कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? ज‍िसने खोला हजारों मौतों का राज, बेरहमी से मारा गया 'सतलुज' का हीरो

फिल्म 'सतलुज' मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की लाइफ पर है, जिन्हें कथित तौर 1995 में पंजाब पुलिस ने अगवा कर मार डाला था. अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि कोई पुलिस अगवा कर किसी को कैसे मार सकती है? लेकिन इन सवालों से पहले आपको जसवंत सिंह खालड़ा के बारे में जानना जरूरी है.

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कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? (Photo: ITG) कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? (Photo: ITG)

शिखर नेगी

  • नई दिल्ली,
  • 05 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 4:09 PM IST

'मुझे बचाओ... प्लीज थोड़ा पानी दे दो...' ये किसी आम इंसान के आखिरी शब्द नहीं थे, बल्कि उस शख्स की दर्दनाक पुकार थी जिसने पंजाब में हजारों बेगुनाहों के लिए अपनी आवाज बुलंद की थी.

कल्पना कीजिए, एक इंसान जिसे जमीन पर पटककर बुरी तरह पीटा गया हो, जिसके पैरों को 180 डिग्री तक फैलाया गया हो और सात पुलिसवाले जिसके पेट और सीने को लातों से रौंद रहे हों. पानी मांगने पर उसे पानी नहीं, बल्कि दो गोलियां मिलती हैं. ये कोई फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि पंजाब पुलिस के एक पूर्व स्पेशल अफसर कुलदीप सिंह द्वारा बताया गया वो खौफनाक सच है, जिसमें मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की बेरहमी से जान ले ली गई थी.

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इन्हीं जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी और उनके खौफनाक अंत पर बनी दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' (जिसका पहला नाम 'पंजाब 95' था) बिना किसी बड़े शोर-शराबे और प्रचार के ओटीटी (OTT) पर रिलीज हो गई है. हनी त्रेहान के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म ने एक बार फिर इतिहास के उन गहरे जख्मों को कुरेद दिया है. आपके जेहन में भी यह सवाल उठ रहा होगा कि पुलिस ही किसी को अगवा कर इतनी बेरहमी से कैसे मार सकती है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको पंजाब के उस काले इतिहास और जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी को करीब से समझना होगा.

पंजाब का वो खूनी और खौफनाक दौर
बात 1980 और 90 के दशक की है, जब पंजाब में दहशत का माहौल अपने चरम पर था. केपीएस गिल उस वक्त पंजाब के डीजीपी हुआ करते थे और खालिस्तानी आंदोलन तेजी से पैर पसार रहा था. 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. इसके बाद जो सिख विरोधी दंगे भड़के, उसने पूरे देश को खून के आंसू रुलाए. इसी उथल-पुथल के बीच पंजाब पुलिस पर बेहद गंभीर आरोप लगने लगे. कहा जाने लगा कि पुलिस बिना किसी ठोस सबूत के बेगुनाहों को आतंकी बताकर उनके फर्जी एनकाउंटर कर रही है. फिल्म 'सतलुज' की कहानी इसी खूनी दौर की नींव पर खड़ी है.

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25 हजार लापता सिख और 'लावारिस' लाशों का सच
इन्हीं खौफनाक हालातों के बीच ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा ने एक ऐसा दावा किया जिसने पूरे सिस्टम की नींद उड़ा दी. उन्होंने कहा कि 1984 से 1994 के एक दशक के बीच, पंजाब में पुलिस धड़ल्ले से फर्जी एनकाउंटर कर रही है और करीब 25 हजार सिख रहस्यमयी तरीके से लापता हैं. उनका सबसे सनसनीखेज दावा यह था कि पुलिस ने लगभग 2000 सिखों को 'लावारिस' बताकर या तो गुपचुप तरीके से उनका अंतिम संस्कार कर दिया, या फिर उनकी लाशों को नदियों में बहा दिया. दिवंगत पॉलिटिकल एक्टिविस्ट राम कुमार नारायण ने भी ऑस्ट्रेलियन डॉक्यूमेंट्री 'India Who Killed The Sikhs' में बताया था कि उस दौरान पुलिस अक्सर लड़कों को घर से उठाकर ले जाती, उन पर झूठे केस थोपती और रिहाई के एवज में लाखों रुपये की फिरौती मांगती थी.

