हर दिन 2 पति की हत्या और 1 से ज्यादा की आत्महत्या, रिपोर्ट ने चौंकाया

गुरुग्राम स्थित एकम न्याय फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले छह महीनों में मीडिया में दर्ज 322 पति हत्याकांड और 232 पति आत्महत्या के मामले सामने आए. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अवैध संबंध पति हत्याओं का सबसे बड़ा कारण रहे. फाउंडेशन ने पुरुष पीड़ितों के लिए जेंडर-न्यूट्रल सहायता और अलग एनसीआरबी श्रेणी की मांग की है.

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6 महीने में 322 पतियों की हत्या और 232 ने की आत्महत्या. (Photo: ITG) 6 महीने में 322 पतियों की हत्या और 232 ने की आत्महत्या. (Photo: ITG)

स्नेहा

  • गुरुग्राम,
  • 17 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:23 PM IST

गुरुग्राम स्थित गैर-सरकारी संगठन एकम न्याय फाउंडेशन ने भारत में पति हत्याओं और वैवाहिक विवादों से जुड़ी पति आत्महत्याओं पर अपनी नई दस्तावेजी रिपोर्ट जारी की है. यह रिपोर्ट 14 जुलाई 2026 तक मीडिया में प्रकाशित और फाउंडेशन द्वारा दस्तावेजीकृत मामलों पर आधारित है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2026 के पहले छह महीनों में देशभर में 554 ऐसे मामले दर्ज किए गए, जिनमें 322 पति हत्याएं और 232 पति आत्महत्याएं शामिल हैं.

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फाउंडेशन के अनुसार, ये आंकड़े सिर्फ उन मामलों पर आधारित हैं जो मीडिया में सामने आए. संगठन का कहना है कि कई घटनाएं कभी मीडिया तक पहुंचती ही नहीं हैं. साथ ही, देश में पति हत्याओं या पुरुष घरेलू हिंसा पीड़ितों का कोई अलग राष्ट्रीय आधिकारिक डाटाबेस भी मौजूद नहीं है. ऐसे में वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.

रिपोर्ट के अनुसार, 322 पति हत्याओं में से 194 मामलों, यानी लगभग 60.2 प्रतिशत मामलों में विवाहेतर संबंध मुख्य वजह रहे. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मामलों में आरोप है कि कई पत्नियों ने अपने प्रेमियों के साथ मिलकर अपने पतियों की हत्या की साजिश रची. ऐसा तब हुआ जब पति ने कथित तौर पर विवाहेतर संबंधों का विरोध किया या वह रिश्ते में बाधा बन गया.

पति हत्याओं में 60 प्रतिशत मामलों की वजह बताए गए अवैध संबंध

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रिपोर्ट में दर्ज मामलों के अनुसार, हत्या के तरीके भी बेहद क्रूर रहे. इनमें जहर देकर हत्या करना, जिंदा जलाना, करंट लगाना, गला घोंटना, शव के टुकड़े करना, शव को जमीन में दफनाना और हत्या को हादसा या आत्महत्या दिखाने जैसी घटनाएं शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 88 पति हत्याएं यानी 27.3 प्रतिशत मामले घरेलू विवादों से जुड़े थे. इसके अलावा पैसों के विवाद, पारिवारिक साजिश और पत्नी या उसके प्रेमी के परिवार की कथित भूमिका जैसे कारण भी सामने आए.

रिपोर्ट में पति आत्महत्याओं के 232 मामलों का भी उल्लेख किया गया है. इनमें सबसे बड़ा कारण लंबे समय तक चले घरेलू विवाद बताए गए हैं. ऐसे 104 मामले दर्ज किए गए, जो कुल आत्महत्याओं का 44.83 प्रतिशत हैं. इसके अलावा 57 मामलों, यानी 24.57 प्रतिशत में पत्नी या ससुराल पक्ष द्वारा कथित उत्पीड़न का जिक्र किया गया है. वहीं 29 मामलों, यानी 12.5 प्रतिशत आत्महत्याओं को विवाहेतर संबंधों से जोड़ा गया है. शेष मामलों में झूठे आपराधिक मुकदमों के आरोप, प्रेमिका या उसके परिवार द्वारा कथित उत्पीड़न और अन्य कारणों का उल्लेख किया गया है.

घरेलू विवाद और कथित उत्पीड़न भी बने बड़ी वजह

रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 93 पति हत्याओं और 103 पति आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए गए. इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों का नाम रिपोर्ट में शामिल है. फाउंडेशन ने इस वर्ष के 25 सबसे चर्चित और क्रूर मामलों का भी जिक्र किया है. इनमें ऐसे मामले शामिल हैं जिनमें पतियों का सिर काट दिया गया, शव के टुकड़े कर दिए गए, जहर देकर हत्या की गई, घर के फर्श के नीचे दफनाया गया, जिंदा जलाया गया, गहरी खाई में धक्का दिया गया या पत्नी और उसके कथित प्रेमी की साजिश में हत्या की गई.

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रिपोर्ट में ऐसे कई आत्महत्या मामलों का भी उल्लेख है, जिनमें मृतकों ने कथित तौर पर सुसाइड नोट या वीडियो छोड़कर लंबे समय तक मानसिक प्रताड़ना, घरेलू विवाद, झूठे आपराधिक मामलों, बच्चों से दूर रखने और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. एकम न्याय फाउंडेशन की संस्थापक दीपिका नारायण भारद्वाज ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रत्येक दस्तावेजीकृत मामला एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसकी जान गई और एक परिवार बिखर गया. उन्होंने कहा कि केतन अग्रवाल की कथित हत्या ने पूरे देश का ध्यान खींचा, लेकिन ऐसे कई मामले रोज सामने आते हैं जिनमें महिलाओं पर अपने प्रेमियों के साथ मिलकर पति या साथी की हत्या करने के आरोप लगते हैं.

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दर्ज हुए मामले

उन्होंने कहा कि फाउंडेशन का उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ हिंसा और पुरुषों के खिलाफ हिंसा की तुलना करना नहीं है. उनका कहना है कि उद्देश्य केवल ऐसे मुद्दे की तरफ ध्यान आकर्षित करना है जो सार्वजनिक चर्चा और आधिकारिक आंकड़ों में लगभग अदृश्य बना हुआ है. उन्होंने कहा कि पुरुष भी घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, जबरदस्ती और रिश्तों में हिंसा के शिकार हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए कोई अलग संस्थागत सहायता व्यवस्था मौजूद नहीं है.

दीपिका नारायण भारद्वाज ने यह भी कहा कि आधिकारिक अपराध आंकड़ों में पति हत्याओं और पुरुष घरेलू हिंसा पीड़ितों की अलग श्रेणी नहीं होने के कारण समस्या की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती. उन्होंने कहा कि इस दस्तावेजीकरण का उद्देश्य साक्ष्य आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देना और लैंगिक भेदभाव से परे रिश्तों में होने वाली हिंसा पर संतुलित चर्चा शुरू करना है.

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रिपोर्ट में फाउंडेशन ने नीति निर्माताओं से मांग की है कि पुरुष घरेलू हिंसा पीड़ितों को भी आधिकारिक मान्यता दी जाए. साथ ही जेंडर-न्यूट्रल सहायता प्रणाली विकसित की जाए. एनसीआरबी में पति हत्याओं और पुरुष घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए अलग श्रेणी बनाई जाए. वैवाहिक तनाव झेल रहे पुरुषों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता मजबूत की जाए और लैंगिक रूप से समावेशी आंकड़ों पर आधारित शोध को बढ़ावा दिया जाए.
 

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