मऊरानीपुर उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में स्थित एक नगर पालिका परिषद कस्बा और मऊरानीपुर तहसील का मुख्यालय है. यह झांसी-नौगांव मार्ग पर झांसी से लगभग 65 किलोमीटर पूर्व में स्थित है और बुंदेलखंड क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक तथा प्रशासनिक केंद्र है. इसके आसपास का ग्रामीण इलाका मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि यह कस्बा आसपास के गांवों के
लिए एक बाजार के रूप में कार्य करता है.
मऊरानीपुर 1967 से विधानसभा क्षेत्र रहा है और यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. यह झांसी लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें पूरी मऊरानीपुर तहसील, टोड़ी फतेहपुर नगर पंचायत, टहरौली और टोड़ी फतेहपुर के कानूनगो सर्किल तथा बघेरा कानूनगो सर्किल की 17 पंचायतें शामिल हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है, हालांकि मऊरानीपुर कस्बा और टोड़ी फतेहपुर इसमें शहरी क्षेत्र का हिस्सा भी जोड़ते हैं.
मऊरानीपुर में विधानसभा क्षेत्र के गठन के बाद से अब तक 15 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस और भाजपा यहां की सबसे सफल पार्टियां रही हैं. कांग्रेस ने छह बार और भाजपा ने पांच बार यह सीट जीती है, जिसमें भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की एक जीत भी शामिल है. जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और अपना दल (सोनेलाल) ने भी एक-एक बार इस सीट पर जीत हासिल की है. हाल के वर्षों में यह विधानसभा क्षेत्र ऐसी सीट बन गया है, जहां अलग-अलग पार्टियों को जीत मिली है. 2002 से 2022 के बीच हुए पांच विधानसभा चुनावों में हर बार अलग पार्टी ने जीत दर्ज की. मऊरानीपुर की राजनीति की एक अन्य विशेषता यह है कि यहां के मतदाताओं ने पार्टी बदलकर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को भी स्वीकार किया है और कभी-कभी उन्हें चुनाव में इसका लाभ भी मिला है.
2012 में समाजवादी पार्टी की रश्मि आर्या ने बसपा के राजेंद्र राहुल अहिरवार को 6,648 वोटों से हराकर यह सीट जीती थी. 2017 में भाजपा तीसरे स्थान से आगे बढ़कर पहले स्थान पर पहुंची और उसने यह सीट जीत ली. भाजपा ने बिहारी लाल आर्य को उम्मीदवार बनाया, जो इससे पहले कांग्रेस के टिकट पर दो बार चुनाव जीत चुके थे. उन्होंने समाजवादी पार्टी की मौजूदा विधायक रश्मि आर्या को 16,971 वोटों से हराया. 2022 में भाजपा ने गठबंधन सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) के लिए यह सीट छोड़ दी. समाजवादी पार्टी छोड़कर अपना दल (सोनेलाल) में शामिल हुईं रश्मि आर्या ने इस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और आसानी से जीत हासिल की. उन्हें 143,577 वोट मिले, जबकि उनकी पूर्व समाजवादी पार्टी सहयोगी तिलक चंद्र अहिरवार को 84,982 वोट मिले. इस तरह रश्मि आर्या ने 58,595 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
मऊरानीपुर विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा चुनावों के दौरान भी इसी तरह बदलते राजनीतिक रुझान देखने को मिले हैं. 2009 में कांग्रेस ने बसपा पर 4,008 वोटों की बढ़त बनाई थी, जबकि समाजवादी पार्टी और भाजपा क्रमशः तीसरे और चौथे स्थान पर रही थीं. 2014 में समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर मामूली बढ़त हासिल की थी. उस चुनाव में सपा को भाजपा से 801 वोट अधिक मिले थे. 2019 में भाजपा शीर्ष पर पहुंच गई और उसने समाजवादी पार्टी पर 42,687 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में यह बढ़त फिर बदल गई. कांग्रेस उम्मीदवार प्रदीप जैन आदित्य को 127,517 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार अनुराग शर्मा को 112,423 वोट मिले. इस तरह मऊरानीपुर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को 15,094 वोटों की बढ़त मिली. कांग्रेस के साथ गठबंधन के तहत समाजवादी पार्टी ने झांसी लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा, जबकि बसपा ने उम्मीदवार उतारा, लेकिन वह तीसरे स्थान पर रही.
मऊरानीपुर में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 360,095 से बढ़कर 2017 में 402,071 और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 403,509 हो गई. 2022 में यह संख्या 413,993 और 2024 में 423,301 थी. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 386,455 मतदाता दर्ज किए गए. यह 2024 के आंकड़े से 36,846 कम है, यानी इसमें 8.71 प्रतिशत की कमी आई है.
मऊरानीपुर में मतदान प्रतिशत काफी अधिक रहा है, हालांकि इसमें कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं. 2012 में मतदान प्रतिशत 64.69 रहा, जो 2017 में बढ़कर 66.86 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 64.82 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 67.03 हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 61.66 प्रतिशत रह गया.
