लखनऊ सेंट्रल उत्तर प्रदेश की राजधानी का कारोबारी और संस्थागत केंद्र है, जिसमें हजरतगंज का प्रमुख शॉपिंग इलाका और अमीनाबाद, नजीराबाद तथा कैसरबाग के पारंपरिक बाजार शामिल हैं. यह शहर का घनी आबादी वाला हिस्सा है, जहां नवाबों के दौर की पुरानी विरासत आधुनिक कारोबार, सरकारी कार्यालयों, होटलों, रेस्तरां और आवासीय कॉलोनियों के साथ दिखाई देती है. यह
विधानसभा क्षेत्र लखनऊ की खास खानपान संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा है, जहां बिरयानी, कबाब, चाट और अवधी व्यंजनों की दूसरी किस्में पूरे शहर से लोगों को आकर्षित करती हैं. हजरतगंज अपनी दुकानों, रेस्तरां, कार्यालयों और शहर के शहरी अभिजात वर्ग के साथ लंबे जुड़ाव के कारण इस क्षेत्र के सबसे पहचाने जाने वाले हिस्सों में बना हुआ है. अमीनाबाद और नजीराबाद ग्राहकों के कहीं अधिक व्यापक वर्ग की जरूरतें पूरी करते हैं, जबकि कैसरबाग आज भी ऐतिहासिक और कारोबारी केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण है.
लखनऊ सेंट्रल एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है, जो 1952 से अस्तित्व में है और लखनऊ लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. परिसीमन के बाद समय-समय पर इसकी सीमाओं में बदलाव हुआ है. हालांकि, इसने शहर के केंद्रीय हिस्से का काफी भाग बरकरार रखा है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें लखनऊ नगर निगम के 28 निर्धारित वार्ड शामिल हैं, जिनमें हजरतगंज, अमीनाबाद, कैसरबाग, ऐशबाग, लालबाग, हुसैनगंज और लखनऊ के अन्य घनी आबादी वाले केंद्रीय इलाके आते हैं. यह विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह शहरी है और इसमें कोई ग्रामीण हिस्सा नहीं है.
लखनऊ सेंट्रल ने आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया है. यहां मुस्लिम आबादी काफी बड़ी होने के बावजूद बीजेपी ने यह सीट आठ बार जीती है, जिसमें उसकी पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ की एक जीत भी शामिल है, जबकि कांग्रेस ने छह चुनावों में जीत हासिल की है. समाजवादी पार्टी ने यह सीट दो बार जीती है और उसकी दोनों जीत पिछले तीन विधानसभा चुनावों में आई हैं. भारतीय क्रांति दल और जनता पार्टी ने भी एक-एक बार यह सीट जीती है.
रविदास मेहरोत्रा ने 2012 में लखनऊ सेंट्रल से जीत हासिल कर समाजवादी पार्टी का खाता खोला और 1989 से 2007 के बीच बीजेपी की लगातार छह जीत का सिलसिला खत्म किया. मेहरोत्रा ने बीजेपी के विद्यासागर गुप्ता को 22,732 वोटों से हराया. 2017 में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी से यह सीट वापस छीन ली और ब्रजेश पाठक को अपना उम्मीदवार बनाया. ब्रजेश पाठक, जो अब उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं, ने मौजूदा विधायक रविदास मेहरोत्रा को 5,094 वोटों से हराया. 2022 में मुकाबले का यह उतार-चढ़ाव जारी रहा और समाजवादी पार्टी ने फिर सीट पर कब्जा कर लिया. रविदास मेहरोत्रा को 104,488 वोट मिले, जबकि बीजेपी के उम्मीदवार रजनीश कुमार गुप्ता को 93,553 वोट मिले. इस तरह मेहरोत्रा ने 10,935 वोटों से जीत दर्ज की.
लोकसभा स्तर पर लखनऊ संसदीय क्षेत्र में बीजेपी के दबदबे का असर पिछले करीब तीन दशकों से लखनऊ सेंट्रल में भी दिखाई देता रहा है. लखनऊ लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व 1991 से 2004 तक लगातार पांच बार अटल बिहारी वाजपेयी ने किया और 2014 से राजनाथ सिंह इस सीट से सांसद हैं. हालांकि, हाल के वर्षों में लखनऊ सेंट्रल का चुनावी रुझान कुछ अलग दिखाई दिया है. 2009 के लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी ने कांग्रेस पर 1,044 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में बीजेपी की यह बढ़त बढ़कर 19,101 वोट हो गई और 2019 में यह 43,843 वोट तक पहुंच गई, जब कांग्रेस की जगह समाजवादी पार्टी मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी बन गई.
