लखनऊ कैंटोनमेंट उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित एक ऐतिहासिक सैन्य-सह-नागरिक क्षेत्र है. इसे मूल रूप से ब्रिटिश सैन्य स्टेशन के रूप में विकसित किया गया था और लखनऊ शहर के विस्तार के बावजूद इस क्षेत्र ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी है. लखनऊ कैंटोनमेंट बोर्ड इस क्षेत्र का प्रशासन करता है, जिसमें सैन्य
प्रतिष्ठान, नागरिक बस्तियां, बाजार, संस्थागत इमारतें और आवासीय कॉलोनियां शामिल हैं.
लखनऊ कैंटोनमेंट करीब 6,810 एकड़ क्षेत्र में फैला है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा अभी भी सैन्य इस्तेमाल में है, जबकि घनी आबादी वाला बाजार क्षेत्र बड़ी संख्या में नागरिक आबादी का घर है. यह विधानसभा क्षेत्र लखनऊ के ज्यादातर शहरी हिस्सों से अलग नजर आता है, क्योंकि यहां चौड़ी और पेड़ों से घिरी सड़कें, पुराने औपनिवेशिक दौर के बंगले, सैन्य प्रतिष्ठान और खुले स्थान घनी नागरिक बस्तियों के साथ मौजूद हैं.
1957 के चुनावों से पहले गठित लखनऊ कैंटोनमेंट एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और लखनऊ लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें लखनऊ कैंटोनमेंट, लखनऊ जनगणना नगर और लखनऊ नगर निगम के 21 निर्धारित वार्ड शामिल हैं. यह विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह शहरी है और इसमें सैन्य प्रतिष्ठान की सीमाओं से बाहर के महत्वपूर्ण नागरिक क्षेत्र भी शामिल हैं.
लखनऊ कैंटोनमेंट में अब तक 18 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2019 में हुआ उपचुनाव भी शामिल है. इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से प्रमुख राजनीतिक ताकत रही है और उसने पिछले नौ विधानसभा चुनावों में से आठ में जीत दर्ज की है. कांग्रेस ने इस सीट पर सात बार जीत हासिल की है, जिसमें ज्यादातर जीत शुरुआती दशकों में मिली थीं. एक निर्दलीय उम्मीदवार, भारतीय क्रांति दल और जनता पार्टी भी एक-एक बार इस सीट पर जीत हासिल कर चुके हैं.
1991 से 2007 के बीच भाजपा ने लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीते थे. 2012 में कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने इस सिलसिले को तोड़ दिया. उन्होंने भाजपा के मौजूदा विधायक सुरेश चंद्र तिवारी को 21,753 वोटों से हराया. तिवारी इससे पहले लगातार तीन चुनाव जीत चुके थे. हालांकि जोशी 2016 में भाजपा में शामिल हो गईं और 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर जीता. उन्होंने समाजवादी पार्टी की अपर्णा यादव को 33,796 वोटों से हराया. इस चुनाव में एक दिलचस्प पारिवारिक संबंध भी देखने को मिला, क्योंकि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा जोशी का मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव से था.
2019 में रीता बहुगुणा जोशी के भाजपा उम्मीदवार के रूप में इलाहाबाद से लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद लखनऊ कैंटोनमेंट सीट पर उसी साल उपचुनाव हुआ. यह चुनाव भाजपा के सुरेश चंद्र तिवारी ने जीता और उन्होंने लखनऊ कैंटोनमेंट से चौथी बार विधानसभा पहुंचने का रिकॉर्ड बनाया. तिवारी ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मेजर आशीष चतुर्वेदी को 35,428 वोटों से हराया. 2022 में भी भाजपा ने यह सीट बरकरार रखी. उस चुनाव में उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मंत्री और अब उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को 108,147 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह गांधी को 68,635 वोट मिले. ब्रजेश पाठक ने 39,512 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
लखनऊ कैंटोनमेंट विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का दबदबा लोकसभा चुनावों में भी दिखाई देता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों में से तीन में भाजपा इस क्षेत्र में सबसे आगे रही है. 2009 में कांग्रेस ने भाजपा पर 5,909 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा ने जोरदार वापसी करते हुए कांग्रेस के मुकाबले 51,152 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में भाजपा की समाजवादी पार्टी पर बढ़त बढ़कर 71,962 वोट हो गई. 2024 में भाजपा की बढ़त में काफी कमी आई, लेकिन इसके बावजूद वह विपक्ष से काफी आगे रही. भाजपा के राजनाथ सिंह को 106,044 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रविदास मेहरोत्रा को 68,800 वोट मिले. इस तरह भाजपा को इस विधानसभा क्षेत्र में 37,244 वोटों की बढ़त मिली.
