मोहनलालगंज लखनऊ जिले का एक कस्बा और तहसील मुख्यालय है, जिसे आसपास के गांवों के प्रमुख व्यावसायिक केंद्र के रूप में जाना जाता है. परंपरागत रूप से यह अनाज और कपड़ों की मंडी के लिए प्रसिद्ध रहा है और आज भी इसकी यह पहचान कायम है. राज्य की राजधानी लखनऊ से करीब 21 किलोमीटर दूर लखनऊ-रायबरेली रोड पर स्थित मोहनलालगंज एक पारंपरिक बाजार कस्बे से बढ़कर
लखनऊ के दक्षिणी छोर पर स्थित एक महत्वपूर्ण अर्ध-शहरी केंद्र बन चुका है. राजधानी के विस्तार के साथ मोहनलालगंज के आसपास नई आवासीय कॉलोनियां, शिक्षण संस्थान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित हुए हैं, हालांकि इसके बड़े ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में आज भी कृषि की अहम भूमिका है.
1952 के चुनावों से पहले अस्तित्व में आई मोहनलालगंज विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और मोहनलालगंज लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 1952 के पहले चुनाव में यह सामान्य यानी अनारक्षित सीट थी. 1957 में यह दो सदस्यीय विधानसभा क्षेत्र बन गया, जिसमें एक सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी और दूसरी सामान्य सीट थी. 1962 में यह पूरी तरह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र बन गया और तब से इसका दर्जा यही है. 2008 के परिसीमन के बाद इस विधानसभा क्षेत्र में पूरी मोहनलालगंज तहसील आती है, जिसमें मोहनलालगंज, अमेठी और नगराम नगर पंचायतों के साथ 229 गांव शामिल हैं. यहां का अमेठी लखनऊ जिले की नगर पंचायत है और इसका गांधी परिवार से जुड़े अमेठी से कोई संबंध नहीं है. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है और इसका छोटा शहरी हिस्सा तीन नगर पंचायतों तक सीमित है.
मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र में अब तक 19 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 1964 में हुआ उपचुनाव भी शामिल है. कांग्रेस ने यह सीट छह बार जीती है. समाजवादी पार्टी ने तीन बार जीत दर्ज की है. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 1957 में उपलब्ध दोनों सीटों सहित दो बार जीत हासिल की. जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी ने भी दो-दो बार सीट जीती है. जनता पार्टी सेक्युलर, जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और भाजपा ने इस सीट पर एक-एक बार जीत दर्ज की है.
व्यक्तिगत नेताओं की बात करें तो संत बक्स रावत ने यह सीट पांच बार जीती. उन्होंने दो बार जनता पार्टी और एक-एक बार जनता पार्टी सेक्युलर, जनता दल तथा समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की. मोहनलालगंज लोकसभा सीट से मौजूदा समाजवादी पार्टी सांसद आर.के. चौधरी विधानसभा सीट का तीन बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. उन्होंने एक बार बसपा और दो बार राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता.
2012 में चंद्र रावत ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर मोहनलालगंज विधानसभा सीट जीती. उन्होंने बसपा की अजेय पुष्पा रावत को 23,517 वोटों से हराया. यह मोहनलालगंज में समाजवादी पार्टी की 19 साल बाद पहली जीत थी. 2017 में समाजवादी पार्टी ने अम्बरीश सिंह पुष्कर को उम्मीदवार बनाकर सीट बरकरार रखी. पुष्कर ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रामबहादुर रावत को केवल 530 वोटों के अंतर से हराया.
भाजपा, जो कई दशकों तक विधानसभा चुनाव में इस सीट पर हाशिए पर रही थी, ने 2022 में तस्वीर बदल दी. भाजपा के उम्मीदवार अमरेश कुमार ने समाजवादी पार्टी की सुशीला सरोज को हराया. लगातार चुनावों में समाजवादी पार्टी की ओर से नए उम्मीदवार उतारने का फैसला उसके पक्ष में नहीं गया. अमरेश कुमार को 1,07,089 वोट मिले, जबकि सुशीला सरोज को 90,541 वोट हासिल हुए. इस तरह भाजपा ने 16,548 वोटों के अंतर से मोहनलालगंज विधानसभा सीट पर पहली बार जीत दर्ज की.
मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं के बदलते रुझान का असर लोकसभा चुनावों में भी दिखाई देता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों में चार अलग-अलग पार्टियां इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे आगे रही हैं. 2009 में राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी ने समाजवादी पार्टी पर 6,850 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में बसपा ने भाजपा को 2,484 वोटों के मामूली अंतर से पीछे छोड़ा. 2019 में भाजपा ने वापसी करते हुए बसपा पर 18,501 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में तस्वीर फिर तेजी से बदली. समाजवादी पार्टी के मोहनलालगंज उम्मीदवार आर.के. चौधरी को 1,28,032 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार कौशल किशोर को 96,303 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने विधानसभा क्षेत्र में 31,729 वोटों की बढ़त हासिल की.
मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र में एक दशक से अधिक समय तक मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी. 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 3,20,671 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,41,177 हो गई. 2019 में यह संख्या 3,51,699 रही. 2022 में विधानसभा क्षेत्र में 3,63,268 मतदाता थे और 2024 में यह संख्या बढ़कर 3,66,086 हो गई. हालांकि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद मतदाताओं की संख्या में कमी आई. 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 3,18,771 मतदाता दर्ज थे. यह पुनरीक्षण से पहले दर्ज 3,59,016 मतदाताओं की तुलना में 40,245 की कमी है. यह कमी पुनरीक्षण से पहले के मतदाताओं की संख्या का करीब 11.21 प्रतिशत है.
हाल के वर्षों में मोहनलालगंज में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत ऊंचा रहा है. 2012 में मतदान 64.72 प्रतिशत रहा और 2017 में मामूली बढ़कर 65.24 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 63.73 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़कर 67.71 प्रतिशत पहुंच गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में 66.39 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया.
मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र हिंदू बहुल है और यहां मुस्लिम मतदाताओं की भी मौजूदगी है. अनुमान के मुताबिक मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का करीब 10.70 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी करीब 41.73 प्रतिशत है. यहां पासी, जाटव, कोरी और अन्य अनुसूचित जाति समुदायों की महत्वपूर्ण मौजूदगी है. पासी समुदाय की संख्या इस क्षेत्र में खास तौर पर प्रभावशाली मानी जाती है. यादव, कुर्मी, लोध, मौर्य, कुशवाहा, निषाद, काछी और अन्य ओबीसी समुदाय भी यहां के महत्वपूर्ण मतदाता समूह हैं. वहीं ब्राह्मण और ठाकुर समुदाय भी क्षेत्र में महत्वपूर्ण सामाजिक समूह हैं.
मोहनलालगंज की 92.96 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जबकि केवल 7.04 प्रतिशत आबादी तीन नगर पंचायतों में रहती है. क्षेत्र की ग्रामीण पहचान इसकी अर्थव्यवस्था, बसावट और चुनावी मुद्दों में भी दिखाई देती है.
बाजार कस्बे के रूप में मोहनलालगंज का इतिहास 1859 तक जाता है. इसी वर्ष राजा काशी परशाद ने यहां बाजार स्थापित किया था और इसका नाम अपने ससुर मोहन लाल के नाम पर रखा था, जिनसे उन्हें यह संपत्ति मिली थी. 20वीं सदी की शुरुआत तक मोहनलालगंज एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था. यहां खास तौर पर अनाज और कपड़ों का कारोबार होता था. बाजार के प्रवेश मार्गों पर बने बड़े मेहराब इसकी पहचान का हिस्सा थे. काशी परशाद ने कस्बे में एक बड़ा मंदिर भी बनवाया था.
यह विधानसभा क्षेत्र लखनऊ जिले के दक्षिणी हिस्से में गंगा के मैदानी क्षेत्र की समतल जलोढ़ भूमि में स्थित है. यहां का भूभाग मुख्य रूप से समतल है, जहां कृषि क्षेत्र, गांवों की बस्तियां, तालाब और कुछ निचले इलाके दिखाई देते हैं. व्यापक मोहनलालगंज क्षेत्र सई और गोमती नदी तंत्र के बीच लखनऊ-ऊपरवार मैदान में आता है. सई नदी दक्षिणी लखनऊ जिले की जल निकासी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके अलावा क्षेत्र में कई छोटी धाराएं और जल निकासी नाले भी हैं. यहां की मिट्टी आम तौर पर खेती और बागवानी के लिए उपयुक्त है, हालांकि कुछ हिस्सों में ऊसर यानी लवणीय भूमि और जलभराव वाले क्षेत्र भी पाए जाते हैं.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार आज भी कृषि है. विधानसभा क्षेत्र में गेहूं, धान, दलहन, सब्जियों और अन्य फसलों की खेती होती है. डेयरी और पशुपालन भी किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत हैं. लखनऊ से नजदीकी ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे बदला है. राजधानी के करीब के इलाकों में जमीन का विकास, निर्माण कार्य, परिवहन, खुदरा व्यापार, निजी शिक्षण संस्थान और छोटे कारोबार तेजी से बढ़े हैं.
