Review: हंसी गायब, नींद की झपकी दे जाती है दिलजीत-कृति सेनन की अर्जुन पटियाला

बॉलीवुड में कभी-कभी फिल्मकारों और एक्टर्स से फिल्म बनाने में गलतियां हो जाती हैं और उन्हीं गलतियों में से एक है अर्जुन पटियाला. आइए समीक्षा में जानते हैं कैसे...

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दिलजीत दोसांझ और कृति सेनन दिलजीत दोसांझ और कृति सेनन

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 जुलाई 2019,
  • अपडेटेड 6:01 PM IST
फिल्म:अर्जुन पटियाला
1.5/5
  • कलाकार :
  • निर्देशक :रोहित जुगराज

बॉलीवुड में कभी-कभी फिल्मकारों और एक्टर्स से फिल्म बनाने में गलतियां हो जाती हैं और उन्हीं गलतियों में से एक है अर्जुन पटियाला. जब ये फिल्म बनाई तो क्या सोचा था दर्शक खुश होंगे, शाबाशी देंगे? नहीं, भाई नहीं. दर्शक यहां सिनेमा हॉल में बैठकर उबासियां ले रहे हैं और अपने आप को झपकियां लेने से रोक रहे हैं. इस इंतजार में कि अभी शायद कुछ अच्छा होगा, कुछ मजा आएगा. लेकिन अफसोस अंत तक ऐसा हुआ नहीं.

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अभी फिल्म में एक कमी हो तो मैं नजरअंदाज करूं भी, लेकिन यहां तो पूरी फिल्म ही डिस्फंक्शनल निकल गई, तो क्या किया जाए?

खैर फिल्म अर्जुन पटियाला के बारे में बात करते हैं. मुझे ये बताने में काफी उलझन हो रही है कि फिल्म की कहानी आखिर है क्या. क्योंकि फिल्म की कोई कहानी ही नहीं है. कहीं से भी, कुछ भी, हो रहा है और सोच रहे हैं भाई क्या हो रहा है? फिल्म की शुरुआत होती है एक डायरेक्टर और राइटर की बातचीत से.

डायरेक्टर, राइटर से पूछता है कि जिस फिल्म की कहानी वो लेकर आया है उसमें क्या-क्या है. राइटर एक-एक करके बताता है कि उसकी कहानी में आइटम सॉन्ग, 4 विलेन, हीरो और हीरोइन हैं और सनी लियोनी को वो इसमें कहीं ना कहीं फिट कर लेगा. ये सुनकर डायरेक्टर खुश हो जाता है और फिल्म बनाने की तैयारी का ऐलान कर देता है.

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लेकिन राइटर चाहता है कि उसकी कहानी को एक बार सुन लिया जाए. तो वो डायरेक्टर को मनाता है और बस यही से शुरू होता है टार्चर. तो राइटर की फिल्म की कहानी शुरू होती है अर्जुन पटियाला (दिलजीत दोसांझ) से जो जूडो करता है और पुलिसवाला बनना चाहता है. अर्जुन, बचपन से ही आईपीएस अमरजीत सिंह गिल (रोनित रॉय) को देखकर बड़ा हुआ है और उसी के जैसा बनना चाहता है.

अर्जुन जूडो कॉम्पिटिशन जीतता है और उसकी पोस्टिंग फिरोजाबाद पुलिस चौकी में हो जाती है. अब फिरोजाबाद पुलिस चौकी का हाल किसी तबेले से कम नहीं है. मतलब इस चौकी में सही में एक विक्टोरिया नाम की भैंस बंधी है, जिसपर मुंशी ओनिडा (वरुण शर्मा) को क्रश है.

खैर अर्जुन पटियाला आते हैं फिरोजाबाद और शुरू होता है चोर-पुलिस का खेल. इस चोर पुलिस के खेल से पहले अर्जुन शहर की पत्रकार ऋतू रंधावा के प्यार में पड़ जाते हैं. अर्जुन के कंधों पर शहर से क्राइम मिटाने का जिम्मा है और इसके लिए उसे बहुत दिमाग लगाकर अपना काम करना है. साथ ही उसे अपनी लव स्टोरी को भी बचाना और आगे बढ़ाना है.

