लहरपुर उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित एक तहसील स्तरीय शहर और लहरपुर तहसील का मुख्यालय है. माना जाता है कि इस शहर की स्थापना 14वीं शताब्दी में सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने की थी. लंबे समय से यह स्थानीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में काम करता रहा है. आज यह आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए प्रशासनिक और व्यावसायिक केंद्र है और पारंपरिक
बुनाई के लिए भी जाना जाता है, जिसे स्थानीय कारीगरों की पीढ़ियां करती आ रही हैं.
1956 के परिसीमन आदेश के तहत लहरपुर विधानसभा क्षेत्र का गठन किया गया था. यह एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और सीतापुर लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसकी सीमाओं में अब पूरा लहरपुर नगर पालिका बोर्ड और तंबौर-अहमदाबाद नगर पंचायत शामिल हैं. इसके अलावा लहरपुर, तंबौर, परसेंडी और मरसंडा कानूनगो सर्किल के अंतर्गत आने वाले बड़ी संख्या में गांव भी इस क्षेत्र का हिस्सा हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप काफी हद तक ग्रामीण है.
लहरपुर ने 1957 में पहली बार चुनाव होने के बाद से 17 विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया है. यह क्षेत्र अलग-अलग जनादेश देने और सभी राजनीतिक दलों को चौंकाते रहने के लिए जाना जाता है. यहां किसी एक पार्टी को सुरक्षित सीट मानकर चलने का मौका नहीं मिला है. कुल मिलाकर भाजपा ने, अपनी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की दो जीतों को शामिल करने पर, यह सीट पांच बार जीती है. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने तीन-तीन बार जीत दर्ज की है, जबकि कांग्रेस पार्टी ने दो बार यह सीट जीती है. जनता पार्टी, जनता पार्टी सेक्युलर और लोक दल ने एक-एक बार जीत हासिल की है. एक बार निर्दलीय उम्मीदवार भी यहां से जीता है. क्षेत्र की मिश्रित सामाजिक संरचना को देखते हुए यहां हिंदू और मुस्लिम उम्मीदवारों ने भी महत्वपूर्ण संख्या में जीत दर्ज की है. हिंदू उम्मीदवारों ने 10 बार और मुस्लिम उम्मीदवारों ने सात बार जीत हासिल की है.
2012 में मोहम्मद जसमीर अंसारी ने पिछला चुनाव जीतने के बाद सीट बरकरार रखी. उन्होंने कांग्रेस पार्टी के अनिल कुमार वर्मा को 17,672 वोटों से हराया. समाजवादी पार्टी तीसरे स्थान पर रही, जबकि भाजपा को केवल 6.24 प्रतिशत वोट मिलने के कारण जमानत गंवानी पड़ी.
अगले पांच वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. 2017 में भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलकर यह सीट जीतने में सफल रही. उसके उम्मीदवार सुनील वर्मा ने मौजूदा बसपा विधायक मोहम्मद जसमीर अंसारी को 9,118 वोटों से हराया.
लहरपुर की स्विंग सीट वाली पहचान 2022 में फिर सामने आई, जब समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अनिल कुमार वर्मा ने, जो कांग्रेस पार्टी से समाजवादी पार्टी में आए थे, मौजूदा भाजपा विधायक को हरा दिया. वर्मा को 112,987 वोट मिले, जबकि सुनील वर्मा को 99,832 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने 13,155 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
लहरपुर में चुनावी मुकाबले का पेंडुलम एक तरफ से दूसरी तरफ जाने का सिलसिला लोकसभा चुनावों में भी दिखाई देता है. 2009 में बहुजन समाज पार्टी ने समाजवादी पार्टी पर 17,810 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा पर उसकी बढ़त घटकर 6,321 वोट रह गई. 2019 में स्थिति बदल गई और भाजपा ने बसपा पर 16,305 वोटों की बढ़त हासिल की. 2024 में समाजवादी पार्टी के समर्थन से विपक्षी गठबंधन के तहत कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के खिलाफ निर्णायक बढ़त बनाई. कांग्रेस उम्मीदवार राकेश राठौर को 111,261 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार राजेश वर्मा को 86,813 वोट मिले. इस तरह कांग्रेस पार्टी ने इस विधानसभा क्षेत्र में 24,448 वोटों की बढ़त हासिल की.