एक बैंक डायरेक्टर की मौत से उठा पर्दा
इस पूरे काले सच से पर्दा तब उठा जब साल 1992 में पुलिस ने पियारा सिंह नाम के एक शख्स को गिरफ्तार किया. पियारा सिंह अमृतसर के सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक में बतौर डायरेक्टर काम करते थे. बैंक में उनके सहकर्मी रहे जसवंत सिंह खालड़ा को जब यह भनक लगी कि पियारा सिंह को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया है. हद तो तब हो गई जब उन्हें पता चला कि अमृतसर के दुर्गियाना मंदिर श्मशान घाट में बिना किसी को खबर दिए पियारा सिंह का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया है.

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मल्लिका कौर की किताब 'Faith, Gender, and Activism in The Punjab Conflict' में इस पूरी घटना का जिक्र मिलता है. जसवंत की पत्नी परमजीत कौर ने बताया कि जब जसवंत उस श्मशान घाट पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि वहां रोज 8 से 10 ऐसी ही लाशें लाई जाती हैं. जसवंत ने अकाली दल की ह्यूमन राइट्स विंग के चेयरमैन जसपाल सिंह ढिल्लों के साथ मिलकर वहां के शुरुआती रजिस्टरों को खंगाला. सच डराने वाला था. सिर्फ 1992 में ही उस एक श्मशान घाट पर 300 से ज्यादा बेनाम लाशें जलाई गई थीं. आगे की जांच में पता चला कि यह हाल सिर्फ एक जगह का नहीं, बल्कि बाकी श्मशान घाटों पर भी पुलिस गुपचुप तरीके से लावारिस लाशों को ठिकाने लगा रही थी.

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?
अमृतसर के खालरा गांव में पैदा हुए जसवंत सिंह 1980 के दशक में एक आम बैंक कर्मचारी थे. लेकिन जब उनके अपने करीबी दोस्त और साथी एक-एक कर गायब होने लगे, तो उन्होंने चुप बैठने के बजाय सिस्टम से टकराने का फैसला किया. वे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता बन गए. अपनी लंबी और खतरनाक तहकीकात के बाद, आखिरकार उन्होंने अमृतसर नगर निगम की वो फाइलें ढूंढ निकालीं, जिनमें उन सिखों की पूरी जानकारी दर्ज थी जिन्हें पंजाब पुलिस ने मारकर गैर-कानूनी तरीके से जला दिया था. इस खुलासे ने उन्हें पूरी दुनिया में पहचान दिला दी.

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घर के बाहर से अपहरण और बेरहम हत्या
अपने इन्हीं खुलासों के चलते खालड़ा पुलिस की आंखों की किरकिरी बन चुके थे. सितंबर 1995 की बात है, उन्हें आखिरी बार अपने घर के बाहर अपनी कार धोते हुए देखा गया था. वहीं से उन्हें दिनदहाड़े अगवा कर लिया गया. कई चश्मदीदों ने पुलिस के खिलाफ गवाही भी दी. जब 1996 में सीबीआई (CBI) ने इस मामले की जांच की, तो पुख्ता सबूत मिले कि अधिकारियों ने खालड़ा को तरनतारन पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से हिरासत में रखा था.

discoversikhism में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरी खौफनाक साजिश एसएसपी (SSP) अजीत सिंह संधू के इशारे पर रची गई थी, जिसकी निगरानी डीएसपी (DSP) जसपाल सिंह कर रहे थे. (बता दें कि अजीत सिंह संधू ने बाद में आत्महत्या कर ली थी). कई सालों तक चले केस के बाद, इस अपहरण और हत्या में शामिल पुलिस अधिकारियों को अदालत ने दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई.

वो लड़ाई जो आज भी जिंदा है
जसवंत सिंह खालड़ा की खौफनाक हत्या के बाद भी उनकी आवाज को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सका. उनकी पत्नी, बीबी परमजीत कौर खालरा ने अपने पति के गुजरने के बाद भी उनकी इस लड़ाई को पूरी मजबूती से आगे बढ़ाया. उनके परिवार में उनके दो बच्चे, नवकिरण कौर और जनमीत सिंह भी इसी संघर्ष का हिस्सा हैं.

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साल 1995 में कनाडा में अपनी जिंदगी की आखिरी स्पीच देते हुए जसवंत सिंह ने कहा था- 'अब मुझे विश्वास है कि आज जब अंधेरा अपनी पूरी ताकत से सच्चाई पर हावी होगा, तो कुछ और नहीं तो मैं यही कहूंगा कि 'अणखीला पंजाब' (स्वाभिमानी पंजाब) वह रोशनी है जो उसे चुनौती देगी. और मैं उस गुरु से प्रार्थना करता हूं जो सच्चाई से अपनी पहचान रखता है, कि वह इस रोशनी को हमेशा जलाए रखे.'

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