सिधौली उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में सरायन नदी के किनारे स्थित एक उपखंड स्तर का नगर है, जिसकी जड़े प्राचीन इतिहास से जुड़ी हैं. पुरातात्विक खोज और स्थानीय परंपराएं इस क्षेत्र में 1500 से 1000 ईसा पूर्व तक मानव बस्ती होने की ओर संकेत करती हैं, जब आसपास के जंगलो में ऋषियो और तपस्वियो के रहने की बात कही जाती है. आज यह सिधौली तहसील का मुख्यालय
और आसपास के गांवो के लिए प्रमुख व्यावसायिक केंद्र है.
1967 के चुनावो से पहले स्थापित सिधौली विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है और मोहनलालगंज लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रो में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें सिधौली नगर पंचायत के सभी 14 वार्ड शामिल हैं, साथ ही सिधौली तहसील के भीतर भंडिया, मनवा और गोंडलामऊ कानूनगो सर्किलो के बड़ी संख्या में गांव और पीर नगर कानूनगो सर्किल के कुछ हिस्से भी शामिल हैं. इस सीट का स्वरूप काफी हद तक ग्रामीण है.
सिधौली सीट एक तरह से उत्तर प्रदेश में 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनावो के समय से ही मौजूद रही है, जब यह सिधौली पश्चिम के नाम से जानी जाने वाली सामान्य, गैर आरक्षित सीट थी और यहां से तीन विधायक चुने जाते थे. 1957 में सिधौली पश्चिम अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र बन गया और यहां से दो विधायक चुने जाने लगे. 1962 के चुनावो से पहले इस विधानसभा क्षेत्र को समाप्त कर दिया गया और 1967 के परिसीमन आदेश के तहत इसे सिधौली विधानसभा क्षेत्र के रूप में फिर से स्थापित किया गया, जिसमें आरक्षित दर्जा बरकरार रहा.
1967 के बाद से सिधौली में 15 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. एक दौर को छोड़कर, जब समाजवादी पार्टी ने लगातार तीन बार सीट जीती, यह मुख्य रूप से एक स्विंग सीट रही है. अलग-अलग समय में विभिन्न दलो ने यहां जीत दर्ज की है और कोई भी दल लंबे समय तक अपना मजबूत गढ़ स्थापित नहीं कर सका. समाजवादी पार्टी ने यह सीट चार बार जीती है, जबकि कांग्रेस और भाजपा ने तीन-तीन बार जीत दर्ज की है. भाजपा के आंकड़े में 1967 में उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की एकमात्र जीत भी शामिल है. बहुजन समाज पार्टी और जनता पार्टी ने दो-दो बार जीत दर्ज की है, जबकि जनता दल ने एक बार सीट जीती है. निर्वाचित प्रतिनिधियो का एक दल से दूसरे दल में जाना भी सिधौली की राजनीति की एक विशेषता रही है. व्यक्तिगत तौर पर श्याम लाल रावत सबसे सफल रहे हैं, जिन्होंने यह सीट सात बार जीती, जिसमें 1989 से 2002 के बीच लगातार पांच जीत शामिल हैं. अपने लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने पांच अलग-अलग दलो का प्रतिनिधित्व किया. खास बात यह है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावो में तीन अलग-अलग दलो ने यह सीट जीती है.
2012 में समाजवादी पार्टी के मनीष रावत ने बसपा के हरगोविंद भार्गव को 6,631 मतो से हराकर सीट जीती. भार्गव ने 2017 में अपनी वह सीट फिर हासिल की, जिसे उन्होंने पहली बार 2007 में बसपा के टिकट पर जीता था, और उन्होंने मौजूदा समाजवादी पार्टी विधायक मनीष रावत को केवल 2,510 मतो के अंतर से हराया. भाजपा की धीमी लेकिन लगातार बढ़त जारी रही और 2012 में छठे स्थान पर रहने के बाद वह अगले चुनाव में करीबी तीसरे स्थान पर पहुंच गई. 42 साल का लंबा इंतजार तब समाप्त हुआ जब 2022 में मनीष रावत के समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा ने यह सीट जीत ली. भाजपा की पिछली जीत 1980 में हुई थी, जो उस समय हुए चुनाव में थी जब तत्कालीन भारतीय जनसंघ के नेता जनता पार्टी से अलग होकर भाजपा बनाने के बाद पहली बार चुनाव मैदान में उतरे थे. 2022 का चुनाव दो दल बदलने वाले उम्मीदवारो के बीच सीधा मुकाबला था, जिसमें समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए मनीष रावत और बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हरगोविंद भार्गव आमने-सामने थे. रावत को 1,06,222 वोट मिले, जबकि भार्गव को 96,506 वोट मिले और भाजपा ने 9,716 वोटो के अंतर से जीत दर्ज की.
लोकसभा चुनावो के दौरान भी सिधौली के मतदाताओ के बदलते रुझान दिखाई देते हैं. 2009 में सिधौली विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी ने बसपा पर 19,752 मतो की बढ़त बनाई थी. 2014 में बसपा ने भाजपा पर 13,692 मतो की बढ़त हासिल की. 2019 में भी बसपा ने भाजपा पर बढ़त बनाई और इस बार अंतर 17,513 वोट रहा. 2024 में समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर बड़ी बढ़त बनाई, जब उसके मोहनलालगंज लोकसभा उम्मीदवार आर. के. चौधरी को 1,36,249 वोट मिले, जबकि उनके भाजपा प्रतिद्वंद्वी कौशल किशोर को 80,636 वोट मिले. इस तरह सिधौली विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को 55,613 मतो की बड़ी बढ़त मिली.
