जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है. यह अब लोगों की नींद पर भी प्रभाव डाल रहा है. क्लाइमेट सेंट्रल की नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कई शहरों में रात का तापमान बढ़ रहा है. बढ़ता तापमान लोगों की सालाना नींद के 66 से 93 घंटे तक छीन रहा है. जिन शहरों में नींद के घंटों में सबसे ज्यादा कमी देखी गई है उनमें चेन्नई, नेल्लोर कोझिकोड टॉप पर हैं, जबकि मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और दिल्ली भी इस लिस्ट में शामिल है.
क्लाइमेट सेंट्रल की नई रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी लगातार बढ़ रही है. रिपोर्ट में 2020 से लेकर 2025 तक के डाटा का जिक्र किया गया है. इस दौरान औसतन हर व्यक्ति ने रात की गर्मी के कारण सालभर में करीब 56 घंटे की नींद गंवाई है. भारत के कई शहरों में सालाना नींद के घंटों में 80 से 90 घंटे तक की भी कमी आ रही है. सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत के शहरों में है. वहां सालभर में औसत नींद के 84 घंटे कम हो रहे हैं. जबकि दिल्ली में यह आंकड़ा 67 का है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 के दशक की तुलना में अब गर्मी के कारण कम नींद आने के घंटे दोगुना हो गए हैं. वैज्ञानिकों ने वास्तविक तापमान और उस संभावित तापमान की तुलना की, जो ग्लोबल वार्मिंग न होने पर होता. इसी आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि कुल नींद की कमी में जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका है.
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क्यों उड़ जाती है गर्मी में नींद?
इस बारे में जानने के लिए आजतक. इन ने सफदरजंग अस्पताल में कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ जुगल किशोर से बातचीत की है. डॉ किशोर कहते हैं कि अच्छी नींद के लिए शरीर का तापमान थोड़ा कम होना जरूरी होता है. बेहतर नींद के लिए तापमान 18 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए,लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण दिन और रात दोनों का तापमान बढ़ रहा है. अगर तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है तो शरीर के लिए खुद को ठंडा रखना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में शरीर बार- बार तापमान कंट्रोल करता है और खुद को ठंडा रखने की कोशिश करता है. इससे बार-बार नींद खुलने की समस्या हो जाती है.
भारत के इन 10 शहरों में नींद के घंटों में सबसे ज्यादा कमी
इन लोगों पर ज्यादा असर
गर्मी की वजह से नींद पूरी न हो पाने का असर भी सब पर एक जैसा नहीं होता. रात में तापमान बढ़ने का असर 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों पर,अधेड़ उम्र के लोगों की तुलना में दोगुना से भी ज़्यादा होता है. साथ ही, कम-मध्यम आय वाले देशों के लोगों पर इसका असर ज़्यादा आय वाले देशों के लोगों की तुलना में लगभग तीन गुना ज़्यादा होता है. इसी स्टडी में यह भी पाया गया कि महिलाओं और पहले से ही गर्म इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका असर ज़्यादा होता है, और जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, गर्मी की वजह से नींद पूरी न हो पाने की समस्या और भी गंभीर हो सकती है.
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अधूरी नींद बिगाड़ देती है सेहत
डॉ. किशोर कहते हैं कि अगर लंबे समय तक किसी व्यक्ति की नींद पूरी न हो तो इससे सेहत बिगड़ सकती है. इससे हाई बीपी, मोटापा मानसिक समस्याएं और इम्यूनिटी कमजोर होने का रिस्क बढ़ जाता है. डॉ किशोर के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ी समस्या है. इसका सीधा असर अब लोगों पर पड़ रहा है. तापमान बढ़ने से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी हो रही है. ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे को देखते हुए वैश्विक स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है.
क्या है क्लाइमेट सेंट्रल
क्लाइमेट सेंट्रल एक स्वतंत्र संगठन है. यह क्लाइमेट शिफ्ट इंडेक्स और शोध रिपोर्टों के माध्यम से जलवायु डेटा और विश्लेषण करता है. यह वैज्ञानिक संसाधन मुख्य रूप से समुद्र-स्तर में वृद्धि और तापमान परिवर्तन पर केंद्रित हैं. यह एक गैर-लाभकारी समाचार संगठन भी है, जिसमें वैज्ञानिक और पत्रकार शामिल हैं. यह संगठन जलवायु परिवर्तन विज्ञान और असल दुनिया पर इसके असर के बारे में रिसर्च और रिपोर्टिंग करता है.
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