कान्स फिल्म फेस्टिवल (Cannes 2026) का पर्दा गिर चुका है. हर साल की तरह इस बार भी भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया इसी बात से गुलजार रहे कि किस बॉलीवुड एक्ट्रेस ने कौन सा गाउन पहना, किस इंटरनेट इन्फ्लुएंसर ने रेड कार्पेट पर कैसी वॉक की और किसका लुक 'हिट' या 'फ्लॉप' रहा. करोड़ों रुपयों के पीआर (PR) स्टंट, चकाचौंध और फैशन शो के इस भारी शोर-शराबे के बीच, किसी ने ये पूछना जरूरी नहीं समझा कि सिनेमा के इस टॉप इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में हमारी कितनी फिल्में गई हैं?
जबकि हमारे ठीक बगल में बसे, हमारे छोटे से पड़ोसी नेपाल ने वो कर दिखाया जो सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है. बड़े कम बजट में बनी नेपाल की एक छोटी सी इंडिपेंडेंट फ़िल्म एलीफेंट्स इन द फॉग ने कान्स फिल्म फेस्टिवल के बेहद प्रतिष्ठित 'अन सर्टेन रिगार्ड' सेक्शन में 'जूरी प्राइज' जीतकर पूरी दुनिया के फिल्म लवर्स को चौंका दिया. चौंकने की बड़ी वजह ये भी है कि नेपाल से ये पहली फ़िल्म थी जो कान्स में पहुंची थी.
नेपाल की ये जीत इंडियन फिल्म इंडस्ट्री, हमारी ऑडियंस और सिस्टम के चेहरे पर एक बड़ा आईना भी है, जो सिनेमा को कहानी के बजाय सिर्फ एक 'फैशन वीक' ही समझे जा रहे हैं. जबकि हमारा सिनेमा कान्स में पहली बार टॉप अवार्ड तभी ले आया था जब हम आजाद भी नहीं थे!
क्या है कान्स जीतने वाली नेपाली फिल्म की कहानी?
डायरेक्टर अविनाश विक्रम शाह की एलीफेंट्स इन द फॉग नेपाल के एक गांव में रहने वाली ट्रांसजेंडर (किन्नर) महिलाओं के जीवन, उनकी रोज़मर्रा के स्ट्रगल और उनके अस्तित्व के संकट पर बेस्ड है. फिल्म की कहानी पिरती नाम की किन्नर महिला की है जिसे अपनी टोली के ढोलक बजाने वाले से प्यार हो जाता है. उसे पता है कि उसकी कम्युनिटी में तो ऐसे रिश्ते स्वीकार ही नहीं हैं. इसलिए वो अपने प्रेमी के साथ दिल्ली भाग जाना चाहती है. लेकिन किन्नर परंपरा में उसकी बेटियों का क्या होगा? इस बीच उसकी सबसे फेवरेट बेटी अप्सरा अचानक गायब हो जाती है. इस कहानी में हाथियों से जुड़ा एक मिथकीय एंगल भी है.
अविनाश विक्रम शाह की फिल्म में कोहरा, किन्नर किरदारों के 'अदृश्य' होने, और विशाल हाथी उनके मज़बूत, न झुकने वाले आत्मसम्मान का प्रतीक है. उन्होंने फिल्म में ट्रांसजेंडर समाज को जिस सम्मान और संवेदनशीलता के साथ दिखाया है उसकी दुनिया भर में तारीफ हो रही है. अवॉर्ड लेते हुए निर्देशक अविनाश ने बेहद भावुक होकर कहा— ‘लंबे समय तक इन किरदारों को अंधेरे में रखा गया. इस अवॉर्ड ने हाशिए की इस कहानी को दुनिया की सबसे बड़ी रोशनी में ला दिया है.’
भारतीय और नेपाली फ़िल्म की जीत में कॉमन― फंडिंग की कमी!
