सांडी उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में गर्रा नदी के बाएं किनारे स्थित एक ब्लॉक स्तर का नगर है, जहां नगर पालिका परिषद है. यह नगर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखता है और इसके नाम का भी ऐतिहासिक संदर्भ है. वर्तमान में यह सांडी विकासखंड का मुख्यालय है और आसपास के बड़ी संख्या में गांवों के लिए प्रमुख शहरी केंद्र के रूप में कार्य करता है.
परिसीमन आदेश के तहत गठित सांडी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है और हरदोई लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. इस विधानसभा क्षेत्र में पूरी सांडी नगर पालिका परिषद के साथ हरदोई जिले की बिलग्राम और हरदोई तहसीलों के कुछ हिस्से शामिल हैं, जिसके कारण इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
एक नए विधानसभा क्षेत्र के रूप में सांडी का चुनावी इतिहास छोटा है और यहां पहली बार 2012 में मतदान हुआ था. पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दो चुनाव जीते. दिलचस्प बात यह है कि सांडी के मतदाताओं ने बदलते राजनीतिक रुझान के साथ खुद को जोड़ते हुए मतदान किया. 2012 में समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की थी, जब उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार बनी. 2017 में मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी का साथ दिया, जब राज्य में भाजपा सत्ता में आई.
2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी की राजेश्वरी ने बहुजन समाज पार्टी के वीरेंद्र कुमार को 6,650 मतों से हराया. हालांकि, उन्होंने अगले दो चुनाव पड़ोसी गोपामऊ विधानसभा क्षेत्र से लड़े और दोनों में हार का सामना किया.
2017 में भाजपा ने 2012 के चौथे स्थान से सीधे आगे बढ़ते हुए सांडी सीट पर जीत हासिल की. भाजपा के उम्मीदवार प्रभाष कुमार ने समाजवादी पार्टी के ओमेंद्र कुमार वर्मा को 20,225 मतों से हराया. इस चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशत में पिछले चुनाव की तुलना में काफी वृद्धि हुई. 2022 में भी प्रभात कुमार ने भाजपा के लिए सीट बरकरार रखी, जबकि समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर अपना उम्मीदवार बदला. उन्हें 81,519 मत मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की प्रतिद्वंद्वी उषा वर्मा को 72,286 मत मिले. इस तरह भाजपा ने 9,233 मतों के अंतर से जीत दर्ज की.
विधानसभा चुनावों की तुलना में लोकसभा चुनावों के दौरान सांडी विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा है. 2009 में उसने बहुजन समाज पार्टी पर 12,110 मतों की बढ़त बनाई थी और 2014 में भाजपा के खिलाफ 7,189 मतों की बढ़त हासिल की. 2019 में भाजपा ने वापसी करते हुए समाजवादी पार्टी पर 12,800 मतों की बढ़त बनाई. 2024 में फिर से बढ़त बदल गई, जब हरदोई लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार उषा वर्मा ने सांडी क्षेत्र में 86,284 मत हासिल किए, जबकि भाजपा के उम्मीदवार जय प्रकाश रावत को 80,125 मत मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने इस विधानसभा क्षेत्र में 6,159 मतों की बढ़त हासिल की.
समय के साथ सांडी में मतदाताओं की संख्या में सामान्य वृद्धि हुई है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 2,96,094 से बढ़कर 2017 में 3,17,368, 2019 में 3,22,071, 2022 में 3,32,232 और 2024 में 3,43,235 हो गई. मतदाता भागीदारी में काफी स्थिरता रही है, हालांकि यह अपेक्षाकृत कम स्तर पर बनी रही. 2012 में मतदान प्रतिशत 58.82 प्रतिशत था, जो 2017 में मामूली घटकर 58.52 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 58.03 प्रतिशत रहा, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 58.91 प्रतिशत हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत फिर मामूली घटकर 57.75 प्रतिशत रहा. पांच चुनावों के दौरान मतदान प्रतिशत का दायरा काफी सीमित रहा है, खासकर ऐसे विधानसभा क्षेत्र में जहां अधिकांश मतदाता ग्रामीण इलाकों में रहते हैं.
सांडी हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. अनुसूचित जाति के मतदाता कुल मतदाताओं का करीब 41.90 प्रतिशत हैं, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 7.30 प्रतिशत है. अनुसूचित जातियों में पासी और चमार समुदायों की महत्वपूर्ण संख्या है, साथ ही अन्य दलित समुदाय भी मौजूद हैं. व्यापक मतदाता आधार में यादव, कुर्मी और पाल जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग के समुदायों के अलावा ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण हिंदू समुदाय शामिल हैं. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 94.57 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और केवल 5.43 प्रतिशत मतदाता नगर क्षेत्र में रहते हैं.
