रसूलाबाद उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में स्थित एक कस्बा, तहसील मुख्यालय और नगर पंचायत है. यह कानपुर शहर से लगभग 65 से 70 किलोमीटर पश्चिम में उपजाऊ मध्य दोआब क्षेत्र में स्थित है. यह कस्बा लंबे समय से आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रशासनिक और कृषि केंद्र रहा है. ब्रिटिश शासन के दौरान रसूलाबाद तहसील एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई थी और यह
क्षेत्र पारंपरिक रूप से कृषि तथा स्थानीय व्यापार पर निर्भर रहा है.
2008 के परिसीमन के माध्यम से गठित रसूलाबाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है और कन्नौज लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. परिसीमन से पहले यह क्षेत्र मुख्य रूप से पुराने डेरापुर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा था. इस विधानसभा क्षेत्र में पूरी रसूलाबाद तहसील के साथ डेरापुर तहसील का झींझक कानूनगो सर्किल और झींझक कस्बा क्षेत्र शामिल है. इसके कारण इसका स्वरूप स्पष्ट रूप से ग्रामीण है, क्योंकि यहां के मतदाताओं का बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में रहता है.
नया विधानसभा क्षेत्र होने के कारण रसूलाबाद का चुनावी इतिहास सीमित है और यहां अब तक केवल तीन विधानसभा चुनाव हुए हैं. 2012 में समाजवादी पार्टी के शिव कुमार बेरिया ने बहुजन समाज पार्टी की निर्मला संखवार को 16,835 वोटों से हराकर सीट जीती थी. बीजेपी तीसरे स्थान पर रही थी और उसकी जमानत जब्त हो गई थी. 2017 में निर्मला संखवार को पार्टी में शामिल करने और उन्हें उम्मीदवार बनाने के बाद बीजेपी ने शानदार वापसी की. उन्होंने समाजवादी पार्टी की अरुण कुमारी कोरी को 33,394 वोटों से हराया. बीजेपी ने 2022 में पूनम संखवार के साथ सीट बरकरार रखी, जिन्होंने 2017 का चुनाव बसपा के टिकट पर लड़ा था और तीसरे स्थान पर रही थीं. उन्हें 91,783 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार कमलेश चंद्र दिवाकर को 70,271 वोट मिले. इस तरह उन्होंने 21,512 वोटों से जीत दर्ज की.
यह उल्लेखनीय है कि बीजेपी, समाजवादी पार्टी और बसपा ने तीनों विधानसभा चुनावों में अपने पिछले उम्मीदवारों को दोहराया नहीं है. बीजेपी की दोनों जीत ऐसे उम्मीदवारों के साथ आईं, जिन्होंने पहले बसपा के लिए इस सीट से चुनाव लड़ा था. निर्मला संखवार 2017 के चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हुई थीं, जबकि पूनम संखवार ने 2022 के चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थामा था.
विधानसभा चुनावों में अपने प्रदर्शन की तुलना में समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनावों के दौरान रसूलाबाद विधानसभा क्षेत्र में काफी बेहतर प्रदर्शन किया है और 2009 के बाद हुए चार में से तीन चुनावों में यहां बढ़त बनाई है. कन्नौज लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अखिलेश यादव या डिंपल यादव की मौजूदगी एक महत्वपूर्ण कारक रही है. 2009 में अखिलेश यादव के उम्मीदवार होने पर समाजवादी पार्टी ने इस विधानसभा क्षेत्र में बसपा पर 11,239 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2012 में उनके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पत्नी डिंपल यादव को उम्मीदवार बनाया, जिसमें बीजेपी पर उसकी बढ़त घटकर 6,683 वोट रह गई. 2019 में डिंपल यादव बीजेपी के सुब्रत पाठक से 16,970 वोट पीछे रह गई थीं. 2024 में अखिलेश यादव ने कन्नौज लोकसभा सीट से फिर चुनाव लड़ा और स्थिति बदल गई. उन्हें 92,888 वोट मिले, जबकि सुब्रत पाठक को 83,007 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने इस विधानसभा क्षेत्र में 9,881 वोटों की मामूली बढ़त हासिल की.
रसूलाबाद में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी, लेकिन 2026 में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद इसमें तेज गिरावट दर्ज की गई. यह संख्या 2012 में 284,141 से बढ़कर 2017 में 311,334 हो गई और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 316,890 थी. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 324,413 और 2024 में 331,658 हो गया. अंतिम एसआईआर प्रक्रिया के बाद कुल 40,960 मतदाताओं की कमी हुई, जो 12.50 प्रतिशत है. आधिकारिक जिला चुनाव पोर्टल में अंतिम एसआईआर प्रकाशन की तारीख 10 अप्रैल 2026 दर्ज है.
हाल के चुनावों में रसूलाबाद में मतदान प्रतिशत लगभग 60 प्रतिशत रहा है. 2012 में यह 59.73 प्रतिशत और 2017 में 60.85 प्रतिशत था. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 60.81 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़कर 61.23 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 59.83 प्रतिशत रहा.
