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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का रंग नीला क्यों है? जानिए वजह

सना जैदी
  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:26 AM IST
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देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का नीला रंग सिर्फ इसकी सुंदरता के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई वजह हो सकती हैं. दुनिया की पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन (जर्मनी में 2018 से चल रही) ब्राइट ब्लू कलर में है. वहीं, कनाडा, जापान, चीन आदि में भी चल रही हाइड्रोजन ट्रेनें नीले रंग की ही हैं.  

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दरअसल, हाइड्रोजन ट्रेन पानी (H₂O) से जुड़ी है. सामान्य ट्रेनें डीजल या बिजली से चलती हैं, लेकिन हाइड्रोजन ट्रेन बिल्कुल अलग तरीके से काम करती है. इसके लिए ट्रेन के खास टैंकों में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है. ईंधन सेल में हाइड्रोजन + ऑक्सीजन से बिजली बनती है और सिर्फ पानी की भाप (steam) निकलती है. इसमें कोई धुआं, कोई प्रदूषण नहीं होता. इसे ग्रीन या क्लीन टेक्नोलॉजी कहते हैं. 

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हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन मिलने पर सिर्फ पानी (H₂O) बनता है. नीला रंग पानी, आकाश और स्वच्छता का प्रतीक माना जाता है. जापान की Hybari ट्रेन भी नीली है और उसपर पानी का डिजाइन भी बना है. वहीं, जर्मनी की हाइड्रोजन ट्रेन Coradia iLint भी ब्राइट ब्लू कलर की है. ऐसे में भारत की हाइड्रोजन ट्रेन का रंग भी नीला है. 

प्लेटफॉर्म टिकट और मेट्रो से भी कम किराया, नो पॉल्यूशन... जानें हाइड्रोजन ट्रेन की खासियतें
 

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हाइड्रोजल ट्रेन सामान्य ट्रेनों से अलग है. इसका नीला रंग आंखों को आकर्षित करता है और आधुनिक लगता है. दुनिया भर की हाइड्रोजन ट्रेनें (जर्मनी, जापान, चीन, कनाडा, अमेरिका) ज्यादातर नीले रंग की होती हैं. भारत भी उसी वर्ल्ड स्टाइल को फॉलो कर रहा है.

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बता दें कि भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन 8 पैसेंजर कोच और 2 पावर कार वाली है. जो 89 किलोमीटर लंबे जींद-सोनीपत रूट पर दौड़ेगी. इसमें 682 सीटें और 2600 यात्री क्षमता है. हाइड्रोजन ट्रेन न सिर्फ पर्यावरण के लिए बेहद फायदेमंद है, बल्कि यात्रियों के लिए भी किफायती है. इसका किराया प्लेटफॉर्म टिकट और दिल्ली मेट्रो से भी कम है.

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हाइड्रोजन ट्रेन जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भांभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खांडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत स्टेशन पर रुकेगी. इस ट्रेन की ऑपरेशनल स्पीड 75 किमी/घंटा है. ट्रायल के दौरान 120 किमी/घंटा तक पहुंची थी.

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ट्रेन में हाइड्रोजन गैस का इस्तेमाल होने से सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है. इसमें मल्टी-लेयर सेफ्टी सिस्टम लगाए गए हैं. सुरक्षा के लिहाज से हाइड्रोजन लीक डिटेक्टर, फायर डिटेक्टर, मॉनिटरिंग सिस्टम लगे हैं. इस पायलट प्रोजेक्ट की लागत (ट्रेन + इंफ्रास्ट्रक्चर) करीब 112 करोड़ रुपये है. 

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जींद में रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग प्लांट बनाया गया है. जहां हाइड्रोजन स्टोर, कम्प्रेस और भरने की पूरी व्यवस्था है. प्लांट में भी लीक डिटेक्टर, फ्लेम डिटेक्टर, ऑटो शटडाउन, पानी की स्प्रे और फायर अलार्म लगे हैं. रेलवे का प्लान है कि ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ के तहत 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाई जाएंगी.

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