2024 में यह तस्वीर बदल गई. राजनाथ सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ रहे रविदास मेहरोत्रा ने हाल के वर्षों में पहली बार इस विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को बढ़त दिलाई. मेहरोत्रा को 99,426 वोट मिले, जबकि सिंह को 91,842 वोट हासिल हुए. इस तरह समाजवादी पार्टी को 7,584 वोटों की बढ़त मिली. हालांकि, राजनाथ सिंह ने कुल मिलाकर बड़े अंतर से लखनऊ लोकसभा सीट पर लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की.
लखनऊ सेंट्रल में एक दशक से ज्यादा समय तक मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही. 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 331,971 थी, जो 2017 में बढ़कर 366,952 और 2019 में 369,392 हो गई. 2022 में यह संख्या 370,853 और 2024 में 375,174 तक पहुंच गई. हालांकि, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद विधानसभा क्षेत्र के मतदाता आधार में तेज गिरावट आई. अप्रैल 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 264,561 मतदाता थे. यह कमी एसआईआर से पहले के मतदाता आधार की करीब 28.88 प्रतिशत थी. यह गिरावट काफी बड़ी है, हालांकि लखनऊ जिले में यह सबसे अधिक नहीं थी और कई अन्य विधानसभा क्षेत्रों में इससे ज्यादा संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए.
बड़े शहरी विधानसभा क्षेत्रों में आमतौर पर मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहता है और लखनऊ सेंट्रल में भी यही स्थिति दिखाई देती है. 2012 में मतदान प्रतिशत 50.95 रहा और 2017 में बढ़कर 53.15 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह मामूली बढ़त के साथ 53.91 प्रतिशत और 2022 के विधानसभा चुनाव में 56.83 प्रतिशत पहुंच गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत 52.65 रहा.
लखनऊ सेंट्रल हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या भी काफी महत्वपूर्ण है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता यहां के करीब 38.70 प्रतिशत मतदाताओं के बराबर हैं, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी करीब 9.82 प्रतिशत है. अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक समूहों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, वैश्य और विभिन्न ओबीसी समुदाय शामिल हैं. यादव, कुर्मी, लोध और अन्य ओबीसी समुदाय मतदाताओं के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, जबकि पासी, जाटव और अन्य अनुसूचित जाति समूह दलित आबादी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं. मुस्लिम आबादी भी सामाजिक रूप से विविध है और लखनऊ के पुराने हिस्सों में शिया और सुन्नी दोनों समुदायों की लंबे समय से मौजूदगी रही है.
लखनऊ सेंट्रल पूरी तरह शहरी क्षेत्र है और यहां शहर के कुछ सबसे घनी आबादी वाले तथा व्यस्त कारोबारी इलाके मौजूद हैं. हजरतगंज यहां का सबसे प्रमुख आधुनिक कारोबारी केंद्र है, जहां मुख्य सड़कों और आसपास के इलाकों में दुकानें, शोरूम, रेस्तरां, होटल, कार्यालय और सरकारी प्रतिष्ठान हैं. अमीनाबाद अपने व्यस्त खुदरा बाजारों और थोक कारोबार के लिए जाना जाता है, जबकि नजीराबाद और कैसरबाग में कारोबारी, छोटे व्यवसाय और मध्यम वर्ग के ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं. ऐशबाग, हुसैनगंज, लालबाग और आसपास के इलाके विधानसभा क्षेत्र में आवासीय क्षेत्रों के साथ छोटे कारोबारी केंद्र भी जोड़ते हैं. ऐशबाग, लालबाग, गोलागंज और अमीनाबाद जैसे इलाकों में शैक्षणिक संस्थान और अन्य प्रतिष्ठान भी मौजूद हैं, जो लखनऊ के इस केंद्रीय क्षेत्र के घने संस्थागत स्वरूप को दर्शाते हैं.
यह विधानसभा क्षेत्र उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक केंद्र के भी करीब है. विधानसभा और राज्य सरकार के प्रमुख कार्यालय केंद्रीय लखनऊ क्षेत्र में और उसके आसपास स्थित हैं, जबकि राजभवन और कालिदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास भी इसी केंद्रीय क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.