लहरपुर में पिछले कुछ वर्षों में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 294,892 से बढ़कर 2017 में 339,731, 2019 में 349,972, 2022 में 354,565 और 2024 में 362,080 हो गई. मतदान प्रतिशत ऊंचा रहा है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2012 में मतदान 65.73 प्रतिशत रहा और 2017 में बढ़कर 67.57 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 62.65 प्रतिशत रह गया, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 67.75 प्रतिशत हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 62.73 प्रतिशत रहा.
लहरपुर में मतदाताओं की आबादी मुख्य रूप से ग्रामीण है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता 32.30 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी 28.98 प्रतिशत है. बाकी मतदाताओं में विभिन्न ओबीसी और सवर्ण समुदाय शामिल हैं, जिनमें यादव, कुर्मी, लोध, पासी, ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य समूह शामिल हैं. मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या, अनुसूचित जाति की पर्याप्त मौजूदगी और व्यापक ओबीसी आधार इस विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक रूप से विविध चुनावी तस्वीर बनाते हैं. कुल आबादी में 82.57 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि 17.43 प्रतिशत आबादी विधानसभा क्षेत्र के शहरी इलाकों में रहती है.
स्थानीय परंपरा के अनुसार, इस शहर की स्थापना करीब 1370 में फिरोज शाह तुगलक ने बहरेच में सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह की यात्रा के दौरान की थी. शुरुआत में इसे तुगलकपुर के नाम से जाना जाता था. बाद में इसका नाम एक पासी सरदार के नाम पर रखा गया, जिसने कुछ समय के लिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखा था. मुगल शासन के दौरान लहरपुर का महत्व और बढ़ा, जब राजा टोडर मल ने एक बड़े परगने का पुनर्गठन किया और शहर को उसका मुख्यालय बनाया. इसके बाद यह क्षेत्र स्थानीय राजपूत प्रभाव के विभिन्न दौरों से गुजरा और 19वीं शताब्दी के मध्य में ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आ गया. धीरे-धीरे लहरपुर उस प्रशासनिक और व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जो आज भी बना हुआ है.
लहरपुर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है और आसपास के स्टेशनों के जरिए व्यापक रेलवे नेटवर्क तक इसकी पहुंच है. यह सीतापुर से करीब 65 किलोमीटर, लखनऊ से 100 किलोमीटर, हरदोई से 70 किलोमीटर, लखीमपुर खीरी से 115 किलोमीटर, शाहजहांपुर से 155 किलोमीटर, कानपुर से करीब 175 किलोमीटर और नई दिल्ली से लगभग 430 किलोमीटर दूर है. सीतापुर को जिले के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों से जोड़ने वाले सड़क नेटवर्क पर इसकी स्थिति इसे स्थानीय बाजार और प्रशासनिक केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण बनाती है.
लहरपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि कोई भी राजनीतिक दल इस विधानसभा क्षेत्र को हल्के में नहीं ले सकता. भाजपा ने दिखाया है कि वह कमजोर स्थिति से तेजी से जीत की स्थिति में आ सकती है, जैसा उसने 2017 में किया था. वहीं समाजवादी पार्टी ने 2022 में साबित किया कि भाजपा की जीत के दो साल बाद भी सीट का समीकरण बदल सकता है. 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस तस्वीर में एक और पहलू जोड़ दिया, जब 2022 में समाजवादी पार्टी के विधानसभा सीट जीतने के दो साल बाद कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में भाजपा पर बड़ी बढ़त हासिल की.
भाजपा के सामने चुनौती लोकसभा चुनाव में खोई जमीन वापस हासिल करने और विधानसभा स्तर के समर्थन को एक और जीत में बदलने की होगी. वहीं समाजवादी पार्टी को 2022 की विधानसभा जीत और 2024 में विपक्षी गठबंधन के मजबूत प्रदर्शन से भरोसा मिलेगा. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की बढ़त का मतलब यह भी है कि विपक्ष के समर्थन आधार को किसी एक पार्टी के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. हाल के चुनावों में तीन प्रमुख राजनीतिक ताकतों के अपनी चुनावी क्षमता दिखाने के साथ लहरपुर 2027 के विधानसभा चुनाव में भी सबसे ज्यादा नजर रखी जाने वाली और कड़ी प्रतिस्पर्धा वाली सीटों में से एक रहने की संभावना है.
(अजय झा)