जैसा कि मैंने पहले बताया फिल्म की कहानी कुछ खास नहीं है. इसे अगर ढंग से लिखा जाता तो शायद कुछ हो सकता था, लेकिन कहानी अगर दर्शकों को समझ ही ना आए तो फिर क्या फायदा. फिल्म की शुरुआत कहीं से होती है और बीच में आकर आपको लगता है कि इसे ना बनाते तो कुछ नुकसान नहीं था बल्कि नुकसान होने से बच जाता. कहानी तो नाजुक थी ही साथ ही एक्टर्स की परफॉरमेंस ने भी निराश किया.

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फिल्म में दिलजीत दोसांझ, कृति सेनन और वरुण शर्मा लीड रोल्स में हैं. अर्जुन पटियाला के रोल में दिलजीत दोसांझ ने अच्छा काम किया. इतना अच्छा तो नहीं कि आप उनकी तारीफें करते फिरें, लेकिन झेलने लायक सही थे. कृति सेनन का 'बरेली की बर्फी' वाला हैंगओवर कब जाएगा ये समझना थोड़ा मुश्किल है. उनके हर सीन को देखकर आपको फिल्म बरेली की बर्फी ही याद आएगी.

वरुण शर्मा भी कुछ खास नहीं थे. उनका डायलॉग बाजी करने का अलग तरीका है, जो काफी मजेदार है. बस उसके अलावा उनकी परफॉरमेंस में कुछ खास नहीं है. आईपीएस गिल के रोल में रोनित रॉय ने काफी निराश किया. रोनित रॉय इंडस्ट्री के बढ़िया एक्टर्स में से एक हैं और उनका ये छोटा सा रोल करना भी काफी खटक रहा है.

इसके अलावा फिल्म में सीमा पाहवा, सनी लियोनी और मोहम्मद जीशान अयूब हैं, जिन्होंने ठीकठाक काम किया है. फिल्म का एक भी किरदार आप अपने साथ घर लेकर नहीं आते. आप उन्हें देखते हैं और भूल जाते हैं. इसके अलावा फिल्म में कैमियो अच्छे थे. डायरेक्टर के रोल में पंकज त्रिपाठी और राइटर के रोल में अभिषेक बनर्जी काफी अच्छे थे.

डायरेक्टर रोहित जुगराज ने इस फिल्म को बॉलीवुड के हिसाब से बनाया ही नहीं है. पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री को सरदार जी और सरदार जी 2 जैसी बढ़िया फिल्में दे चुके रोहित इस फिल्म को काफी हद तक संभाल नहीं पाए. दिलजीत दोसांझ और रोहित जुगराज की हिट जोड़ी को जहां फिल्म अर्जुन पटियाला से कमाल करना था वहीं इनकी जोड़ी ही टाय टाय फिश हो गई.

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फिल्म के कुछ डायलॉग और जोक्स अच्छे हैं. फिल्म में फन एलिमेंट्स खूब डाले गए हैं, जो कहीं कहीं आपको हंसाते हैं. फिल्म के कुछ सीक्वेंस भी अच्छे हैं. लेकिन इसके अलावा ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे आप देखना चाहेंगे. सिर्फ 1 घंटे और 47 मिनट की ये फिल्म आपको इतनी लम्बी लगने लगती है कि आप थिएटर से बाहर आने को तरसने लगते हैं.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ठीक है. सचिन-जिगर का म्यूजिक अच्छा है हालांकि फिल्म में गाने जब भी आते हैं आप अपना माथा पकड़ लेते हैं कि अभी क्यों? दिलजीत दोसांझ का गाया गाना दिल तोड़ेया आपको सुनने में अच्छा लगेगा. मुझे इस फिल्म को देखने के लिए कोई कारण समझ नहीं आ रहा है तो आपकी मर्जी है अगर जाना हो तो जा सकते हैं.

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