Gyanesh Kumar Supreme Court Hearing: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज और एसआईआर से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई दिवाली तक टल गई है. करीब तीन दर्जन याचिकाओं में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR, चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने के तरीके और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती दी गई है.
याचिकाकर्ताओं ने SIR पर रोक लगाने, मामले की निष्पक्ष जांच कराने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है. दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने संयुक्त हलफनामा दाखिल कर आरोपों को गलत बताया है. आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच बैठी और याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनीं. चुनाव आयोग की तरफ से हलफनामा पहले ही दायर किया चुका है. इसी हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिनों का समय दिया है. इसके बाद दिवाली के बाद फिर मामले की सुनवाई होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी और विपक्ष के 12 अन्य नेताओं की उन याचिकाओं पर सुनवाई टाल दी, जिनमें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और अलग-अलग राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती दी गई है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया है. चुनाव आयोग चाहे तो 10 दिन के भीतर अतिरिक्त हलफनामा भी दाखिल कर सकता है.
डोला सेन की याचिका भी दूसरी याचिकाओं के साथ जोड़ी गई
सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी नेता डोला सेन की नई याचिका पर नोटिस जारी किया और इसे दूसरी याचिकाओं के साथ जोड़ दिया. इन याचिकाओं में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक अलग-अलग राज्यों में चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए. मामले पर अब दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए 10 दिन की मोहलत दी है.
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और फॉर्म 6 पर सवाल उठाने वाली डोला सेन की याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. याचिकाकर्ता की वकील ने इस पर सुनवाई का आग्रह किया, तो कोर्ट ने कहा कि ऐसी ही याचिकाओं पर नोटिस जारी किया जा चुका है. हालांकि, याचिकाकर्ता ने कहा कि उनकी याचिका बिहार और बंगाल में एसआईआर से जुड़े सवालों पर आधारित है.
वकील को कोर्ट की चेतावनी, जवाब के लिए 14 दिन की मोहलत
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने वकील को अनर्गल तर्क देने पर चेतावनी दी. सीजेआई ने कहा कि मर्यादा पार करने पर इसके नतीजे भुगतने होंगे. कोर्ट ने चुनाव आयोग को अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने के लिए 14 दिन और दूसरे पक्षों को उस पर जवाब देने के लिए 10 दिन का समय दिया.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कथित एकतरफा फैसलों और चुनाव आयोग के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है.
याचिकाकर्ताओं ने 2023 के कानून की धारा 16 को भी चुनौती दी है. यह प्रावधान चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े कुछ मामलों में कानूनी कार्रवाई से संरक्षण देता है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इससे चुनाव आयोग की जवाबदेही प्रभावित हो सकती है. उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने और चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की मांग की है.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), एनजीओ लोक प्रहरी और कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 को चुनौती दी है. विवाद चयन समिति की संरचना को लेकर है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटाकर केंद्रीय मंत्री को शामिल करने से चयन प्रक्रिया में सरकार का बहुमत हो जाता है. उन्होंने कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है.
चुनाव आयोग ने संयुक्त हलफनामा दाखिल कर याचिकाकर्ताओं के आरोपों को गलत बताया है. आयोग के मुताबिक, जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में SIR से जुड़े सभी आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे. आयोग ने कहा है कि किसी फाइल पर दर्ज टिप्पणी या आपत्ति को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता. फॉर्म 6 में बदलाव के आरोप पर भी आयोग ने कहा कि इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है.
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाने या विशेष जांच दल यानी SIT से जांच कराने की मांग की है. उन्होंने देशभर में चल रहे SIR को अवैध घोषित करने और इस पर तत्काल रोक लगाने की भी मांग की है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कई अहम फैसले लिए. याचिकाओं के मुताबिक, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच मतदाता सूची के प्रबंधन और डेटा को केंद्रीकृत करने जैसे मुद्दों पर कम से कम 14 फैसलों को लेकर लिखित आपत्तियां जताई गई थीं.