लखनऊ पश्चिम एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और लखनऊ लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. यह लखनऊ शहर के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों को कवर करता है और इसमें पुराने लखनऊ के कई मोहल्ले शामिल हैं. यह घनी आबादी वाला शहरी विधानसभा क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में आवासीय कॉलोनियां, शिक्षण संस्थान, बाजार और सेवा क्षेत्र से
जुड़े प्रतिष्ठान हैं. इस क्षेत्र पर पुराने लखनऊ से जुड़ी मुस्लिम संस्कृति और परंपराओं की भी स्पष्ट छाप दिखाई देती है.
1952 के चुनावों से पहले गठित लखनऊ पश्चिम में अब तक 19 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2009 का उपचुनाव भी शामिल है. 1957 में यह क्षेत्र कुछ समय के लिए दो विधायकों वाला विधानसभा क्षेत्र बना था, लेकिन 1962 में फिर से एक विधायक वाला क्षेत्र हो गया.
भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट पर आठ बार जीत दर्ज की है, जिसमें 1967 में उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की एक जीत भी शामिल है. कांग्रेस पार्टी ने भी आठ बार यह सीट जीती है, जिसमें 1957 में दो विधायकों के चुनाव के दौरान मिली दोनों जीत शामिल हैं. समाजवादी पार्टी ने दो बार, जबकि भारतीय क्रांति दल और जनता पार्टी ने एक-एक बार इस सीट पर जीत दर्ज की है. 1989 से 2007 के बीच भाजपा ने लगातार छह चुनाव जीते. इस दौरान राम कुमार शुक्ला और लालजी टंडन ने तीन-तीन बार जीत दर्ज की.
लखनऊ का अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ाव इस क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है. वाजपेयी ने 1991 से 2004 तक लखनऊ लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया और लगातार पांच चुनाव जीते. इससे लखनऊ भाजपा के प्रमुख राजनीतिक गढ़ों में शामिल हो गया. 2009 में उम्र और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जब उन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया, तब भाजपा ने लालजी टंडन को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत दर्ज की. हालांकि, टंडन की जीत के कारण लखनऊ पश्चिम विधानसभा सीट खाली हो गई. इसके बाद 2009 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने 2,176 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और भाजपा का लंबे समय से चला आ रहा कब्जा समाप्त हो गया. इसके बाद भाजपा इस विधानसभा सीट पर केवल एक बार ही जीत हासिल कर सकी.
2012 में मोहम्मद रेहान नईम ने लखनऊ पश्चिम में समाजवादी पार्टी का खाता खोला. उन्होंने भाजपा के सुरेश कुमार श्रीवास्तव को 7,812 वोटों से हराया. कांग्रेस के मौजूदा विधायक श्याम किशोर शुक्ला तीसरे स्थान पर रहे. 2017 में परिणाम बदल गया और सुरेश कुमार श्रीवास्तव ने समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक मोहम्मद रेहान नईम को 13,072 वोटों से हराया. 2021 में कोविड से जुड़ी जटिलताओं के बाद श्रीवास्तव का निधन हो गया. इसके बाद भाजपा ने अंजनी कुमार श्रीवास्तव को उम्मीदवार बनाया, जबकि समाजवादी पार्टी ने रेहान नईम की जगह अरमान खान को मैदान में उतारा. दोनों नए उम्मीदवारों के बीच हुए मुकाबले में अरमान खान विजयी रहे. उन्हें 1,24,497 वोट मिले, जबकि अंजनी कुमार श्रीवास्तव को 1,16,313 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने 8,184 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा को लखनऊ पश्चिम में जिस तरह की चुनौती मिली है, उसका असर लोकसभा चुनावों में उसी स्तर पर नहीं दिखा है. 2009 में लखनऊ पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवार लालजी टंडन ने समाजवादी पार्टी के मुकाबले 6,862 वोटों की बढ़त हासिल की थी. 2014 में भी भाजपा आगे रही. उस चुनाव में राजनाथ सिंह उम्मीदवार थे और उन्होंने इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के मुकाबले 35,424 वोटों की बढ़त बनाई. 2019 में भाजपा की बढ़त कांग्रेस के मुकाबले और बढ़कर 54,486 वोट हो गई. 2024 में भाजपा की स्थिति कमजोर हुई. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रविदास मेहरोत्रा को 1,26,295 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार राजनाथ सिंह को 1,20,625 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने विधानसभा क्षेत्र में 5,670 वोटों की बढ़त हासिल की. हालांकि, राजनाथ सिंह ने लखनऊ लोकसभा सीट पर आरामदायक अंतर से जीत दर्ज की.
लखनऊ पश्चिम में समय के साथ मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 3,40,251 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,87,874 और 2019 में 4,11,978 हो गई. 2022 में यह संख्या बढ़कर 4,43,423 और 2024 में 4,71,086 हो गई. बड़े शहरी विधानसभा क्षेत्रों की तरह यहां भी मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा है. 2012 में मतदान 49.98 प्रतिशत था, जो 2017 में बढ़कर 56.10 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 55.26 प्रतिशत रहा, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 58.59 प्रतिशत हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान फिर घटकर 54.48 प्रतिशत रहा.
