उरई दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जालौन जिले का प्रशासनिक मुख्यालय और नगर पालिका परिषद का दर्जा रखने वाला शहर है. यह बुंदेलखंड क्षेत्र का एक प्रमुख शहरी केंद्र और कानपुर-झांसी कॉरिडोर पर जिले का मुख्य वाणिज्यिक, परिवहन और सेवा केंद्र है. एक प्राचीन शहर के रूप में इसका नाम पारंपरिक रूप से 8वीं-7वीं शताब्दी ईसा पूर्व के वैदिक ऋषि उद्दालक आरुणि
से जोड़ा जाता है और कहा जाता है कि उरई को उद्दालक नगरी के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1986 में औद्योगिक क्षेत्र के लिए करीब 500 एकड़ भूमि आवंटित होने के बाद से उरई ने अपनी ऐतिहासिक जड़ों के साथ विनिर्माण, व्यापार और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में भी अपनी भूमिका मजबूत की है.
उरई के नाम पर एक विधानसभा क्षेत्र भी है, जो 1967 के चुनाव से अस्तित्व में है. यह जालौन लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. वर्ष 2008 के परिसीमन से पहले यह एक सामान्य अनारक्षित सीट थी, लेकिन परिसीमन के बाद इसे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया और इसकी सीमाओं में बदलाव किया गया. वर्तमान में इस विधानसभा क्षेत्र में पूरा उरई तहसील क्षेत्र, कोंच तहसील का पिरौना कानूनगो सर्किल और जालौन तहसील का कानूनगो सर्किल तथा जालौन नगर पालिका बोर्ड शामिल हैं, जिससे इसका स्वरूप शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों वाला है.
उरई अपने गठन के बाद से अब तक 15 विधानसभा चुनावों में हिस्सा ले चुका है. शुरुआती वर्षों में कांग्रेस यहां प्रमुख राजनीतिक ताकत रही और उसने पहले छह चुनावों में से पांच में जीत हासिल की. 1985 की जीत के बाद कांग्रेस का प्रभाव कम हुआ, हालांकि पांच चुनावों के अंतराल के बाद 2007 में पार्टी ने फिर से यह सीट जीती. कुल मिलाकर कांग्रेस ने यह सीट छह बार जीती है, जबकि भाजपा को पांच बार जीत मिली है. बहुजन समाज पार्टी ने दो बार जीत दर्ज की है, जबकि जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार इस सीट पर कब्जा किया है.
समाजवादी पार्टी ने उरई में अपनी पहली जीत 2012 में दर्ज की, जब यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो चुकी थी. उस चुनाव में दयाशंकर ने बसपा के सत्येंद्र प्रताप को 7,133 वोटों से हराया था. भाजपा 2012 में तीसरे स्थान पर रही थी, लेकिन 2017 में उसने जोरदार वापसी की. भाजपा के उम्मीदवार गौरी शंकर वर्मा ने समाजवादी पार्टी के महेंद्र सिंह को 78,879 वोटों के बड़े अंतर से हराया. भाजपा ने 2022 में भी यह सीट बरकरार रखी, हालांकि जीत का अंतर कम हो गया. गौरी शंकर ने 128,644 वोट हासिल किए, जबकि समाजवादी पार्टी के दयाशंकर वर्मा को 90,996 वोट मिले. इस तरह भाजपा की जीत का अंतर 37,648 वोट रहा.
उरई विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले का असर लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिला है. 2009 में समाजवादी पार्टी ने बसपा के मुकाबले 6,057 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा तीसरे स्थान से आगे बढ़कर बसपा पर 78,171 वोटों की बढ़त के साथ पहले स्थान पर पहुंच गई, जबकि समाजवादी पार्टी चौथे स्थान पर रही. 2019 में भी भाजपा ने अपनी बढ़त कायम रखी और बसपा पर 44,217 वोटों की बढ़त हासिल की. उस समय समाजवादी पार्टी ने बसपा के साथ गठबंधन के तहत जालौन लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा था. गठबंधन समाप्त होने के बाद समाजवादी पार्टी 2024 में फिर चुनाव मैदान में उतरी और उरई विधानसभा क्षेत्र में भाजपा से आगे निकल गई. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नारायण दास अहिरवार को 123,224 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार भानु प्रताप सिंह वर्मा को 111,395 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने 11,829 वोटों की बढ़त हासिल की.
उरई में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 411,457 से बढ़कर 2017 में 423,932 और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 430,237 हो गई थी. 2022 में यह संख्या 445,512 और 2024 में 452,094 रही. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में उरई में 375,219 मतदाता दर्ज किए गए, जो 2024 के 452,094 मतदाताओं की तुलना में 76,875 कम हैं. यह कमी ठीक 17.00 प्रतिशत है. मतदाताओं की संख्या में आई इस बड़ी गिरावट का 2027 के विधानसभा चुनाव में बूथ स्तर के राजनीतिक समीकरणों पर असर पड़ने की संभावना है.
उरई में मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2012 में मतदान प्रतिशत 57.71 रहा था, जो 2017 में बढ़कर 62.56 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 57.18 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 61.27 हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 56.42 प्रतिशत रह गया.