लखनऊ कैंटोनमेंट में एक दशक से ज्यादा समय तक मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही. 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 320,755 थी, जो 2017 में बढ़कर 368,311 और 2019 में 385,341 हो गई. 2022 में यह संख्या 368,602 और 2024 में 371,569 थी. हालांकि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद इस विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में बड़ी कमी आई. 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 240,328 मतदाता थे. यह पुनरीक्षण से पहले दर्ज 365,590 मतदाताओं की तुलना में 125,262 कम है. यानी पुनरीक्षण से पहले के मतदाताओं की संख्या में करीब 34.27 प्रतिशत की कमी आई. अंतिम मतदाता सूची के बाद लखनऊ कैंटोनमेंट मतदाताओं की संख्या के लिहाज से लखनऊ जिले की नौ विधानसभा सीटों में सबसे छोटा क्षेत्र बन गया है.
मतदान प्रतिशत यहां आम तौर पर कम रहा है, जैसा कि बड़े शहरी विधानसभा क्षेत्रों में अक्सर देखने को मिलता है. 2012 में मतदान प्रतिशत 50.56 था और 2017 में मामूली बढ़कर 50.93 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह थोड़ा घटकर 50.71 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 53.74 हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां 49.44 प्रतिशत मतदान हुआ.
लखनऊ कैंटोनमेंट हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है, हालांकि उनका हिस्सा हिंदू मतदाताओं से कम है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता यहां के कुल मतदाताओं का करीब 15.50 प्रतिशत हैं. अनुसूचित जाति की आबादी करीब 12.72 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 1.71 प्रतिशत है. अन्य प्रमुख समुदायों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, वैश्य और विभिन्न ओबीसी समूह शामिल हैं. यादव, कुर्मी, लोध और अन्य ओबीसी समुदाय मतदाताओं के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. पासी, जाटव और अन्य अनुसूचित जाति समूह भी दलित आबादी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. क्षेत्र के पुराने शहरी और कारोबारी इलाकों में सिंधी और पंजाबी समुदायों की भी उल्लेखनीय मौजूदगी है.
लखनऊ कैंटोनमेंट पूरी तरह शहरी विधानसभा क्षेत्र है, लेकिन यहां सैन्य और नागरिक इलाकों के साथ-साथ मौजूद होने के कारण सामाजिक और भौतिक स्वरूप काफी मिश्रित है. कैंटोनमेंट क्षेत्र में चौड़ी सड़कें, बड़े हरे क्षेत्र, पुराने बंगले, सैन्य कार्यालय और आवासीय क्वार्टर दिखाई देते हैं. वहीं सदर बाजार, आलमबाग, चारबाग, बंगला बाजार, तेलीबाग और आसपास की कॉलोनियों में घनी नागरिक बस्तियां हैं. आलमबाग इस विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख कारोबारी और परिवहन केंद्रों में शामिल है. सदर बाजार लंबे समय से कैंटोनमेंट के सैन्य और नागरिक दोनों समुदायों की जरूरतों को पूरा करता रहा है. चारबाग और आसपास के इलाके शहर के प्रमुख रेलवे और परिवहन केंद्र के करीब हैं, जबकि दिलकुशा का क्षेत्र ऐतिहासिक और संस्थागत महत्व रखता है.
लखनऊ कैंटोनमेंट की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से शहरी और सेवा क्षेत्र पर आधारित है. रक्षा प्रतिष्ठान और सरकारी नौकरियां आज भी रोजगार के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. वहीं नागरिक आबादी के लिए व्यापार, परिवहन, खुदरा कारोबार, होटल, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और छोटे कारोबार रोजगार के प्रमुख साधन हैं. आलमबाग और उसके आसपास के इलाकों में खुदरा और कारोबारी गतिविधियां काफी ज्यादा हैं. सदर बाजार सैन्य कर्मियों के साथ-साथ आम नागरिकों की जरूरतों को भी पूरा करता है. चारबाग रेलवे स्टेशन और प्रमुख परिवहन सुविधाओं के नजदीक होने के कारण यहां होटल, रेस्तरां, दुकानें और अन्य सेवा कारोबार भी विकसित हुए हैं.
