'सरकारी परिसर के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के खिलाफ है निर्माण', कदीमी मस्जिद हटाने पर केंद्र का दिल्ली हाईकोर्ट में तर्क

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि कृषि भवन परिसर में स्थित 100 साल से ज्यादा पुरानी कदीमी मस्जिद को सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत हटाना जरूरी है. सरकार का कहना है कि केंद्र सरकार के कार्यालय परिसर में स्थायी धार्मिक ढांचे को बनाए रखना सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुरूप नहीं है.

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कदीमी मस्जिद को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने अपना पक्ष रखा. कदीमी मस्जिद को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने अपना पक्ष रखा.

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 03 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:57 PM IST

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि कृषि भवन के अंदर स्थित 100 साल से अधिक पुरानी कदीमी मस्जिद को सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत हटाना जरूरी है. सरकार का तर्क है कि केंद्र सरकार के कार्यालय परिसर के भीतर किसी स्थायी धार्मिक ढांचे को बनाए रखना सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुरूप नहीं है.

केंद्र ने हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि कृषि भवन और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट परिसर धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक परिसर हैं, जिनका इस्तेमाल सरकारी, प्रशासनिक और सार्वजनिक सेवा से जुड़े कार्यों के लिए किया जाता है. केंद्र की ओर से पेश वकील निशांत गौतम ने कहा कि केंद्रीय सरकारी कार्यालय परिसर के भीतर किसी स्थायी धार्मिक ढांचे की स्थापना या उसे बनाए रखना सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के अनुरूप नहीं है.

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केंद्र ने कहा कि सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास के मास्टर प्लान में प्लॉट नंबर 120 पर कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग 4 और 5 के पुनर्निर्माण की योजना है. इसके तहत मौजूदा शास्त्री भवन और कृषि भवन को हटाकर राष्ट्रीय शासन से जुड़े महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने की योजना है. सरकार के मुताबिक, मस्जिद कृषि भवन परिसर में डॉ. राजेंद्र प्रसाद रोड पर स्थित है और यह सरकारी जमीन पर बनी है, जिसका प्रशासन और नियंत्रण एलएंडडीओ के पास है. केंद्र ने तर्क दिया कि केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र में मौजूद सरकारी जमीन को किसी स्थायी धार्मिक इस्तेमाल के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकता.

1940 के समझौते का भी दिया हवाला

केंद्र सरकार ने आगे कहा कि मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति को 8 नवंबर 1940 के एक समझौते के तहत केवल अनुमति के आधार पर परिसर में कब्जा दिया गया था. इस समझौते से समिति को जमीन पर कोई अधिकार, स्वामित्व या हित हासिल नहीं हुआ.

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इसी आधार पर केंद्र ने मस्जिद को बचाने या उसके लिए वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराने की समिति की मांग को खारिज कर दिया. सरकार ने कहा कि मस्जिद के पास ही दो किलोमीटर के दायरे में एक और मस्जिद मौजूद है. केंद्र के मुताबिक, यह मस्जिद पूरी तरह चालू है और आसपास नमाज पढ़ने वाले लोगों के लिए नजदीकी प्रार्थना स्थल के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है.

हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा- क्या प्रार्थना के लिए जगह देने पर रोक है?

यह हलफनामा कदीमी मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति की याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है. समिति ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए आशंका जताई थी कि सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत ऐतिहासिक मस्जिद को गिराया जा सकता है. 2 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस अनिश दयाल ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या ऐसे कोई नियम हैं, जो सरकारी परिसर के भीतर किसी खास समुदाय के लिए प्रार्थना की जगह उपलब्ध कराने पर रोक लगाते हैं. अदालत ने केंद्र के वकील निशांत गौतम से यह सवाल अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के सामने रखने को कहा. इस मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी.

100 साल से ज्यादा पुरानी है कदीमी मस्जिद

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कदीमी मस्जिद को 100 साल से ज्यादा पुराना बताया जाता है. यह कृषि भवन परिसर के अंदर स्थित है, जिसे सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत हटाया जाना प्रस्तावित है. रिपोर्टों के मुताबिक, यह मस्जिद सरकारी परिसर के निर्माण से पहले की है और यहां कृषि भवन तथा आसपास के सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारी लंबे समय से नमाज पढ़ते रहे हैं. दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 1970 में इस मस्जिद को वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया था, जिससे इस विवाद का एक और पहलू सामने आता है.

17 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई के दौरान मस्जिद समिति ने स्पष्ट किया था कि वह सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना को रोकने या उसमें बाधा डालने की मांग नहीं कर रही है. समिति की मांग थी कि नई प्रस्तावित इमारतों में प्रार्थना की सुविधा जारी रखी जाए.

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने दलील दी थी कि समिति प्रार्थना की सुविधा जारी रखने के लिए उचित और नजदीकी व्यवस्था चाहती है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का भी हवाला दिया था. हालांकि, अदालत ने अपने जवाब में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी व्यक्ति को सरकारी जमीन पर किसी खास स्थान पर पूजा करने का अधिकार नहीं है, खासकर जब उस जमीन पर अनुमति के आधार पर कब्जा दिया गया हो. इसलिए अनुच्छेद 25 के तहत किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता. अब केंद्र सरकार मौजूदा मस्जिद को बनाए रखने और उसके लिए वैकल्पिक जमीन देने, दोनों मांगों का विरोध कर रही है. ऐसे में यह मामला 23 नवंबर को फिर हाईकोर्ट के सामने आएगा. अदालत की आगे की सुनवाई और सरकारी परिसरों में प्रार्थना स्थलों को लेकर पूछे गए सवाल इस ऐतिहासिक मस्जिद के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
 

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