Dharmendra Tribute: डायलॉग से 'इक्कीस' हैं धर्मेंद्र की आंखें, इमोशनल करती है ये फिल्म

89 साल के धर्मेंद्र को 'इक्कीस' के जरिए आखिरी पर पर्दे पर देखना बेहद इमोशनल एक्सपीरिएंस है. लेकिन उन्हें देख आपको खुशी भी बहुत होगी. इतनी उम्र में भी उन्होंने कमाल परफॉरमेंस दी है.

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धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म 'इक्कीस' हुई रिलीज (Photo: IMDb) धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म 'इक्कीस' हुई रिलीज (Photo: IMDb)

पल्लवी

  • नई दिल्ली,
  • 01 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:00 AM IST

ये सच है कि हम सभी को एक न एक दिन दुनिया छोड़कर जाना है. लेकिन जब भी कोई अपना हमें विदा लेता है, दर्द उतना ही होता है. अब वो अपना हमारे खुद के घर का हो, या फिर एक सुपरस्टार जिसने दशकों तक एक परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों को एंटरटेन किया हो. पर्दे पर दिखने वाले एक्टर्स भी तो हमारे अपने होते हैं. हमारे घर का हिस्सा, हमारी बीच होने वाली बातों में शुमार... कभी किसी सीन की वजह से, कभी डायलॉग के लिए.

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ऐसे ही सितारे थे धर्मेंद्र. बॉलीवुड के ही-मैन. जो ही-मैन बनने से पहले फीमेल फैंस की धड़कन हुआ करते थे. उनके रोमांटिक अवतार से लाखों महिलाओं को प्यार था. उनकी खूबसूरती का हर कोई कायल था. पर्दे पर जब धर्मेंद्र के प्यार में हीरोइन पागल होती थीं, तो ऑफस्क्रीन उन्हें देखने वाली लड़कियों के दिल भी मचलते थे. वक्त बदला और धर्मेंद्र रोमांटिक से एक्शन हीरो बने. लेकिन उन्हें मिलने वाला प्यार कभी कम नहीं हुआ. दशकों से चाहनेवालों का प्यार पा रहे धर्मेंद्र ने 24 नवंबर को दुनिया को अलविदा कह दिया. ऐसे में उनकी यादों के अलावा हम सभी के पास उनकी फिल्म 'इक्कीस' है, जो पर्दे पर रिलीज हो गई है.

नजरों से बात करते हैं धर्मेंद्र

सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित फिल्म 'इक्कीस' का ऐलान जब हुआ तब किसी ने नहीं सोचा था कि ये धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म बनेगी. इस पिक्चर में धर्मेंद्र ने अरुण खेत्रपाल के बूढ़े पिता रिटायर्ड ब्रिगडियर एमएल खेत्रपाल का किरदार निभाया है. ये किरदार भी धर्मेंद्र के दूसरे किरदारों की तरह आपने जहन में छाप छोड़ने वाला है. 1971 में भारत-पाक के बीच हुए कारगिल युद्ध में अपने 21 साल के बेटे को खो चुके एमएल खेत्रपाल के रोल में धर्मेंद्र का बेहतरीन काम आपको याद दिलाता है कि वो कितने बढ़िया कलाकार थे.

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इस फिल्म में जितना स्क्रीनटाइम अरुण खेत्रपाल का रोल निभा हीरो अगस्त्य नंदा को मिला है, लगभग उतना ही धर्मेंद्र का भी है. पिक्चर के फर्स्ट हाफ में आपको ज्यादातर धर्मेंद्र दिखाई देते हैं. अपने बेटे के शहीद होने के 30 साल बाद रिटायर्ड ब्रिगडियर एमएल खेत्रपाल उसी देश गए हैं, जिसने उनसे उनका 21 साल का बेटा छीना था. मगर उनके मन में कोई मैल नहीं है, बल्कि खुशी है. उस वतन को दोबारा देखने की जो कभी उतना अपना हुआ करता था. जहां उनका परिवार पला-बढ़ा और जहां उनके बच्चे ने अपनी आखिरी सांस ली. उन्हें आज भी पाकिस्तान अपने देश जैसा ही लगता है. सरगोधा, जहां वो पैदा हुए थे, उससे उतना ही प्यार है, जितना बचपन में हुआ करता था. और आज भी उन्हें अपने बेटे की याद उतनी ही आती है, जितनी पहले आती थी.

इमोशनल कर देगी परफॉरमेंस

89 साल के धर्मेंद्र को 'इक्कीस' के जरिए आखिरी पर पर्दे पर देखना बेहद इमोशनल एक्सपीरिएंस है. लेकिन उन्हें देख आपको खुश भी बहुत होगी. इतनी उम्र में भी उन्होंने कमाल परफॉरमेंस दी है. लाजिमी है कि उम्र और सेहत की वजह से कई बार उनके डायलॉग समझ नहीं आते. मगर उनकी बातों और पिक्चर की फीलिंग एकदम वहीं की वहीं है. अपनी बात में सफाई भले ही धर्मेंद्र न रख पाए हों, लेकिन उनके चेहरे और आंखों से सबकुछ साफ-साफ बयां हो रहा है. ज्यादातर फिल्म में वो अपनी आंखों से बात करते हैं. उनकी नजरें, उनकी जुबान से निकली बातों और मन के भाव को बखूबी आप तक पहुंचाती हैं.

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एक पिता का दर्द, एक फौजी का गर्व, एक बूढ़े शख्स के अंदर की कशमकश, पुराने दिनों की यादें... इन सभी चीजों को मन में दबाए जी रहे एमएल खेत्रपाल के रूप में जब आप धर्मेंद्र को देखते हैं, तो लगता है कि यही असली शख्स है, कोई एक्टर नहीं. शायद असली एमएल खेत्रपाल को भी धर्मेंद्र की परफॉरमेंस पसंद आती. फिल्म के लिए धर्मेंद्र ने एक बहुत खूबसूरत कविता लिखी थी, उसे आप 'इक्कीस' में सुनेंगे भी. इस कविता का नाम है- 'आज भी जी करता है, पिंड अपने नु जानवा'.

इस कविता को सुनते हुए अपनी आंखों से आंसू बहना रोक पाना मुश्किल है. यहां धर्मेंद्र अपनी मिट्टी और जड़ों को याद कर रहे हैं. सभी जानते हैं कि गांव से दूर होने के बावजूद उन्हें उससे जुड़ाव था. इस कविता में उनके गांव की यादों, जैसे तालाब में नहाना, हंसिया से चारा लाना, मिट्टी में कबड्डी खेलना और वहां के लोगों के प्रति उनके गहरे लगाव के बारे में आपको जानने को मिलता है. यह उनके जीवन के सादगी भरे पलों के बारे में है, जो शायद उन्हें शहर की दौड़-भाग में नहीं मिले. और पिक्चर के अंत में उनकी जुबान से मिला मैसेज संजोकर रखने की चीज है.

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