नेपाल की इस ऐतिहासिक जीत से 2024 में कान्स जीतने वाली, भारतीय फिल्ममेकर पायल कपाड़िया की फिल्म ऑल वी इमेजिन एज़ लाइट (All We Imagine As Light) याद आती है. नेपाली फ़िल्म ने जिस 'अन सर्टेन रिगार्ड' सेक्शन में अवॉर्ड जीता है वो कान्स का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कॉम्पिटिशन है. जबकि पायल की फ़िल्म ने 'ग्रैंड प्रिक्स' जीता था, जो कान्स के मुख्य कॉम्पिटिशन का सेकंड-बेस्ट अवॉर्ड है. यानी कॉम्पिटिशन के मामले में पायल की जीत बड़ी थी. लेकिन दोनों फिल्मों की जीत को उनके देश में जो रिसेप्शन मिला, उसमें बहुत बड़ा फर्क है.
दिलचस्प और कड़वी बात यह है कि एलीफेंट्स इन द फॉग और पायल कपाड़िया की फिल्म, दोनों ही दक्षिण एशियाई सिनेमा की एक बहुत बड़ी मजबूरी और कड़वे सच को उजागर करती हैं― फंडिंग की कमी. भारत हो या नेपाल, जब भी कोई इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर समाज की किसी कड़वी हकीकत या ट्रांसजेंडर कम्युनिटी जैसे गंभीर विषयों पर फिल्म बनाना चाहता है, तो बड़े-बड़े कमर्शियल प्रोडक्शन हाउस या कॉर्पोरेट स्टूडियोज अपनी तिजोरियां बंद कर लेते हैं.
भारत में फिर भी दशकों तक सरकार ने इंडिपेंडेंट फिल्मों को फंड किया. सत्यजित रे, कुंदन शाह, केतन मेहता और मीरा नायर जैसे फिल्ममेकर्स का क्रांतिकारी सिनेमा भारत सरकार के ही फंड से बना था. मगर आज उस फंड का स्ट्रक्चर इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स को बहुत सपोर्ट करने वाला नहीं है. नेपाल में तो फिल्मों की फंडिंग को सपोर्ट करने वाला सिस्टम उतना भी नहीं है. लेकिन पायल और अविनाश, दोनों को ही अपनी फिल्मों के लिए अपने देश में पैसा नहीं मिला. पायल की फ़िल्म को मुख्यतः फ्रेंच कंपनी ने प्रोड्यूस किया था. साथ में कई और यूरोपियन देशों की कम्पनियां थीं. एलीफेंट्स इन द फॉग को भी फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील और नॉर्वे जैसे देशों के इंटरनेशनल पार्टनर्स के सहयोग से फंड किया गया.
सरकारी रवैये का फर्क: 'सोशल मीडिया की बधाई' बनाम 'जमीनी साथ'
पायल और अविनाश की जीत में सबसे बड़ा फर्क है― अपने फिल्ममेकर की जीत में उनके देशों की सरकार का रवैया. यहां पर नेपाल ने भारत को मात दे दी है.
पायल की फ़िल्म में, भारत में सिनेमा को बढ़ावा देने के लिए बने सरकारी फंड से कोई योगदान नहीं था. न ही नेपाल ने अविनाश की फ़िल्म को फंडिंग दी थी. लेकिन अविनाश और उनकी टीम जब कान्स में अपनी फिल्म के अवॉर्ड जीतने का जश्न मना रहे थे, तो काठमांडू की डिप्टी मेयर सुनीता डंगोल उनके साथ वहीं मौजूद थीं. उन्होंने कान्स के रेड कार्पेट पर पारंपरिक नेवारी लिबास पहनकर अपनी फिल्म, अपने देश और अपने ट्रांसजेंडर कलाकारों का वैश्विक मंच पर गर्व से नेतृत्व किया.
