तिंदवारी उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बांदा जिले की एक नगर पंचायत और तिंदवारी विकासखंड का मुख्यालय है. यह जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है. यह मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर एक बाजार कस्बा है, जो कभी पुराने सिमौनी परगना का प्रशासनिक केंद्र हुआ करता था और आज भी स्थानीय व्यापार तथा ग्रामीण गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र
है.
तिंदवारी के नाम पर एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है, जो 1974 के चुनावों से अस्तित्व में है. इससे पहले यह बांदा सदर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा था. यह हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदेश के तहत, जो 2012 के चुनावों से प्रभावी हुआ, तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र में जसपुरा, पैलानी, खपटिहा, चिल्ला, तिंदवारी, पपरेंदा, जौरही और मटौंध के कानूनगो सर्किल के साथ तिंदवारी और मटौंध नगर पंचायतें शामिल हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है, जबकि शहरी क्षेत्र का हिस्सा काफी छोटा है.
1974 के बाद से तिंदवारी में 14 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. इनमें 1981 का उपचुनाव भी शामिल है, जो 1980 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद कराया गया था. 1980 में यह सीट जीतने वाले कांग्रेस विधायक शिव प्रताप सिंह ने वी.पी. सिंह के विधानसभा में प्रवेश का रास्ता साफ करने के लिए इस्तीफा दे दिया था. राज्य का ऐसा मुख्यमंत्री, जो राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उसे पद संभालने के छह महीने के भीतर विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है.
कांग्रेस पार्टी ने यह सीट चार बार जीती है, जबकि बहुजन समाज पार्टी और भाजपा ने तीन-तीन बार जीत हासिल की है. भाजपा की जीत की संख्या में उसकी पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ की 1974 के पहले चुनाव में मिली जीत भी शामिल है. समाजवादी पार्टी ने यह सीट दो बार जीती है, जबकि जनता पार्टी और जनता दल को एक-एक बार जीत मिली है.
2012 में दलजीत सिंह ने 27 साल के अंतराल के बाद कांग्रेस के लिए यह सीट जीती. इस दौरान हुए छह चुनावों में पार्टी अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखने के लिए संघर्ष करती रही थी. दलजीत सिंह ने समाजवादी पार्टी के विशंभर प्रसाद को 15,015 वोटों से हराया. उस चुनाव में तीसरे स्थान पर रही भाजपा ने 2017 में अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया. भाजपा के बृजेश कुमार प्रजापति ने बसपा के जगदीश प्रसाद प्रजापति को 37,407 वोटों से हराया.
बृजेश कुमार प्रजापति ने जनवरी 2022 में भाजपा छोड़ दी और अगले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे. उनके जाने का भाजपा पर बहुत कम असर पड़ा और पार्टी ने रामकेश निषाद के जरिए यह सीट बरकरार रखी. रामकेश निषाद को 86,812 वोट मिले, जबकि प्रजापति को 58,387 वोट मिले. इस तरह निषाद ने 28,425 वोटों से जीत दर्ज की.
तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का उदय लोकसभा चुनावों में भी इसी तरह देखने को मिला. 2009 में पार्टी चौथे स्थान पर रही थी, जबकि समाजवादी पार्टी ने बसपा पर 4,961 वोटों की बढ़त हासिल की थी और कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही थी. 2014 में भाजपा समाजवादी पार्टी से 26,938 वोट आगे निकल गई. 2019 में बसपा के मुकाबले उसकी बढ़त बढ़कर 31,496 वोट हो गई. 2019 में बसपा के साथ गठबंधन के तहत समाजवादी पार्टी ने हमीरपुर लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा था. 2024 में कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी के रूप में समाजवादी पार्टी ने वापसी की और भाजपा को कड़ी टक्कर दी. भाजपा के कुंवर पुष्पेंद्र सिंह चंदेल को 81,544 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के अजेंद्र सिंह लोधी को 76,516 वोट मिले. इस तरह भाजपा की बढ़त केवल 5,028 वोट रही.
पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 281,863 से बढ़कर 2017 में 309,634 हो गई और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह 316,721 थी. 2022 में यह संख्या 318,952 और 2024 में 324,061 हो गई. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 310,465 मतदाता दर्ज किए गए. यह 2024 के आंकड़े से 13,596 कम है, यानी इसमें 4.20 प्रतिशत की कमी आई है.