रसूलाबाद एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है और यहां सामाजिक संरचना मिश्रित है. अनुसूचित जाति की आबादी 26.54 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम आबादी का अनुमान लगभग 7.10 प्रतिशत है. सामाजिक संरचना के उपलब्ध अनुमानों के अनुसार जाटव मतदाताओं की संख्या लगभग 25.26 प्रतिशत, ब्राह्मणों की 9.96 प्रतिशत, लोधियों की 9.60 प्रतिशत, पाल की 9.25 प्रतिशत और यादवों की 7.82 प्रतिशत है. अन्य समुदायों में कोरी, कठेरिया, कुशवाहा, ठाकुर, वैश्य और अन्य ओबीसी समूह शामिल हैं. 2011 में विधानसभा क्षेत्र की लगभग 89.46 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी, जबकि 10.54 प्रतिशत आबादी रसूलाबाद और झींझक कस्बा क्षेत्रों में रहती थी. इससे विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप पूरी तरह से ग्रामीण दिखाई देता है.
रसूलाबाद का लंबा प्रशासनिक इतिहास रहा है. इम्पीरियल गजेटियर में इसे मध्य दोआब में स्थित कानपुर जिले की मध्य-पश्चिमी तहसील के रूप में वर्णित किया गया था, जहां उपजाऊ दोमट मिट्टी, व्यापक खेती और कुओं तथा नहर की शाखाओं से सिंचाई की व्यवस्था थी. रसूलाबाद कस्बा तहसील का मुख्यालय था और यहां एक किला, पुलिस थाना, डाकघर, स्कूल और स्थानीय बाजार थे. पुरानी बस्ती का विकास एक कृषि केंद्र के रूप में हुआ, जो आसपास के रेलवे और सड़क मार्गों से जुड़ा था.
धर्मगढ़ बाबा मंदिर यहां का एक विशिष्ट स्थानीय धार्मिक स्थल है और इसे हिंदू-मुस्लिम साझा आस्था के उदाहरण के रूप में देखा जाता है. यह कस्बा आज भी मुख्य रूप से कृषि बाजार और प्रशासनिक केंद्र के रूप में काम करता है. आसपास के ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में गेहूं, धान, दलहन, तिलहन और अन्य फसलें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
रसूलाबाद सड़क मार्ग से कानपुर, कन्नौज, झींझक, औरैया तथा आसपास के अन्य कस्बों से जुड़ा है. दिल्ली-हावड़ा मार्ग पर स्थित झींझक रेलवे स्टेशन लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है. यह कस्बा कानपुर से लगभग 65 से 70 किलोमीटर, कन्नौज से 50 से 55 किलोमीटर, औरैया से 40 से 45 किलोमीटर, लखनऊ से 125 से 130 किलोमीटर, इटावा से 160 किलोमीटर और आगरा से लगभग 175 से 180 किलोमीटर दूर है. ग्वालियर की दूरी लगभग 175 से 180 किलोमीटर है, जबकि अयोध्या और प्रयागराज लगभग 300 किलोमीटर तथा वाराणसी करीब 380 किलोमीटर दूर है.
विधानसभा और लोकसभा के रुझानों को एक साथ देखा जाए तो रसूलाबाद में बीजेपी की तुलना में समाजवादी पार्टी का चुनावी रिकॉर्ड थोड़ा अनुकूल दिखाई देता है. समाजवादी पार्टी ने विधानसभा सीट एक बार जीती है और चार में से तीन संसदीय चुनावों में बढ़त बनाई है, जबकि बीजेपी ने पिछले दो विधानसभा चुनाव जीते हैं और एक लोकसभा चुनाव में बढ़त बनाई है. प्रतिशत अंक के आधार पर 2022 में बीजेपी की समाजवादी पार्टी पर विधानसभा बढ़त 10.97 अंक थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बीजेपी पर बढ़त 4.98 अंक रही. आरक्षित सीट होने के कारण बीजेपी को यादव परिवार से जुड़े उस प्रभाव का सामना नहीं करना होगा, जो कन्नौज में अखिलेश यादव और डिंपल यादव के चुनाव लड़ने के साथ जुड़ा रहा है. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इस बात से अवगत होगी कि 2019 में डिंपल यादव इस विधानसभा क्षेत्र में पीछे रह गई थीं और 2024 में उसकी बढ़त इतनी बड़ी नहीं थी कि विधानसभा चुनाव के लिए स्पष्ट बढ़त स्थापित मानी जा सके.
एसआईआर ने एक और कारक जोड़ दिया है, हालांकि अभी ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि किसी विशेष जाति या समुदाय पर इसका असमान प्रभाव पड़ा है. बीजेपी 2027 के चुनाव में लगातार दो विधानसभा जीत के साथ मैदान में उतरेगी, जबकि समाजवादी पार्टी 2024 में संसदीय क्षेत्र में अपनी वापसी का उल्लेख कर सकती है. हाल के चुनावों में बसपा की घटती मौजूदगी भी एक आरक्षित सीट के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है, जहां उसके समर्थन में अपेक्षाकृत मामूली बदलाव भी दोनों प्रमुख दावेदारों के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकता है. इसलिए रसूलाबाद एक प्रतिस्पर्धी सीट बनी हुई है, जहां बीजेपी या समाजवादी पार्टी में से कोई भी दूसरी पार्टी को हल्के में नहीं ले सकती.
(अजय झा)