जब पायल कपाड़िया ने कान्स में ग्रैंड प्रिक्स जीता था, तो भारत के प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर बधाई संदेश पोस्ट किए थे. उन्होंने इसे 'देश का गौरव' और 'FTII की पूर्व छात्रा की सफलता' बताया था. लेकिन ज़मीनी हकीकत यह थी कि उसी FTII ने सालों पहले पायल पर एक छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कोर्ट केस कर दिया था. ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ करते हुए पायल को डायरेक्शन कोर्स के लिए मिलने वाला ग्रांट भी रोक दिया गया था. आंदोलन की वजह थी― एक्टर से नेता बने गजेंद्र चौहान को FTII का चेयरमैन बनाया जाना. FTII केंद्र सरकार के फंड से चलने वाली सरकारी संस्था है. यानी सरकारी सिस्टम ने बहुत पहले ही पायल का साथ छोड़ दिया था.
शायद यही वजह थी कि सरकार का कोई मंत्री या बड़ा सांस्कृतिक प्रतिनिधि उनकी टीम का हौंसला बढ़ाने कान्स नहीं पहुंचा था. लेकिन जब पायल जीत गईं तो जैसा कि अनुराग कश्यप ने कहा, उनकी जीत में क्रेडिट लेने की होड़ मच गई. मगर पायल की जीत को कुछ वक्त बीतते ही FTII के वक्त से पायल के खिलाफ खड़े आए सिस्टम ने रंग दिखाना शुरू कर दिया.
पायल की जीत का सरकारी ‘ईनाम’!
मई 2024 में पायल की जीत को ‘भारतीय गर्व’ बताकर सेलिब्रेट किया गया था. लेकिन जून में पायल को फिर से पुणे की अदालत में, 9 साल पुराने FTII वाले पुराने केस की सुनवाई के लिए हाजिर होना पड़ा. वही केस जिसके लिए सोशल मीडिया के एक बड़े धड़े ने भी उन्हें ‘आंदोलनजीवी’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का हिस्सा बताकर ट्रोल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
सितंबर में भारत की सर्वोच्च फिल्म संस्था फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) ने ऑस्कर्स की दौड़ के लिए भारत की ऑफिशियल एंट्री चुनी―किरण राव की लापता लेडीज. सिनेमा के तमाम ग्लोबल आइकॉन, कान्स के टॉप अवार्ड को ऑस्कर्स से ऊपर रखते हैं. कान्स जीतने वाली फिल्मों को ऑस्कर की फेवरेट्स में गिना जाता है. लेकिन FFI ने भारत की कान्स विनर को छोड़कर, लापता लेडीज को चुना था.
जब तमाम सिनेमा हस्तियों ने इसपर सवाल उठाया तो FFI के अध्यक्ष ने कहा ‘यह फिल्म हमें भारतीय फिल्म लगी ही नहीं, यह भारत के बैकग्राउंड पर बनी यूरोपियन फिल्म जैसी लगी.’ इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि ऑस्कर के लिए ऑफिशियल भारतीय फिल्म चुनने वाली ज्यूरी एक ‘पॉजिटिव फ़िल्म’ आगे भेजना चाहती थी. इसलिए उन्होंने पायल की फ़िल्म को छोड़कर लापता लेडीज को चुना.
FFI ने अर्बन महिलाओं के स्ट्रगल की कहानी को उसी पारंपरिक ‘पॉजिटिव’ भारतीय लॉजिक से इग्नोर कर दिया कि ‘शहरी महिलाओं की समस्या क्या घूंघट में दबी ग्रामीण महिलाओं से बड़ी है!’. मुंबई शहर के पुराने सीलन भरे घरों में रहकर आजाद जीवन खड़ा करतीं ‘अर्बन’ हॉस्पिटल नर्सों का स्ट्रगल और एक हिंदू-मुस्लिम प्रेम कहानी का यथार्थवाद, भारत के इस सिनेमाई सिस्टम को ‘नेगेटिव’ और ‘यूरोपियन’ लगा.