यहां मतदान प्रतिशत आमतौर पर मध्यम रहा है, हालांकि अलग-अलग चुनावों में इसमें उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2012 में मतदान प्रतिशत 57.60 रहा और 2017 में बढ़कर 59.72 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह बढ़कर 64.01 प्रतिशत हो गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह घटकर 61.66 प्रतिशत रह गया और 2024 के लोकसभा चुनाव में और गिरकर 57.64 प्रतिशत हो गया.
तिंदवारी हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है. अनुमान है कि मुस्लिम आबादी यहां की कुल जनसंख्या का लगभग 9.20 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी करीब 19.40 प्रतिशत है. प्रजापति और निषाद यहां के प्रमुख समुदायों में शामिल हैं. इनके अलावा ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य, कुर्मी, कुशवाहा, यादव, लोधी और केवट समुदाय भी यहां रहते हैं. अनुमान के अनुसार, लगभग 95.29 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि तिंदवारी और मटौंध कस्बों के मतदाता शेष 4.71 प्रतिशत हैं.
मुगल काल में आसपास का क्षेत्र सिमौनी परगना का हिस्सा था. ब्रिटिश शासन के दौरान तिंदवारी इस परगना का मुख्यालय था. 1860 में परगना समाप्त कर दिया गया और इसके गांवों को अलग-अलग क्षेत्रों में बांट दिया गया. कस्बे में गोसाईं हिम्मत बहादुर से जुड़ा एक पुराने मिट्टी के किले का अवशेष आज भी मौजूद है. 1857 के विद्रोह के दौरान इस क्षेत्र को भी नुकसान पहुंचा था. 1762 में बुंदेलों की संयुक्त सेना ने तिंदवारी के पास अवध के नवाब की आक्रमणकारी सेना को करारी शिकस्त दी थी. आज तिंदवारी केन और यमुना नदियों के बीच स्थित दोआब क्षेत्र के आसपास के कृषि प्रधान गांवों की जरूरतों को पूरा करने वाला बाजार कस्बा और विकासखंड मुख्यालय है.
स्थानीय अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है और तिंदवारी आसपास के गांवों के लिए एक प्रमुख बाजार के रूप में कार्य करता है. सड़क मार्ग से लगभग 20 से 25 किलोमीटर दूर बांदा निकटतम प्रमुख शहरी और प्रशासनिक केंद्र है. हमीरपुर लगभग 60 किलोमीटर, महोबा करीब 80 से 90 किलोमीटर और चित्रकूट लगभग 70 से 80 किलोमीटर दूर है. कानपुर की दूरी करीब 105 किलोमीटर है. लखनऊ लगभग 220 किलोमीटर दूर है, जबकि प्रयागराज की दूरी करीब 150 किलोमीटर है. अयोध्या लगभग 280 किलोमीटर और वाराणसी करीब 270 से 290 किलोमीटर दूर है. बांदा जंक्शन लगभग 25 से 30 किलोमीटर दूर स्थित है और यह इस विधानसभा क्षेत्र की सेवा करने वाला प्रमुख रेलवे स्टेशन है.
2009 के लोकसभा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा ने बेहतर स्थिति हासिल की है. 2014 के बाद हुए सभी पांच चुनावों में पार्टी अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे रही है. इस अवधि में उसने दो विधानसभा चुनाव जीते और तीन लोकसभा चुनावों में बढ़त हासिल की. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुकाबले उसकी बढ़त घटकर 2.69 प्रतिशत अंक रह गई. इससे समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष को उम्मीद की वजह मिलती है, लेकिन लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन अपने आप विधानसभा चुनाव के नतीजे में नहीं बदलता. विपक्ष को विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची में हुए बदलावों से निपटना होगा, अपने गठबंधन और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना होगा तथा भाजपा विरोधी वोटों को बंटने से रोकना होगा. तिंदवारी में बसपा की लगातार बनी राजनीतिक प्रासंगिकता को देखते हुए वह अब भी चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती है. 2027 में सीट बरकरार रखने की कोशिश में भाजपा लगातार पांच चुनावों में मिली बढ़त को अपने पक्ष में देख सकती है. हालांकि, 2024 में दोनों प्रमुख दलों के बीच कड़ा मुकाबला एक और करीबी तथा दिलचस्प चुनाव की संभावना की ओर संकेत करता है.
(अजय झा)