जानिए, क्या हैं वो 10 बड़े कारण जिनकी वजह से दिल्ली में खत्म नहीं हो सकता प्रदूषण

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की आबोहवा लगातार खराब होती जा रही है. दिल्ली में वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने पर पाबंदी से लेकर दिवाली पर पटाखे जलाने तक पर रोक लगा दी गई लेकिन फिर भी प्रदूषण पर लगाम नहीं लगी.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (इंडिया टुडे आर्काइव) प्रतीकात्मक तस्वीर (इंडिया टुडे आर्काइव)

सना जैदी / पूनम शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 24 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 9:09 PM IST

दिल्ली में जब प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंचता है तो क्या उस पर लगाम संभव है. क्या सरकारें अब तक कुछ ऐसा प्रयास करने में सफल रही हैं, जिससे कुछ वर्षों में प्रदूषण कम हुआ हो. यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो दिल्ली एनसीआर में रहने वाले हर शख्स के मन में हैं. दुखद पहलू यह है कि इन सभी सवालों का जवाब न में है. ये है वो रिपोर्ट जिससे पता चलता है कि दिल्ली का प्रदूषण कम होने का नाम क्यों नहीं ले रहा है.

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दिल्ली में ना पराई पराली जलाई जाती है और ना ही ईटों के भट्टे चलते हैं, लेकिन उसके बावजूद भी प्रदूषण दिल्ली को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल कर देता है. तो बड़ा सवाल यह है कि फिर की बड़ी वजह आखिर क्या है. दिल्ली में छोटी-बड़ी हजारों औद्योगिक इकाईयां हैं, जिनमें बड़ी संख्या में कोयला इस्तेमाल होता है. बदरपुर थर्मल पावर जैसे प्लांट हैं, दिल्ली में ढाबे हों या बड़े फाइव स्टार होटल, हर जगह तंदूरी खाना बनाने को लेकर कोई सवाल नहीं किया जाता.

लाखों दोपहिया और चार पहिया वाहन हैं, हर दिन नई कारें सड़कों पर आ रही हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इन पर लगाम लगाने में सरकार की कोई रुचि है, या फिर व्यवहारिक तौर पर इन सबको दिल्ली से हटाना संभव है.

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प्रदूषण से जुड़े मामलों के वकील गौरव कुमार बंसल कहते है कि किताबों में भले ही प्रदूषण फैलाने वाली चीज़ें बंद हो जाएं लेकिन व्यवहारिक तौर पर उन्हें बंद करना संभव नहीं है. के मामले में इतनी विकट परिस्थिति में है और दुखद यह भी है कि हमारे नीति निर्माताओं को इसका बखूबी अंदाजा है. इसके बाद रही सही कसर दिल्ली में माउंट एवरेस्ट जैसे ऊंचे-ऊंचे कूड़े के पहाड़ हैं. जिममें जब तक आग लगती रहती है और उससे खतरनाक गैस रिसती रहती है.

देश की तीन बड़ी कोर्ट सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और एनजीटी को लेकर गंभीर हैं लेकिन इसको लेकर सरकारें और अधिकारी गंभीर नहीं दिखते. हाल ही में एनजीटी ने प्रदूषण के मामले में दिल्ली और पंजाब सरकार की लापरवाही को देखते हुए 50-50 करोड़ का जुर्माना भी दोनों राज्य सरकारों पर ठोक दिया है.

सच पूछिए तो ना हम अपने विकास पर संयम रख पाएं, ना इंडस्ट्रीज पर, ना अपने ढाबों पर. दिल्ली को अगर स्वच्छता देनी है तो यह लॉन्ग टर्म प्रोसेस है, जिसपर सरकार को और लोगों को गंभीरता से काम करना होगा. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर EPCA समय-समय पर सरकारों के लिए दिशा-निर्देश भी जारी करता है. लेकिन कहीं पर सरकारों की इच्छाशक्ति और कहीं पर व्यवहारिक दिक्कतों के चलते नियमों का पालन हो ही नहीं पाता.

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दिल्ली में खुले में आग लगाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, लेकिन दिल्ली के किसी ना किसी नुक्कड़ पर कूड़ा जलता हुआ दिख ही जाएगा. यानी सवाल है कि कागज पर नियमों को उतारने के बाद सरकार प्रदूषण पर आखिर कैसे नियंत्रण पा सकती है. जब तक जमीनी तौर पर उसको लागू न किया जाए.

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