लखनऊ सेंट्रल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से व्यापार, खुदरा कारोबार, सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों, होटल और आतिथ्य क्षेत्र, खानपान कारोबार, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और छोटे तथा मध्यम स्तर की व्यावसायिक गतिविधियों पर आधारित है. केंद्रीय लखनऊ की प्रसिद्ध खानपान संस्कृति भी स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां बिरयानी, कबाब, निहारी, चाट और अन्य पारंपरिक व्यंजन परोसने वाले रेस्तरां और खानपान की जगहें शहर के अलग-अलग हिस्सों से ग्राहकों को आकर्षित करती हैं. हालांकि, घनी आबादी वाले कारोबारी केंद्र के रूप में इस क्षेत्र को ट्रैफिक जाम, अतिक्रमण, पार्किंग की कमी, नागरिक सुविधाओं पर दबाव और विरासत वाले इलाकों को आधुनिक कारोबारी जरूरतों के साथ संतुलित करने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
कनेक्टिविटी लखनऊ सेंट्रल की प्रमुख खूबियों में से एक है. विधानसभा क्षेत्र शहर की कई व्यस्त सड़कों से जुड़ा है और सड़क तथा सार्वजनिक परिवहन के जरिए लखनऊ के लगभग हर प्रमुख हिस्से तक पहुंच बनाई जा सकती है. हजरतगंज, कैसरबाग और अमीनाबाद शहर के बस और साझा परिवहन नेटवर्क के महत्वपूर्ण केंद्र हैं. चारबाग और लखनऊ जंक्शन रेलवे स्टेशन भी आसानी से पहुंच में हैं, जबकि शहर का सड़क नेटवर्क इस विधानसभा क्षेत्र को एयरपोर्ट, दूसरे विधानसभा क्षेत्रों और लखनऊ के तेजी से विकसित हो रहे पूर्वी तथा दक्षिणी हिस्सों से जोड़ता है.
2009 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव तक हुए सात मुकाबलों में चार बार बीजेपी को जीत या बढ़त मिली, जबकि तीन बार समाजवादी पार्टी आगे रही. समाजवादी पार्टी के उभार ने इस विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण को बदला है, जो कभी बीजेपी की भरोसेमंद सीट माना जाता था. 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत और 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्र के भीतर बीजेपी से आगे रहने के आत्मविश्वास के साथ उतरेगी.
हालांकि, बीजेपी इस बात से राहत महसूस कर सकती है कि समाजवादी पार्टी की हाल की दोनों जीत बहुत बड़े अंतर से नहीं हुई हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बीजेपी पर वोट शेयर की बढ़त करीब 5.19 प्रतिशत अंक थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्र के भीतर उसकी बढ़त करीब 3.84 प्रतिशत रही.
बीजेपी के लिए हिंदू वोटों का एकजुट होना उस विधानसभा क्षेत्र में उसकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा, जहां मुस्लिम मतदाता अनुमान के अनुसार करीब 38.70 प्रतिशत हैं और आम तौर पर समाजवादी पार्टी की ओर झुकते रहे हैं. अगर मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी के पीछे एकजुट होते हैं तो बीजेपी के लिए अपने हिंदू समर्थन आधार को एक साथ लाना खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाएगा. बीजेपी को ऊंची जातियों के साथ-साथ ओबीसी और दलित मतदाताओं के कुछ हिस्सों में अपना समर्थन बनाए रखना होगा और गैर-मुस्लिम वोटों के समाजवादी पार्टी की ओर जाने की संभावना को सीमित करना होगा.
2026 का एसआईआर चुनावी गणित में एक और नया पहलू लेकर आया है. एसआईआर से पहले की मतदाता सूची से एक लाख से ज्यादा नाम हटने के बाद मतदाता आधार का आकार काफी बदल गया है. फिलहाल यह तय करने का कोई विश्वसनीय आधार नहीं है कि हटाए गए नामों में कौन से सामाजिक या राजनीतिक समूह कितनी संख्या में शामिल हैं या इस बदलाव का दोनों प्रमुख दलों पर क्या असर पड़ेगा.
लखनऊ सेंट्रल में 2027 का चुनाव किसी भी पार्टी के लिए आसान मुकाबला नहीं होने वाला है. समाजवादी पार्टी ने यहां बीजेपी को हराने की अपनी क्षमता दिखाई है, जबकि बीजेपी के पास सीट वापस हासिल करने के लिए मजबूत संगठन और सामाजिक आधार मौजूद है. ऐसे में मुकाबला कड़ा रहने की संभावना है. सामाजिक समर्थन को मतदान के दिन वोटों में बदलने की क्षमता, खास तौर पर बड़ी मुस्लिम आबादी और महत्वपूर्ण हिंदू बहुमत वाले इस विधानसभा क्षेत्र में, एक बार फिर यह तय कर सकती है कि कौन सा दल आगे रहता है.
(अजय झा)