नेपाल भले ही एक छोटा और आर्थिक रूप से कमजोर देश है, लेकिन उसकी कान्स की जीत में उनके सरकारी प्रतिनिधि की मौजूदगी, उनके फिल्ममेकर को सरकार से मिले सांस्कृतिक और मोरल सपोर्ट का प्रतीक थी. नेपाल ने कला का सम्मान करना सिखाया. नेपाल ने इस फैक्ट को सेलिब्रेट किया कि उनके देश से निकले अविनाश ने इंडिपेंडेंट तरीके से फंडिंग जुटाकर नेपाल से निकली कहानी दिखाई.
नेपाल की सरकारी मशीनरी इस बात से आहत नहीं थी कि फ़िल्म में उनके समाज की कोई ‘नेगेटिव’ इमेज दिख रही है. नेपाल के सूचना मंत्री ने अविनाश की फ़िल्म को राष्ट्रीय उपलब्धि घोषित किया. सोशल मीडिया की औपचारिकता से दूर, नेपाल ने अपने फिल्ममेकर को गले लगाया.
कान्स में नेपाली फ़िल्म की जीत और उस जीत में सरकारी तंत्र का अपने फ़िल्ममेकर के साथ खड़े होना एक बहुत बड़ा प्रतीक है. इसकी रौशनी में पायल कपाड़िया की जीत और इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स के प्रति हमारे सिस्टम का दोहरा रवैया, स्पष्ट उजागर हो जाता है. पायल कपाड़िया, 50 से भी ज्यादा सालों बाद भारतीय सिनेमा को कान्स के मुख्य कॉम्पिटिशन में, दूसरा सबसे बड़ा अवॉर्ड जिताकर भारत लौटी थीं. और उन्हें ये दिखा दिया गया कि ‘सिस्टम’ से बड़ा कोई नहीं! पर क्या कभी ये ‘सिस्टम’ सोच पाएगा कि इस हरकत से दुनिया में उसकी ही छवि खराब होती है?
भारतीय दर्शकों और सिनेमा के लिए बड़ा सबक
नेपाल की फिल्म एलीफेंट्स इन द फॉग की यह शानदार जीत भारतीय दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री दोनों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है. यह जीत साबित करती है कि सिनेमा कभी भी महंगे कपड़ों, रेड कार्पेट की चकाचौंध या पीआर एजेंसियों द्वारा बनाई गई हाइप से महान नहीं बनता.
सिनेमा बनता है अपने समाज को आईना दिखाने वाली फिल्मों से. उन कहानियों से जो एक देश के हर समाज, हर तबके को रीढ़ की हड्डी सीधी रखने का साहस देती हैं और उनके संघर्ष की कहानी कहती हैं. सिनेमा बनता है उन आवाजों को स्क्रीन पर तस्वीर देने से जिन्हें समाज दबा देना चाहता है. ऐसी कहानियां कहना, ऐसी फिल्में बनाना ‘नेगेटिविटी’ या ‘देश की आलोचना’ नहीं है. ऐसी कहानियों को देखना और स्वीकार करना एक ऐसे मजबूत समाज की पहचान है, जो अपने विकास की रफ्तार के साथ-साथ, ठहरकर पूरे साहस से अपनी चूक को भी पहचानता है.
जहां हमारा मेनस्ट्रीम सिनेमा कान्स को सिर्फ एक 'लग्जरी फैशन शो' की तरह ट्रीट करने में व्यस्त रहता है. वहीं हमारे छोटे से पड़ोसी देश ने यह साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो और कहानी में दम हो, तो कोहरे के बीच से भी एक बेहद मज़बूत कहानी, एक दमदार फ़िल्म हाथी की तरह निकल सकती है. और पूरी दुनिया को अपना कायल बना सकती है. क्या भारतीय सिनेमा, दर्शक और हमारा सिस्टम अपने छोटे से पड़ोसी देश से कोई सबक सीखेगा?
सुबोध मिश्रा