उरई हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी करीब 11.90 प्रतिशत रहने का अनुमान है. अनुसूचित जाति की आबादी करीब 28.06 प्रतिशत है और आरक्षित सीट होने के कारण यह सबसे बड़ा सामाजिक समूह है. सामाजिक संरचना में ओबीसी समुदायों के बीच लोध, यादव, कुर्मी और कुशवाहा शामिल हैं, जबकि ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण समूह भी यहां मौजूद हैं. अनुसूचित जाति समुदायों में कोरी, जाटव, पासी और अन्य दलित समुदायों की महत्वपूर्ण मौजूदगी है. यह विधानसभा क्षेत्र अपने मिश्रित शहरी-ग्रामीण स्वरूप के लिए भी जाना जाता है. अनुमान के अनुसार करीब 55.65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 44.35 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में रहती है. शहरी आबादी मुख्य रूप से उरई शहर और जालौन नगर पालिका बोर्ड क्षेत्रों में केंद्रित है.
उरई की अर्थव्यवस्था कृषि के साथ व्यापार, परिवहन, छोटे उद्योग और सेवा क्षेत्र पर आधारित है. आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली कृषि उपज के लिए शहर एक प्रमुख बाजार के रूप में काम करता है. कानपुर-झांसी राजमार्ग और रेलवे कॉरिडोर पर स्थित होने के कारण उरई परिवहन और वितरण केंद्र के रूप में विकसित हुआ है. 1986 में आवंटित भूमि पर विकसित औद्योगिक क्षेत्र ने विनिर्माण और वेयरहाउसिंग गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया है. उरई जालौन जिले के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां सरकारी और निजी संस्थान आसपास के क्षेत्रों से लोगों को आकर्षित करते हैं.
उरई एक प्राचीन बस्ती है और इसका पारंपरिक संबंध वैदिक ऋषि उद्दालक आरुणि से जोड़ा जाता है. व्यापक जालौन क्षेत्र का इतिहास भी काफी पुराना और घटनापूर्ण रहा है. इस क्षेत्र पर चंदेलों, दिल्ली सल्तनत, बुंदेलों, मुगलों और मराठों का शासन रहा, जिसके बाद 19वीं शताब्दी की शुरुआत में यह ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया. 1857 के विद्रोह से भी जिला बुरी तरह प्रभावित हुआ था. उस दौरान नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे से जुड़े संघर्ष उरई, कालपी, जालौन और कोंच सहित आसपास के क्षेत्रों तक फैले थे. सितंबर 1858 तक इस क्षेत्र में विद्रोह को दबा दिया गया था. 20वीं शताब्दी के स्वतंत्रता आंदोलन में दीवान शत्रुघ्न सिंह और रानी राजेंद्र कुमारी जैसे स्थानीय नेता बुंदेलखंड में राजनीतिक mobilization से जुड़े रहे.
उरई सड़क और रेल दोनों मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. उरई रेलवे स्टेशन मुख्य शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर है और कानपुर-झांसी रेलवे मार्ग पर स्थित है. कानपुर की दूरी करीब 105 किलोमीटर है, जबकि झांसी भी करीब 105 किलोमीटर और मध्य प्रदेश का पड़ोसी शहर ग्वालियर सड़क मार्ग से करीब 130 किलोमीटर दूर है. लखनऊ करीब 175 किलोमीटर, आगरा करीब 300 किलोमीटर, प्रयागराज करीब 245 किलोमीटर और वाराणसी करीब 350 किलोमीटर दूर है. अयोध्या की दूरी लगभग 350 से 370 किलोमीटर है.
उरई में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच कड़ा मुकाबला जारी है, जिसमें भाजपा को मामूली बढ़त हासिल है. 2009 के बाद हुए सात प्रमुख चुनावों में भाजपा ने दो विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की और दो लोकसभा चुनावों में बढ़त हासिल की, जबकि समाजवादी पार्टी ने एक विधानसभा चुनाव जीता और दो लोकसभा चुनावों में उरई विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाई. भाजपा का प्रभाव 2014 में मजबूत हुआ और 2024 में समाजवादी पार्टी ने उसे रोकते हुए बढ़त हासिल की. हालांकि उस समय भी विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की बढ़त 4.64 प्रतिशत अंक की रही, जिसे बहुत बड़ा अंतर नहीं माना जा सकता.
2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे हालांकि समाजवादी पार्टी को आगे की रणनीति बनाने का आधार देते हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इससे पहले भाजपा लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीत चुकी थी. बसपा भी अपने पुराने प्रभाव में गिरावट के बावजूद चुनावी गणित को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस विधानसभा क्षेत्र में बसपा को पारंपरिक दलित मतदाताओं के एक वर्ग का समर्थन अभी भी मिल सकता है. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण ने मतदाताओं की कुल संख्या को भी बदल दिया है, हालांकि इसके राजनीतिक प्रभाव तस्वीर साफ होने के साथ ही अधिक स्पष्ट होंगे.
फिलहाल भाजपा के पास मौजूदा विधायक, लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत और 2022 में बड़ी जीत का लाभ है. हालांकि समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त के आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरेगी. बसपा भी अभी प्रासंगिक है और उरई का राजनीतिक इतिहास बदलते राजनीतिक समर्थन का रहा है. ऐसे में भाजपा इस सीट को हल्के में लेने का जोखिम नहीं उठा सकती. वर्ष 2027 में उरई में एक कड़ा और दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल सकता है.
(अजय झा)