लखनऊ पश्चिम हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की भी बड़ी संख्या है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता यहां के कुल मतदाताओं का करीब 39.40 प्रतिशत हैं और वे सबसे बड़ा सामाजिक समूह हैं. अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 7.90 प्रतिशत है. अन्य महत्वपूर्ण समुदायों में ब्राह्मण, कायस्थ, ठाकुर, यादव, लोध और वैश्य शामिल हैं. इसके अलावा अन्य ओबीसी और दलित समुदाय भी यहां मौजूद हैं. अनुसूचित जाति के प्रमुख समूहों में पासी समुदाय शामिल है. यह पूरी तरह शहरी विधानसभा क्षेत्र है और इसके सभी मतदाता लखनऊ नगर निगम की सीमा में रहते हैं. 2008 के परिसीमन के बाद लखनऊ पश्चिम में नगर निगम के 17 निर्धारित वार्ड शामिल किए गए, जिससे इसका शहरी सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप स्पष्ट होता है.
लखनऊ पश्चिम में शहर के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी हिस्से का एक बड़ा क्षेत्र शामिल है. इसमें शहर के पुराने मोहल्लों के साथ पिछले कई दशकों में विकसित हुए घनी आबादी वाले आवासीय इलाके भी आते हैं. राजाजीपुरम, सआदतगंज, कश्मीरी मोहल्ला और कैंपबेल रोड के आसपास के क्षेत्र यहां के सामाजिक और कारोबारी माहौल का हिस्सा हैं. विधानसभा क्षेत्र में काला इमामबाड़ा, शीतला देवी मंदिर और टिकैत राय तालाब जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल भी हैं. यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से शहरी है. स्थानीय लोग व्यापार, छोटे कारोबार, सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों, शिक्षा, परिवहन, खुदरा कारोबार और विभिन्न सेवा क्षेत्रों में काम करते हैं.
लखनऊ पश्चिम की सड़क और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था शहर के अन्य हिस्सों से जुड़ी हुई है. प्रमुख सड़कें शहर के पश्चिमी हिस्सों को हजरतगंज, विधानसभा क्षेत्र और अन्य केंद्रीय इलाकों से जोड़ती हैं. लखनऊ मेट्रो फिलहाल लखनऊ पश्चिम के मुख्य हिस्से से होकर नहीं गुजरती है, हालांकि मौजूदा मेट्रो नेटवर्क सड़कों और सार्वजनिक परिवहन के जरिए आसपास के इलाकों तक पहुंच उपलब्ध कराता है. लखनऊ की व्यापक सिटी बस और साझा परिवहन व्यवस्था भी इस क्षेत्र में सेवाएं देती है. चारबाग रेलवे स्टेशन और लखनऊ जंक्शन शहर को व्यापक रेल नेटवर्क से जोड़ते हैं.
पिछले सात प्रमुख चुनावों में लखनऊ पश्चिम का आंकड़ा भाजपा के पक्ष में 4 और समाजवादी पार्टी के पक्ष में 3 रहा है. ये आंकड़े बताते हैं कि इस विधानसभा क्षेत्र में दोनों दलों के बीच मुकाबला काफी करीबी रहा है. 2022 का विधानसभा चुनाव जीतने और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से आगे रहने के बाद समाजवादी पार्टी 2027 में बढ़त के साथ उतरने की स्थिति में है. हालांकि, उसकी जीत का अंतर इतना बड़ा नहीं रहा है कि उसे पूरी तरह सुरक्षित बढ़त माना जा सके. समाजवादी पार्टी को बड़े मुस्लिम मतदाता वर्ग के साथ ओबीसी मतदाताओं के कुछ हिस्सों से भी समर्थन मिलता है. भाजपा की मुख्य चुनौती हिंदू मतदाताओं के बीच एकजुटता बढ़ाने की होगी. अगर मुस्लिम मतदाता एक बार फिर समाजवादी पार्टी के पक्ष में एकजुट होते हैं, तो धार्मिक ध्रुवीकरण भाजपा को विपक्ष की हालिया बढ़त को पार करने में मदद कर सकता है.
भाजपा के लिए उसके पुराने प्रदर्शन और 2022 में विधानसभा सीट हारने के बावजूद मुकाबले में बने रहने की क्षमता राहत का कारण हो सकती है. किसी भी दल के पास स्पष्ट बढ़त नहीं होने के कारण लखनऊ पश्चिम 2027 के विधानसभा चुनाव में राज्य के करीबी मुकाबले वाले शहरी क्षेत्रों में शामिल रह सकता है. यहां चुनावी नतीजा आखिरी दौर तक बेहद करीबी रहने की संभावना है.
(अजय झा)