सिधौली में पिछले कुछ वर्षो के दौरान मतदाता आधार में लगातार वृद्धि हुई है. पंजीकृत मतदाताओ की संख्या 2012 में 3,01,879 से बढ़कर 2017 में 3,29,188, 2019 में 3,39,120, 2022 में 3,55,213 और 2024 में 3,61,943 हो गई. मतदाता भागीदारी लगातार ऊंची रही है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव भी देखा गया है. 2012 में मतदान प्रतिशत 66.64 प्रतिशत था, जो 2017 में बढ़कर 70.70 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 66.38 प्रतिशत रह गया, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 68.66 प्रतिशत हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत फिर घटकर 66.63 प्रतिशत रहा. खास बात यह है कि सिधौली का सबसे कम मतदान प्रतिशत भी राज्य के बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्रो में दर्ज किए गए सबसे अधिक मतदान प्रतिशत से ज्यादा रहा है.
सिधौली एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है. अनुसूचित जाति के मतदाता कुल मतदाताओ का करीब 40.33 प्रतिशत हैं, जिनमें पासी और चमार प्रमुख अनुसूचित जाति समुदायो में शामिल हैं, जबकि मुस्लिम मतदाताओ की हिस्सेदारी करीब 12.90 प्रतिशत है. अन्य मतदाताओ में यादव, कुर्मी और लोध जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग के समुदाय शामिल हैं, साथ ही ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण समुदाय भी मौजूद हैं. यह सीट काफी हद तक ग्रामीण है, जहां 95.02 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्रो में रहते हैं और केवल 4.98 प्रतिशत मतदाता सिधौली नगर की सीमा के भीतर रहते हैं.
सिधौली नाम की उत्पत्ति संस्कृत के शब्दो "सिद्धि" और "आवली" से मानी जाती है, जिसका अर्थ ऋषियो का निवास स्थान बताया जाता है. यह क्षेत्र प्राचीन पवित्र वन नैमिषारण्य की सीमा से जुड़ा है और लंबे समय से तपस्वी तथा शैव परंपराओ से संबंधित रहा है. इस क्षेत्र से 1500 से 1000 ईसा पूर्व के ताम्र युग के औजार मिले हैं, जबकि बाद की पुरातात्विक खोजो में शुंग काल से संबंधित वस्तुएं भी शामिल हैं. नगर और इसके आसपास के गांव आज भी इस गहरे ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध को दर्शाते हैं.
सिधौली मुख्य रूप से सड़क परिवहन पर निर्भर है और आसपास के कस्बो तथा बड़े शहरी केंद्रो तक पहुंच के लिए सड़क मार्ग का इस्तेमाल किया जाता है. यह सीतापुर से करीब 50 किलोमीटर, लखनऊ से 40 किलोमीटर, बिसवां से 95 किलोमीटर, महमूदाबाद से 55 किलोमीटर, अयोध्या से 125 किलोमीटर और वाराणसी से करीब 290 किलोमीटर दूर है. निकटतम रेलवे स्टेशन सीधौली रेलवे स्टेशन है, जो नगर के भीतर स्थित है और लखनऊ-सीतापुर रेल मार्ग से सीधी कनेक्टिविटी प्रदान करता है.
सिधौली का चुनावी रिकॉर्ड एक जटिल तस्वीर पेश करता है. विधानसभा क्षेत्र के पिछले सात प्रमुख चुनावो में समाजवादी पार्टी और बसपा ने तीन-तीन बार जीत या बढ़त हासिल की है, जबकि भाजपा ने एक बार ऐसा किया है. हालांकि केवल चुनावी आंकड़े बदलते राजनीतिक समीकरण की पूरी तस्वीर नहीं बताते हैं. सिधौली में भाजपा पारंपरिक रूप से बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं रही थी, लेकिन इसके धीरे-धीरे बढ़ने के साथ बसपा का प्रभाव कमजोर हुआ और राजनीतिक समर्थन आधार में बदलाव देखने को मिला.
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत को केवल एक अलग परिणाम के तौर पर नहीं देखा जा सकता. 2012 में छठे स्थान से 2017 में करीबी तीसरे स्थान और फिर 2022 में जीत तक भाजपा का सफर विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक संतुलन में महत्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत करता है. वहीं, इसके ठीक दो साल बाद हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में बिल्कुल अलग परिणाम सामने आया, जब समाजवादी पार्टी ने सिधौली क्षेत्र में भाजपा पर 55,000 से अधिक मतो की बड़ी बढ़त हासिल की.
सिर्फ दो साल के अंतर में आए इन दो परिणामो के कारण 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सिधौली उत्तर प्रदेश की उन सीटो में शामिल हो गई है, जिनके राजनीतिक रुझान का अनुमान लगाना आसान नहीं है. समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी बढ़त के आधार पर आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा को उम्मीद होगी कि विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति के अनुसार अलग समीकरण बन सकते हैं. बसपा के घटते चुनावी प्रभाव के बीच उसके पारंपरिक समर्थन आधार को लेकर भी मुकाबला महत्वपूर्ण हो सकता है. सिधौली का लंबे समय से बदलता राजनीतिक रुझान यह संकेत देता है कि कोई भी दल मतदाताओ को निश्चित समर्थन मानकर नहीं चल सकता, जिससे 2027 का चुनाव यहां एक महत्वपूर्ण मुकाबला बन सकता है.
(अजय झा)