महमूदाबाद उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले का एक उपखंड स्तर का नगर है, जहां नगर पालिका बोर्ड है. कभी अवध के तत्कालीन राज्य की सबसे बड़ी सामंती जागीरों में से एक का केंद्र रहा यह नगर अब महमूदाबाद तहसील के मुख्यालय और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण शहरी तथा वाणिज्यिक केंद्र के रूप में कार्य करता है.
तहत गठित महमूदाबाद एक सामान्य, गैर-आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है और सीतापुर लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन अभ्यास के बाद इसकी सीमाओं में अब पूरा महमूदाबाद नगर पालिका बोर्ड और पैतेपुर नगर पंचायत, महमूदाबाद तथा पहला कानूनगो सर्किल और सदरपुर कानूनगो सर्किल के 18 गांव शामिल हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
महमूदाबाद ने 1962 में पहली बार मतदान करने के बाद से 16 विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया है. कांग्रेस पार्टी और भाजपा ने इस सीट पर छह-छह बार जीत हासिल की है. भाजपा की संख्या में उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की पहली चुनाव में मिली एकमात्र जीत भी शामिल है. समाजवादी पार्टी ने दो बार, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 1967 में और जनता पार्टी ने 1977 में एक-एक बार यह सीट जीती. व्यक्तिगत नेताओं में नरेंद्र सिंह वर्मा ने इस विधानसभा क्षेत्र से छह बार जीत हासिल की है, जिनमें भाजपा के लिए चार और समाजवादी पार्टी के लिए दो जीत शामिल हैं.
समाजवादी पार्टी ने 2012 में महमूदाबाद में अपना खाता खोला था. इसमें तत्कालीन भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह वर्मा की भूमिका रही, जिन्होंने पार्टी बदल ली थी. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के अहमद अंसारी को 19,589 मतों से हराकर अपना पांचवां कार्यकाल जीता. लंबे समय तक अपने नेता के चले जाने के बाद भाजपा पांचवें स्थान पर खिसक गई और उसकी जमानत जब्त हो गई.
2017 में भाजपा ने काफी वापसी की और पांचवें स्थान से उठकर मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी बन गई. हालांकि नरेंद्र सिंह वर्मा ने समाजवादी पार्टी के लिए सीट बरकरार रखी और भाजपा की उम्मीदवार आशा मौर्य को केवल 1,906 मतों के अंतर से हराया. 2022 में परिणाम बदल गया और भाजपा ने आखिरकार यह विधानसभा क्षेत्र फिर से जीत लिया. आशा मौर्य को 92,091 वोट मिले, जबकि नरेंद्र सिंह वर्मा को 86,869 वोट मिले. इस तरह भाजपा ने 5,222 मतों के अंतर से जीत दर्ज की.
महमूदाबाद विधानसभा क्षेत्र में मतदान के रुझान लोकसभा चुनावों के दौरान भी लगातार राजनीतिक बदलाव की ओर संकेत करते हैं. 2009 में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर 12,026 मतों की बढ़त बनाई थी, जबकि भाजपा काफी पीछे चौथे स्थान पर रही थी. 2014 में भाजपा ने बड़ी बढ़त बनाई और बहुजन समाज पार्टी पर 15,896 मतों की बढ़त हासिल की. 2019 में उसकी बढ़त और बढ़कर 24,709 मत हो गई और इस बार भी मुकाबला बहुजन समाज पार्टी के साथ था.
2024 में बढ़त का रुख बदल गया, जब कांग्रेस पार्टी ने अपने सहयोगी समाजवादी पार्टी के समर्थन के साथ भाजपा को पीछे छोड़ दिया. कांग्रेस उम्मीदवार राकेश राठौर को 104,027 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार राजेश वर्मा को 84,106 वोट मिले. इस तरह महमूदाबाद विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी ने 19,921 मतों की बढ़त हासिल की.
महमूदाबाद में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मतदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 263,909 से बढ़कर 2017 में 290,920, 2019 में 299,730, 2022 में 315,673 और 2024 में 328,210 हो गई. मतदान प्रतिशत लगातार ऊंचा रहा है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव भी देखा गया है. 2012 में मतदान 70.41 प्रतिशत था और 2017 में बढ़कर 72.41 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 67.99 प्रतिशत रहा, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 69.67 प्रतिशत हो गया. 2024 के संसदीय चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 64.45 प्रतिशत रह गया.
