सेवता उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में ग्राम पंचायत द्वारा शासित एक गांव है. यह बिसवां तहसील क्षेत्र में स्थित है और आसपास की ग्रामीण बस्तियों के लिए स्थानीय सामुदायिक केंद्र के रूप में काम करता है. इसी गांव के नाम पर बड़ी विधानसभा सीट का नाम रखा गया है.
2008 के परिसीमन आदेश के तहत स्थापित सेवता उत्तर प्रदेश के नए विधानसभा क्षेत्रों
में से एक है. यह एक सामान्य, अनारक्षित सीट है और सीतापुर लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. इसकी सीमाओं में सेवता, शाहपुर और रेवसा के कानूनगो सर्किल, बिसवां तहसील के जहांगीराबाद कानूनगो सर्किल के कुछ हिस्से तथा महमूदाबाद तहसील के रामपुर मथुरा और सदरपुर के कानूनगो सर्किल शामिल हैं.
सेवता में 2012 में पहली बार मतदान होने के बाद से अब तक तीन विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. अपने छोटे चुनावी इतिहास में समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर एक बार और भाजपा ने दो बार जीत हासिल की है. क्षेत्र की कई अन्य सीटों की तरह सेवता में भी शुरुआत में कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा की चुनावी स्थिति में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है. 2012 में समाजवादी पार्टी के महेंद्र कुमार सिंह ने कांग्रेस के अम्मार रिजवी को 2,447 वोटों के करीबी अंतर से हराकर सीट जीती थी.
2012 में सिर्फ 1.48 प्रतिशत वोट हासिल कर छठे स्थान पर रही भाजपा ने पांच साल बाद सीट पर जीत दर्ज की. 2017 में भाजपा के उम्मीदवार ज्ञान तिवारी ने बहुजन समाज पार्टी के मोहम्मद नसीम को 43,659 वोटों के बड़े अंतर से हराया. 2022 में भाजपा ने सीट बरकरार रखी, हालांकि जीत का अंतर घट गया, लेकिन फिर भी यह आरामदायक रहा. तिवारी को 108,057 वोट मिले, जबकि उनके समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी महेंद्र कुमार सिंह को 87,776 वोट मिले. इस तरह भाजपा ने 20,281 वोटों के अंतर से जीत हासिल की.
लोकसभा चुनावों के दौरान भी सेवता विधानसभा खंड में लगभग इसी तरह का चुनावी रुझान देखने को मिला है. 2009 में भाजपा काफी पीछे तीसरे स्थान पर रही थी, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने समाजवादी पार्टी पर 5,750 वोटों की बढ़त बनाई थी. पांच साल बाद 2014 में भाजपा आगे निकल गई और बहुजन समाज पार्टी पर 22,577 वोटों की बढ़त बनाई. इसके बाद 2019 में भाजपा की बढ़त बढ़कर 37,168 वोट हो गई. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त कम हुई, लेकिन पार्टी फिर भी आगे रही. उसके उम्मीदवार राजेश वर्मा को सेवता विधानसभा खंड में 99,662 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार राकेश राठौर को 85,837 वोट मिले. इस तरह भाजपा को 13,825 वोटों की बढ़त मिली.
सेवता में पिछले कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 263,543 थी, जो 2017 में बढ़कर 296,486, 2019 में 303,844, 2022 में 314,110 और 2024 में 321,836 हो गई. मतदान प्रतिशत लगातार ऊंचा रहा है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव भी देखा गया है. 2012 में मतदान प्रतिशत 66.90 रहा और 2017 में बढ़कर 72.29 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 67.42 प्रतिशत रहा, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 71.04 प्रतिशत हो गया. 2024 के संसदीय चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 67.28 प्रतिशत रह गया.
सेवता एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है और इसका स्वरूप पूरी तरह ग्रामीण है. मतदाताओं में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी 20.60 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी 21.71 प्रतिशत है. बाकी मतदाता विभिन्न अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य समुदायों से संबंधित हैं. यह विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण है और इसकी 100 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है.
स्थानीय परंपरा और पुराने रिकॉर्ड इस स्थान को मध्यकालीन काल से जोड़ते हैं. ऐतिहासिक रूप से सिओता के नाम से संदर्भित इस स्थान की स्थापना 12वीं सदी के अंतिम दौर में कन्नौज के राजा जयचंद के दरबार से जुड़े अल्हा चंदेल ने की थी, ऐसा कहा जाता है. समय के साथ यह बस्ती सीतापुर जिले के भीतर एक ग्रामीण केंद्र के रूप में बनी रही और विकसित होकर उस ग्राम पंचायत गांव का रूप ले लिया, जिसके नाम पर आज सेवता विधानसभा क्षेत्र जाना जाता है.
सेवता मुख्य रूप से सड़क परिवहन पर निर्भर है और आसपास के कस्बों तथा बड़े शहरी केंद्रों से इसी माध्यम से जुड़ा है. यह सीतापुर से लगभग 95 किलोमीटर, बिसवां से 35 किलोमीटर, महमूदाबाद से 55 किलोमीटर, लखनऊ से 105 किलोमीटर, अयोध्या से 185 किलोमीटर और वाराणसी से लगभग 240 किलोमीटर दूर है. निकटतम रेलवे स्टेशन बिसवां रेलवे स्टेशन है, जो लगभग 35 किलोमीटर दूर है और यहां से व्यापक रेल नेटवर्क तक पहुंच मिलती है.
2027 के विधानसभा चुनाव में सेवता का चुनावी परिदृश्य भाजपा को काफी भरोसा देता है. 2012 में पहला विधानसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी ने इस सीट पर दो बार जीत हासिल की है और 2014 के बाद से हर लोकसभा चुनाव में आगे रही है. 2024 में उसकी संसदीय बढ़त 2019 की तुलना में काफी कम रही, लेकिन भाजपा फिर भी विधानसभा खंड में कांग्रेस पार्टी से आरामदायक अंतर से आगे रही. 2024 में भाजपा के घटे हुए अंतर से विपक्ष को आगे की रणनीति बनाने का आधार मिल सकता है. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लोकसभा चुनाव में दिखा बदलाव 2027 के विधानसभा चुनाव में विपक्ष की चुनौती में बदल पाता है या नहीं. भाजपा के मजबूत चुनावी रिकॉर्ड को देखते हुए विपक्ष को मुकाबले को वास्तव में कड़ा बनाने के लिए बेहतर तालमेल वाले अभियान की जरूरत होगी.
(अजय झा)