कनेक्टिविटी लखनऊ कैंटोनमेंट की प्रमुख खूबियों में शामिल है. यह विधानसभा क्षेत्र शहर के प्रमुख रेलवे और सड़क मार्गों के करीब स्थित है और लखनऊ के मध्य हिस्से के साथ-साथ दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों से भी जुड़ा हुआ है. चारबाग और लखनऊ जंक्शन रेलवे स्टेशन यहां से आसानी से पहुंच में हैं. आलमबाग एक महत्वपूर्ण सड़क और बस परिवहन केंद्र है. आलमबाग बस स्टेशन से अंतर-शहरी और क्षेत्रीय परिवहन की सुविधा मिलती है. प्रमुख सड़कें इस क्षेत्र को हजरतगंज, पुराने लखनऊ, गोमती नगर, एयरपोर्ट और दक्षिणी इलाकों से जोड़ती हैं. लखनऊ मेट्रो का नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर भी आलमबाग और आसपास के हिस्सों में सेवा देता है, जिससे मध्य और उत्तरी लखनऊ तक सीधी सार्वजनिक परिवहन सुविधा मिलती है.
लखनऊ कैंटोनमेंट का इतिहास उस दौर से जुड़ा है जब फैजाबाद से अवध की राजधानी लखनऊ स्थानांतरित होने के बाद ब्रिटिश सैन्य मौजूदगी यहां बढ़ने लगी थी. ब्रिटिश सैन्य स्टेशन शुरुआत में गोमती नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित था. नवाब सआदत अली खान के शासनकाल में 1807 में कैंटोनमेंट को शहर से करीब चार मील उत्तर में मारियाव में स्थानांतरित कर दिया गया. मारियाव कैंटोनमेंट में बैरक, अधिकारियों के बंगले, सड़कें और अन्य सुविधाओं के साथ एक बड़ा सैन्य क्षेत्र विकसित हुआ. 1857 के विद्रोह के दौरान यह लखनऊ में विद्रोह के शुरुआती प्रमुख केंद्रों में से एक बना, जब 30 मई को भारतीय सैनिकों ने विद्रोह किया. इसके बाद कैंटोनमेंट को छोड़ दिया गया और विद्रोह के दौरान इसकी कई इमारतें नष्ट हो गईं. अंग्रेजों द्वारा लखनऊ पर दोबारा नियंत्रण हासिल करने के बाद दिलकुशा पैलेस के आसपास सैनिकों की तैनाती की गई और एक नया कैंटोनमेंट विकसित हुआ, जो मोटे तौर पर आज के लखनऊ कैंटोनमेंट क्षेत्र के अनुरूप है.
पिछले पांच प्रमुख चुनावों में, जो 2014 के बाद हुए हैं, लखनऊ कैंटोनमेंट में भाजपा का प्रदर्शन लगातार मजबूत रहा है. इस अवधि में पार्टी ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीते हैं और तीन लोकसभा चुनावों में इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे आगे रही है. समाजवादी पार्टी भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरी है, लेकिन इन पांच मुकाबलों में वह न तो सीट जीत सकी और न ही इस क्षेत्र में सबसे आगे रही. भाजपा को मिले जीत के बड़े अंतर ने भी उसकी स्थिति को मजबूत दिखाया है.
2027 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ कैंटोनमेंट को अपने लिए प्रतिस्पर्धी बनाने की समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती आसान नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव में 2019 के मुकाबले भाजपा की बढ़त जरूर कम हुई, लेकिन इसके बावजूद पार्टी इस विधानसभा क्षेत्र में विपक्ष से काफी आगे रही.
2026 के SIR ने चुनावी गणित में एक नया बदलाव जोड़ा है. जिन मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी थी, जो स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके थे या जिनका पता नहीं चल सका, उनके नाम हटाए जाने के बाद मतदाता सूची का आकार पुनरीक्षण से पहले की तुलना में एक-तिहाई से अधिक कम हो गया है. अगर पहले से मतदाता सूची में शामिल लेकिन मतदान नहीं करने वाले नामों की बड़ी संख्या हट गई है, तो साफ-सुथरी मतदाता सूची के बाद दर्ज मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी हो सकती है.
लखनऊ कैंटोनमेंट अब भी राजधानी की भाजपा की सबसे सुरक्षित विधानसभा सीटों में से एक है. जब तक कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव नहीं होता या भाजपा के पारंपरिक सामाजिक आधार में उल्लेखनीय कमी नहीं आती, तब तक समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे प्रभाव को तोड़ना आसान नहीं होगा.
(अजय झा)