जलवायु परिवर्तन से गेहूं की फसल पर संकट, बढ़ती गर्मी से उत्पादन और गुणवत्ता पर असर

Rising Heat Threatens India’s Wheat Harvest: बढ़ता तापमान, खासकर सर्दियों में गर्मी और रात के समय ज्यादा गर्मी पड़ने से देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उत्पादन कम हो रहा है और गेहूं की गुणवत्ता भी गिर रही है. जलवायु परिवर्तन अब भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया है.

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Rising Heat Threatens India’s Wheat Production (File Photo- PTI) Rising Heat Threatens India’s Wheat Production (File Photo- PTI)

आशुतोष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 02 जून 2026,
  • अपडेटेड 3:36 PM IST

जलवायु परिवर्तन का असर अब भारत की खाद्य सुरक्षा पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है. एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ता तापमान, विशेष रूप से सर्दियों में गर्मी और रात के समय तापमान में बढ़ोतरी देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रही है.

क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) की रिपोर्ट, 'व्हीट अंडर स्ट्रेस: क्लाइमेट चेंज, राइजिंग हीट एंड अडैप्टेशन पाथवेज इन इंडिया’स मेजर व्हीट-ग्रोइंग स्टेट्स' में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन दशकों में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में गेहूं की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है. 

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रिपोर्ट बनाने वाली प्रमुख लेखिका और क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बल्यान कहती हैं कि, भारत के गेहूं उत्पादन के सामने सबसे गंभीर लेकिन कम पहचाने गए खतरे में से एक रात के तापमान में लगातार वृद्धि है. गर्म रातें पौधों में श्वसन प्रक्रिया बढ़ा देती हैं, जिससे अनाज बनने के लिए आवश्यक कार्बोहाइड्रेट भंडार कम हो जाते हैं.

उन्होंने बताया कि फरवरी और मार्च में अचानक बढ़ने वाली गर्मी गेहूं के दाने भरने की अवधि को छोटा कर रही है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ रहा है. गेहूं के दाने छोटे और सिकुड़े हुए रह जाते हैं, जिससे कुल उत्पादन घटता है और गेहूं की क्वालिटी भी खराब हो जाती है.

रिपोर्ट के अनुसार, सभी प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में रात का तापमान दिन के तापमान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है. गुजरात में यह वृद्धि दिन के तापमान की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक दर्ज की गई है. वहीं, फरवरी का महीना सबसे तेजी से गर्म हो रहा है, जिसमें प्रति दशक 0.69 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है.

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क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला का कहना है कि, जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का जोखिम नहीं रह गया है. यह पहले से ही हमारे खाद्य तंत्र और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर रहा है. किसानों को लगातार फसल नुकसान, घटती गुणवत्ता और बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है. 

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु-स्मार्ट कृषि, बेहतर चेतावनी प्रणाली, टिकाऊ खेती और किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने वाले उपायों को प्राथमिकता दिए बिना देश की खाद्य सुरक्षा को लंबे समय तक सुरक्षित रखना कठिन होगा.

रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे रात के समय गर्मी का प्रभाव बढ़ रहा है. यह स्थिति विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चिंताजनक है, जो भारत के गेहूं उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं.

अध्ययन में पाया गया कि फूल आने, दाना भरने और पकने जैसे महत्वपूर्ण चरण बढ़ते तापमान से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं. फरवरी और मार्च में बढ़ती गर्मी फसल की वृद्धि अवधि को कम कर रही है, जिससे दाने छोटे और सिकुड़े हुए रह जाते हैं तथा उत्पादन में गिरावट आती है. इसके अलावा, कटाई के दौरान होने वाली बेमौसम बारिश फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ भंडारण हानि भी बढ़ा रही है.

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रिपोर्ट में गुजरात और पंजाब के किसानों के अनुभवों का भी जिक्र किया गया है. किसानों ने खराब अंकुरण, कम टिलरिंग, बढ़ते कीट प्रकोप और घटती गुणवत्ता जैसी समस्याओं की जानकारी दी है. छोटे और सीमांत किसान इन चुनौतियों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर बुवाई, गर्मी-सहनशील किस्मों का उपयोग, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और मौसम आधारित सलाह सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि रणनीतियों को तेजी से लागू करना होगा.


 

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