मऊरानीपुर हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. मुस्लिम आबादी का अनुमान लगभग पांच प्रतिशत है. अनुसूचित जाति की आबादी कुल जनसंख्या का अनुमानित 34.98 प्रतिशत है, जिससे इस आरक्षित सीट पर दलित समुदाय चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं. यहां की सामाजिक संरचना में अहिरवार, कोरी, जाटव, पासी और अन्य अनुसूचित जाति समुदायों के साथ यादव, ब्राह्मण, कुशवाहा, कुर्मी, लोधी, ठाकुर, वैश्य और साहू व्यापारी समुदाय शामिल हैं. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है. यहां की लगभग 81.11 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 18.89 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
मऊरानीपुर को पहले मधुपुरी के नाम से जाना जाता था. बुंदेला शासकों के शासनकाल में यह एक बाजार कस्बे के रूप में विकसित हुआ. मध्यकाल के दौरान इस व्यापक क्षेत्र पर चंदेलों का नियंत्रण रहा और बाद में यह झांसी रियासत का हिस्सा बन गया. 1857 के विद्रोह के दौरान मऊरानीपुर रानी लक्ष्मीबाई के अधीन एक परगना था. अगस्त 1857 में टिहरी की रानी की सेना द्वारा इस पर कब्जा किए जाने के बाद यहां संघर्ष हुआ. उसी वर्ष अक्टूबर में टिहरी की सेना के साथ युद्ध के बाद लक्ष्मीबाई ने फिर से इस क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल कर लिया.
मऊरानीपुर अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है और स्थानीय निवासी इसे लोकप्रिय रूप से छोटी अयोध्या भी कहते हैं. यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों में कस्बे के पास एक पहाड़ी पर स्थित केदारेश्वर मंदिर शामिल है, जिसका संबंध प्राचीन स्थानीय परंपराओं से माना जाता है. मऊरानीपुर में शिव और अन्य देवी-देवताओं को समर्पित कई पुराने मंदिर भी हैं.
ब्रिटिश शासन के दौरान मऊरानीपुर एक व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ. यह विशेष रूप से खारुआ या खारुद नामक टिकाऊ लाल रंग के कपड़े के निर्माण के लिए जाना जाता था. 1869 में इसे नगरपालिका बनाया गया और आज भी यह तहसील का प्रमुख कस्बा है. इस व्यापक क्षेत्र को पारंपरिक फाग गीतों के लिए भी जाना जाता है, जिन्हें खासकर होली के दौरान गाया जाता है. ईसुरी, जो ईसुरी फाग परंपरा के विकास से जुड़े लोक कवि थे, का जन्म मऊरानीपुर के पास एक गांव में हुआ था. ये गीत आज भी बुंदेलखंड की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
कृषि और व्यापार आज भी यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार हैं. किसान बुंदेलखंड की जलवायु के अनुकूल फसलें उगाते हैं, जबकि कस्बे के बाजार कृषि उपज, पशुधन और रोजमर्रा की वस्तुओं की बिक्री में सहायता करते हैं. खुदरा व्यापार, परिवहन, छोटे व्यवसाय और सार्वजनिक सेवाएं भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती हैं. विधानसभा क्षेत्र के गांवों में पानी की उपलब्धता, सिंचाई, ग्रामीण सड़कों और कृषि से होने वाली आय से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण बने हुए हैं.
मऊरानीपुर में झांसी-मानिकपुर रेल मार्ग पर एक रेलवे स्टेशन है और यह सड़क मार्ग से झांसी तथा आसपास के कस्बों से जुड़ा हुआ है. झांसी यहां से लगभग 65 किलोमीटर दूर है, जबकि ललितपुर की दूरी करीब 110 किलोमीटर है. ओरछा लगभग 70 से 80 किलोमीटर दूर है और मध्य प्रदेश का टीकमगढ़ करीब 75 से 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. छतरपुर लगभग 125 से 135 किलोमीटर दूर है, जबकि ग्वालियर की दूरी करीब 160 से 175 किलोमीटर है. खजुराहो लगभग 170 से 190 किलोमीटर दूर है. कानपुर की दूरी करीब 230 से 250 किलोमीटर है, जबकि राज्य की राजधानी लखनऊ सड़क मार्ग से लगभग 320 से 340 किलोमीटर दूर है.
2009 के बाद से मऊरानीपुर विधानसभा क्षेत्र में हुए सात प्रमुख चुनावों में राजनीतिक समर्थन का लगातार बदलना स्पष्ट दिखाई देता है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और भाजपा ने दो-दो चुनावों में जीत या बढ़त हासिल की है, जबकि अपना दल (सोनेलाल) ने एक बार ऐसा किया है. भाजपा या अपना दल (सोनेलाल) में से कोई भी पार्टी इस सीट से चुनाव लड़े, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को यहां अपनी स्थिति का लाभ मिलने का दावा किया जा सकता है, क्योंकि गठबंधन के घटक दलों ने पिछले दो विधानसभा चुनाव जीते हैं. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार ने जिस तरह वापसी करते हुए इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त हासिल की, उससे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है.
2027 में मऊरानीपुर के मतदाता किसे चुनेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है. विपक्ष को उम्मीद होगी कि वह 2024 में मिली 5.78 प्रतिशत अंकों की बढ़त को आगे भी बनाए रखेगा, लेकिन लोकसभा चुनाव में किसी विधानसभा क्षेत्र में मिली बढ़त अपने आप विधानसभा चुनाव में जीत की गारंटी नहीं होती. भाजपा और अपना दल (सोनेलाल) को भी अपने गठबंधन और उम्मीदवार के चयन को लेकर फैसला करना होगा. विशेष गहन पुनरीक्षण ने चुनावी गणित में एक और बदलाव जोड़ दिया है. इतना तय है कि मऊरानीपुर में मुकाबला करीबी और कड़ा होने जा रहा है.
(अजय झा)