हालांकि महमूदाबाद नगर में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है, लेकिन पूरे विधानसभा क्षेत्र में हिंदू आबादी बहुसंख्यक है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 27 प्रतिशत है. अनुसूचित जाति के मतदाता लगभग 27.70 प्रतिशत हैं. शेष मतदाताओं में यादव और कुर्मी सहित विभिन्न अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों के साथ-साथ सवर्ण और अन्य पिछड़े समुदाय शामिल हैं. यह सीट मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 85.74 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों में और 14.26 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में रहते हैं.
महमूदाबाद की स्थापना 17वीं शताब्दी में नवाब महमूद खान ने की थी, जो वर्तमान महमूदाबाद के राजा के पूर्वज थे. इसके बाद यह अवध की प्रमुख तालुकेदारी जागीरों में से एक के रूप में विकसित हुआ. परिवार का किला, जिसमें एक दुर्ग और महल परिसर शामिल था, स्थानीय प्रशासन और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. 1857 के विद्रोह के दौरान तत्कालीन राजा ने विद्रोहियों का साथ दिया था. इसके बाद ब्रिटिश शासन ने मूल किले को नष्ट कर दिया और बाद में इसे फिर से बनाया गया. ब्रिटिश शासन के दौरान भी यह जागीर एक महत्वपूर्ण सामंती संपत्ति बनी रही. आजादी के बाद यह नगर आसपास की तहसील के मुख्यालय और एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र के रूप में बना रहा.
महमूदाबाद सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. महमूदाबाद अवध रेलवे स्टेशन नगर को क्षेत्र के अन्य हिस्सों से रेल संपर्क प्रदान करता है. यह नगर सीतापुर से लगभग 65 किलोमीटर, लखनऊ से 60 किलोमीटर, बाराबंकी से 40 किलोमीटर, बहराइच से 60 किलोमीटर, अयोध्या से करीब 130 किलोमीटर और वाराणसी से लगभग 300 किलोमीटर दूर है. जिले के सीतापुर-लखनऊ वाले हिस्से में स्थित होने के कारण आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लिए इसका वाणिज्यिक और प्रशासनिक महत्व बना हुआ है.
पिछले सात प्रमुख चुनावों में भाजपा और समाजवादी पार्टी ने महमूदाबाद में तीन-तीन चुनाव जीते या बढ़त हासिल की है, लेकिन यह आंकड़ा विधानसभा क्षेत्र की पूरी राजनीतिक तस्वीर नहीं बताता. इस क्षेत्र की एक प्रमुख विशेषता उन नेताओं की भूमिका रही है, जिन्होंने भाजपा छोड़कर दूसरी पार्टियों का रुख किया और बाद में अपनी पूर्व पार्टी के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश की. समाजवादी पार्टी ने 2012 में वरिष्ठ भाजपा नेता नरेंद्र सिंह वर्मा के पार्टी में शामिल होने के बाद महमूदाबाद में अपना खाता खोला था. वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की ओर से उम्मीदवार बने राकेश राठौर भी पहले भाजपा से जुड़े रहे थे.
भाजपा ने आखिरकार 2022 में दोबारा विधानसभा सीट हासिल की, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में महमूदाबाद विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी की बड़ी बढ़त ने 2027 से पहले राजनीतिक तस्वीर को और जटिल बना दिया है. भाजपा को उम्मीद होगी कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने वाले राजनीतिक समीकरण अलग-अलग तरीके से उसके पक्ष में काम करेंगे. वहीं समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाला विपक्ष 2024 की बढ़त को विधानसभा चुनाव में आगे ले जाने की कोशिश करेगा. महमूदाबाद में राजनीतिक पसंद के बार-बार बदलने का इतिहास यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी पक्ष मतदाताओं को हल्के में नहीं ले सकता. इसी वजह से 2027 का चुनाव यहां प्रतिस्पर्धी और करीबी मुकाबले वाला हो सकता है.
(अजय झा)