जाता है. ये वैटिकन और रोमन चर्च की कमाई का बड़ा हिस्सा है.एक सिटी के अनुसार वैटिकन सिटी में हर साल करीब 50 लाख श्रद्धालु आते हैं. हालांकि कोरोना महामारी से पहले यह संख्या करीब 70 लाख थी.  

ईस्टर संडे

इजरायल की राजधानी येरुशलम इसाइयों का सबसे प्रसिद्ध स्थल है. हर साल ईस्टर के दौरान यहां लाखों लोग जमा होते हैं. इस त्योहार को ईसा मसीह को सूली पर लटकाये जाने के बाद फिर से जीवित हो उठने के याद में मनाया जाता है. यरूशलम में ईस्टर वीक के दौरान श्रद्धालु उसी रास्ते पर चलते हैं जिस पर जीसस क्राइस्ट चले थे. इसे मनाने की परंपरा 325 AD यानी कि करीब 1700 साल पहले शुरू हुई थी. 

दुनिया भर शहर का ईसाई समुदाय, जिसमें ऑर्थोडॉक्स, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट संप्रदाय शामिल हैं, ईसा मसीह को याद  करने के लिए एक साथ आते हैं. इस साल 20 अप्रैल को ये त्योहार मनाया जाएगा. 

चूंकि येरुशलम शहर को लेकर इजरायल और फिलीस्तीन के बीच विवाद रहा है. इसलिए पिछले दो सालों से यहां लोगों की मौजूदगी कम हो रही है. साल 2024 में 4200 लोगों के आने की ही अनुमति दी थी.  

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