सांडी के आसपास का भूभाग उपजाऊ गंगा के मैदानों का हिस्सा है, जिसमें गर्रा नदी तत्काल क्षेत्र की प्रमुख नदी है. पूरे विधानसभा क्षेत्र में कृषि मुख्य आर्थिक गतिविधि है और गांवों में गेहूं, धान, गन्ना तथा अन्य फसलों की खेती की जाती है. पशुपालन और कृषि व्यापार भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. सांडी नगर आसपास के गांवों के लिए स्थानीय बाजार और सेवा केंद्र के रूप में काम करता है तथा यहां बुनियादी प्रशासनिक, व्यावसायिक और अन्य सेवाएं उपलब्ध हैं.
स्थानीय परंपरा के अनुसार, सांडी नाम की उत्पत्ति संतान डीह या संतान खेड़ा से मानी जाती है. यह नाम सोमवंशी प्रमुख राजा संतान सिंह से जुड़ा बताया जाता है, जिन्होंने कथित तौर पर पहले यहां रहने वाले ठठेरा समुदाय को हटाकर अपना किला स्थापित किया था. सोमवंशियों का आसपास के क्षेत्र पर अधिकार रहा, जब तक कि 14वीं शताब्दी के अंत के आसपास वे मुस्लिम सेनाओं से पराजित नहीं हुए. परंपरा के अनुसार, लंबे समय तक चले घेराव के बाद किले की खाई से गर्रा नदी तक एक नहर काटे जाने पर किले पर कब्जा किया जा सका. विजेताओं ने पास में एक नई बस्ती बसाई, लेकिन महामारी के कारण उसे छोड़ना पड़ा और पुराने स्थान पर फिर से लोग बस गए. हालांकि आधिकारिक रूप से इसका नाम अशरफाबाद रखा गया, लेकिन पुराना नाम चलता रहा और समय के साथ सांडी के रूप में विकसित हुआ. बाद में यह नगर सैयद परिवारों के अधीन रहा, जिन्होंने कई पीढ़ियों तक स्थानीय पदों और संपत्ति अधिकारों को संभाला. आज भी यह ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक सामान्य ब्लॉक मुख्यालय और बाजार केंद्र के रूप में कार्य करता है.
सांडी मुख्य रूप से सड़क परिवहन के माध्यम से आसपास के कस्बों और बड़े शहरी केंद्रों से जुड़ा हुआ है. यह हरदोई से करीब 25 किलोमीटर, बिलग्राम से लगभग 32 किलोमीटर, शाहाबाद से 45 किलोमीटर और सीतापुर से करीब 95 किलोमीटर दूर है. लखनऊ की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है, जबकि अयोध्या करीब 225 किलोमीटर और वाराणसी लगभग 335 किलोमीटर सड़क मार्ग से दूर है. निकटतम प्रमुख रेलवे सुविधा हरदोई रेलवे स्टेशन पर है, जो लगभग 25 किलोमीटर दूर है. यह रेलवे स्टेशन लखनऊ, शाहजहांपुर, बरेली और आसपास के रेल नेटवर्क के अन्य हिस्सों से क्षेत्र को जोड़ता है.
सांडी मध्य उत्तर प्रदेश का एक और विधानसभा क्षेत्र है, जहां भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है. दोनों दलों के चुनावी रिकॉर्ड भी लगभग इसी स्थिति को दर्शाते हैं. 2009 के बाद यहां हुए सात प्रमुख चुनावों में समाजवादी पार्टी ने एक विधानसभा चुनाव जीता और तीन लोकसभा चुनावों में बढ़त हासिल की, जबकि भाजपा ने दो विधानसभा चुनाव जीते और एक लोकसभा चुनाव में बढ़त बनाई. दोनों दलों के बीच अंतर इतना कम रहा है कि 2027 में दोनों ही इस सीट पर जीत की उम्मीद रख सकते हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर 4.73 प्रतिशत अंक की बढ़त बनाई थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर 3.10 प्रतिशत अंक की बढ़त हासिल की.
करीबी चुनावी अंतर के कारण 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सांडी के नतीजे का अनुमान लगाना मुश्किल है. भाजपा के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का फायदा है. वहीं समाजवादी पार्टी 2009 के बाद तीन लोकसभा चुनावों में मिली बढ़त और शुरुआती विधानसभा चुनाव में मिली जीत से उम्मीद कर सकती है. भाजपा के सामने यह तथ्य भी है कि 2022 में उसकी विधानसभा जीत का अंतर 2017 की तुलना में काफी कम हो गया था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने फिर से बढ़त हासिल कर ली. ऐसे विधानसभा क्षेत्र में जहां मतदाता भागीदारी लंबे समय से स्थिर लेकिन अपेक्षाकृत कम रही है, मतदान में मामूली वृद्धि या मतदाताओं को अधिक प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में करने की क्षमता चुनाव से पहले के समीकरणों को बदल सकती है. 2027 में सांडी में भाजपा और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के बीच करीबी मुकाबला बने रहने की संभावना है.
(अजय झा)