लखनऊ के दक्षिणी हिस्से की ओर स्थित होने के कारण मोहनलालगंज की कनेक्टिविटी में भी सुधार हुआ है. लखनऊ-रायबरेली रोड यहां का प्रमुख सड़क मार्ग है. मोहनलालगंज में लखनऊ-रायबरेली रेलवे लाइन पर एक रेलवे स्टेशन भी है, जिससे लखनऊ और रायबरेली की ओर यात्री आवागमन होता है.
मोहनलालगंज लखनऊ से करीब 21 किलोमीटर दूर है. यह रायबरेली से करीब 59 से 65 किलोमीटर, कानपुर से करीब 75 से 80 किलोमीटर, अयोध्या से करीब 140 से 150 किलोमीटर, प्रयागराज से करीब 145 से 155 किलोमीटर और वाराणसी से करीब 250 से 300 किलोमीटर की दूरी पर है. दूरी मार्ग के हिसाब से कुछ कम या ज्यादा हो सकती है. यह उन्नाव से करीब 35 से 40 किलोमीटर और बाराबंकी से करीब 35 किलोमीटर दूर है.
मोहनलालगंज विधानसभा क्षेत्र में 2009 से शुरू हुए पिछले सात प्रमुख चुनावों का स्कोरकार्ड मतदाताओं के बदलते रुझान को दिखाता है. समाजवादी पार्टी ने तीन चुनावों में जीत या बढ़त हासिल की है. भाजपा दो चुनावों में आगे रही है, जबकि बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी ने एक-एक बार बढ़त बनाई. लंबे समय तक हाशिए पर रहने के बाद भाजपा ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया और 2022 में विधानसभा चुनाव जीत लिया. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने विधानसभा क्षेत्र में 31,729 वोटों की मजबूत बढ़त लेकर भाजपा के प्रदर्शन को कुछ हद तक चुनौती दी.
2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की कोशिश होगी कि मोहनलालगंज के मतदाता विधानसभा चुनाव में अलग रुख अपनाएं. अगर एक बार फिर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मतदान का पैटर्न अलग रहता है, तो भाजपा को अपनी सीट बचाने में मदद मिल सकती है. इसके लिए पार्टी को अनुसूचित जाति के मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ अन्य हिंदू समुदायों और जातियों का समर्थन भी मजबूत करना होगा. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी 2024 के मजबूत प्रदर्शन को आधार बनाकर पासी और अन्य दलित समूहों के बीच अपना समर्थन बनाए रखना चाहेगी. साथ ही पार्टी की कोशिश ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपने आधार को भी मजबूत रखने की होगी.
एसआईआर ने चुनावी गणित में एक और अनिश्चितता जोड़ दी है. अंतिम मतदाता सूची में पुनरीक्षण से पहले की सूची की तुलना में 40 हजार से अधिक मतदाता कम हैं. यह स्पष्ट नहीं है कि हटाए गए मतदाताओं का सामाजिक या राजनीतिक समूहों के हिसाब से वितरण किस तरह हुआ है. केवल मतदाताओं की संख्या में बदलाव के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किस पार्टी को इसका फायदा होगा.
2027 के विधानसभा चुनाव में मोहनलालगंज का मतदान किस दिशा में जाएगा, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है. इतना तय है कि मुकाबला किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा. भाजपा 2022 में पहली बार जीती सीट को बचाने की कोशिश करेगी, जबकि समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में मजबूत प्रदर्शन के बाद विधानसभा सीट वापस हासिल करना चाहेगी. चुनाव का नतीजा एक बार फिर इस बात पर निर्भर कर सकता है कि कौन सा दल अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ लेकर जीत का मजबूत समीकरण तैयार कर पाता है.
(अजय झा)