केरल के वायनाड में साल 2024 की विनाशकारी भूस्खलन त्रासदी को दो साल बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवार आज भी उस दर्द से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं. इसी बीच हाल ही में वायनाड के कल्लाडी इलाके में हुए नए भूस्खलन ने पुराने जख्म फिर हरे कर दिए हैं. हालांकि 2026 का यह भूस्खलन 2024 की तबाही जितना बड़ा नहीं था, लेकिन उस भयावह रात को झेल चुके लोगों के लिए यह घटना मानसिक रूप से बेहद डरावनी साबित हुई है. (Photo: ITG)
कल्लाडी, चूरलमाला और मुंडक्कई के बेहद करीब स्थित है, जहां 2024 में भीषण भूस्खलन हुआ था. ऐसे में नए हादसे की खबर ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी. स्थानीय लोगों का कहना है कि वे अभी पिछले हादसे के दर्द से बाहर भी नहीं निकल पाए थे कि एक और भूस्खलन ने उनकी चिंता बढ़ा दी. (Photo: ITG)
इसी बीच इलाके में प्रस्तावित टनल परियोजना को लेकर भी बहस तेज हो गई है. स्थानीय लोग वर्षों से बेहतर कनेक्टिविटी के लिए इस परियोजना की मांग करते रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि विकास सुरक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए. राज्य सरकार ने फिलहाल विस्तृत जांच पूरी होने तक परियोजना का निर्माण कार्य रोकने का फैसला किया है. (Photo: ITG)
नए भूस्खलन के बाद जब वायनाड के 2024 के पीड़ितों की मौजूदा स्थिति जानने की कोशिश की गई तो सामने आया कि पुनर्वास का काम अभी भी पूरी तरह पूरा नहीं हो पाया है. सरकार की ओर से बनाए जा रहे मॉडल टाउनशिप में पहले चरण के तहत 178 घरों का निर्माण पूरा हो चुका है और इस वर्ष मार्च में कई परिवारों को उनकी चाबियां भी सौंप दी गई थीं. दूसरे चरण का निर्माण कार्य अब भी जारी है. (Photo: ITG)
इसी टाउनशिप में रहने वाले अनीश और सयाना उन परिवारों में शामिल हैं जिन्होंने 2024 की त्रासदी में अपने तीनों बेटों को खो दिया था. उस रात उन्होंने अनीश की मां और एक भतीजे को भी खो दिया था. दोनों कई दिनों तक आईसीयू में जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद बच सके. (Photo: ITG)
अपने नए घर का नाम उन्होंने 'थ्री ब्रदर्स इन आर्म्स' रखा है. घर की दीवारों पर तीनों बेटों और अनीश की मां की तस्वीरें लगी हैं, ताकि उनकी यादें हमेशा उनके साथ बनी रहें. बच्चों के खिलौने और उनकी इस्तेमाल की गई चीजों के लिए घर में अलग से एक कोना बनाया गया है. (Photo: ITG)
अनीश कहते हैं कि जब भी कहीं भूस्खलन की खबर सुनते हैं तो मन घबरा जाता है. उनके मुताबिक वायनाड बेहद खूबसूरत इलाका है, लेकिन लगातार हो रही प्राकृतिक आपदाएं इसे बर्बाद कर रही हैं. उन्होंने बताया कि वह आज भी अपना अधिकांश समय 'हृदयभूमि' में बिताते हैं, जहां उनके बच्चों को दफनाया गया है और जहां कभी उनका पुराना घर हुआ करता था. (Photo: ITG)
सयाना बताती हैं कि नए घर में आने के बावजूद पुराने पड़ोस और अपनों की कमी हर दिन महसूस होती है. उन्होंने कहा कि कल्लाडी भूस्खलन के वीडियो देखकर वह बेहद दुखी हो गई थीं और रोज भगवान से यही प्रार्थना करती हैं कि जो उनके परिवार के साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो. (Photo: ITG)
वहीं सरकारी क्वार्टर में रह रहे रशीद और सेरेना अब भी अपने स्थायी घर का इंतजार कर रहे हैं. उनका कहना है कि पुनर्वास परियोजना की रफ्तार पिछले कुछ महीनों में काफी धीमी पड़ गई है. रशीद का आरोप है कि अधिकारियों के तबादले और मजदूरों की कमी के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ है. सरकार ने सितंबर तक घर मिलने की बात कही है, लेकिन उन्हें लगता है कि मौजूदा गति को देखते हुए जनवरी से पहले यह संभव नहीं होगा. (Photo: ITG)
सेरेना बताती हैं कि जिस सरकारी क्वार्टर में वे रह रहे हैं उसकी हालत बेहद खराब है. उनकी 15 वर्षीय बेटी को हर समय डर लगा रहता है कि कहीं मकान गिर न जाए. वह दसवीं कक्षा में पढ़ती है और अपने पुराने दोस्तों से बिछड़ने के बाद मानसिक तनाव से गुजर रही है. काउंसलरों ने परिवार से कहा है कि स्थायी टाउनशिप में शिफ्ट होने के बाद उसकी मानसिक स्थिति में सुधार आ सकता है. (Photo- ITG)
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुनर्वास परियोजना से जुड़े कई प्रमुख अधिकारियों के तबादले के बाद काम की रफ्तार काफी धीमी हो गई है. कई निर्माण स्थलों पर कई-कई दिनों तक कोई काम नहीं होता दिखता. लोगों को उम्मीद है कि सरकार जल्द इस समस्या का समाधान करेगी ताकि बाकी परिवार भी जल्द अपने स्थायी घरों में बस सकें. (Photo: ITG)
दो साल बाद भी वायनाड के इन परिवारों के लिए बारिश की हर बूंद और पहाड़ से गिरती मिट्टी उन्हें उस भयावह रात की याद दिला देती है. नए भूस्खलन ने यह साफ कर दिया है कि मकान बन जाने भर से पुनर्वास पूरा नहीं होता, बल्कि लोगों के मन में बसे डर और सदमे से उबरने में अभी लंबा समय लगेगा.
(Photo: ITG)