कुंडा उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में प्रतापगढ़ जिले का एक कस्बा और तहसील मुख्यालय है, जो प्रयागराज-लखनऊ राजमार्ग पर स्थित है. यह कस्बा मुख्य रूप से रघुराज प्रताप सिंह, जिन्हें राजा भैया के नाम से जाना जाता है, के राजनीतिक गढ़ के रूप में प्रसिद्ध है. उनकी दबंग राजनीति और डराने-धमकाने के आरोपों ने दशकों से यहां की स्थानीय राजनीति को प्रभावित
किया है. कुंडा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रमुख प्रशासनिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में कार्य करता है.
कुंडा एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है, जो 1952 के पहले आम चुनाव से अस्तित्व में है. यह कौशांबी लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन आदेश के बाद कुंडा विधानसभा क्षेत्र में मानिकपुर, कुंडा और बिहार के कानूनगो सर्किल के साथ मानिकपुर और कुंडा नगर पंचायतें शामिल हैं. यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र है, जिसमें शहरी आबादी का हिस्सा छोटा है.
उत्तर प्रदेश में अब तक हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में कुंडा विधानसभा क्षेत्र शामिल रहा है. 1952 और 1957 के चुनावों में यह दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था, जबकि 1962 में यह एक सदस्यीय सीट बन गया. 1993 में राजा भैया के चुनावी मैदान में उतरने से पहले इस सीट पर कांग्रेस, निर्दलीय और अन्य दलों के उम्मीदवारों के बीच बदलाव होता रहा. इसके बाद से उन्होंने लगातार सात चुनाव जीते हैं. इनमें छह जीत निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में और 2022 की जीत जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के टिकट पर मिली, जिसकी स्थापना उन्होंने नवंबर 2018 में की थी.
2012 में राजा भैया ने बहुजन समाज पार्टी के शिव प्रकाश मिश्रा को 88,255 वोटों से हराकर लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की. 2017 में उन्होंने भाजपा के जानकी शरण के खिलाफ 103,647 वोटों के और बड़े अंतर से सीट बरकरार रखी. 2022 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए उन्हें 99,612 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के गुलशन यादव को 69,297 वोट मिले. इस तरह उन्होंने 30,315 वोटों से जीत हासिल की. उल्लेखनीय है कि 2022 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक ने उत्तर प्रदेश में दो सीटें जीती थीं. कुंडा के अलावा पड़ोसी बाबागंज दूसरी सीट थी, जहां इस नवगठित जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) को जीत मिली.
लोकसभा चुनावों के दौरान कुंडा विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन मजबूत रहा है. पिछले चार संसदीय चुनावों में से तीन में पार्टी ने यहां बढ़त हासिल की. 2009 में उसने बहुजन समाज पार्टी पर 37,521 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा पर उसकी बढ़त बढ़कर 45,828 वोट हो गई. 2019 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक सबसे आगे रहा और उसने समाजवादी पार्टी पर 37,349 वोटों की बढ़त हासिल की. जनसत्ता दल लोकतांत्रिक ने 2024 के लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया, जिससे समाजवादी पार्टी को फिर से बढ़त हासिल करने का अवसर मिला. कौशांबी लोकसभा सीट से उसके उम्मीदवार पुष्पेंद्र सरोज को 101,742 वोट मिले, जबकि भाजपा के विनोद कुमार सोनकर को 65,555 वोट मिले. इस तरह विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को 36,187 वोटों की बढ़त मिली.
कुंडा में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 315,457 से बढ़कर 2017 में 342,877 और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 348,991 हो गई. 2022 में यह संख्या 358,709 थी, जबकि 2024 में बढ़कर 366,721 हो गई. विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में कथित तौर पर 312,461 मतदाता दर्ज थे. यह 2024 के आंकड़े से 54,260 कम है, यानी लगभग 14.8 प्रतिशत की कमी आई है.
अलग-अलग चुनावों में मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2012 में मतदान प्रतिशत 52.14 रहा, जबकि 2017 में यह बढ़कर 58.64 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 54.75 प्रतिशत रह गया, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 55.08 प्रतिशत हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत और घटकर 49.35 रह गया.
कुंडा हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 13.10 प्रतिशत होने का अनुमान है. अनुसूचित जाति की आबादी करीब 26.3 प्रतिशत है. अन्य प्रमुख समुदायों में यादव, ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी और वैश्य शामिल हैं. इनके अलावा मौर्य, पाल, निषाद और प्रजापति जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग के समुदाय भी यहां रहते हैं. 2011 की जनगणना पर आधारित विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार, 91.38 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 8.62 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती थी. शहरी आबादी में मुख्य रूप से कुंडा और मानिकपुर कस्बे शामिल हैं.
कुंडा नाम की उत्पत्ति को लेकर कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसका संबंध संस्कृत के शब्द कुंड से हो सकता है, जिसका अर्थ किसी जलाशय या जल संग्रह करने वाले स्थान से है. कुछ अन्य कहानियों में इसका संबंध नील या घी रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले पुराने पात्र से जोड़ा जाता है. यह कस्बा धीरे-धीरे तहसील मुख्यालय और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जबकि इसके आसपास के क्षेत्र का इतिहास काफी पुराना है. कुंडा तहसील के सराय नाहर राय में पुरातात्विक खोजों के दौरान प्रागैतिहासिक मानव अवशेष और पत्थर के औजार मिले हैं. सई नदी के बाएं किनारे पर स्थित कोट नाम का खंडहर बौद्ध स्तूप भी इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास का एक प्रमाण है.
कुंडा गंगा बेसिन के उपजाऊ जलोढ़ मैदानों में स्थित है, जहां कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है. प्रतापगढ़ के व्यापक क्षेत्र में गेहूं, धान, दलहन और तिलहन प्रमुख फसलों में शामिल हैं. कुंडा अपने आम के बागों के लिए भी जाना जाता है और यह जिले के फल उत्पादन वाले क्षेत्र का हिस्सा है. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था होने के बावजूद यहां कोई बड़ी औद्योगिक इकाई नहीं है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सीमित हैं. इसके कारण कई युवाओं को काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर जाना पड़ता है. व्यवस्थित फल मंडी का अभाव आम उत्पादकों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए पर्याप्त स्थानीय सुविधाएं नहीं मिलती हैं.
कुंडा प्रयागराज-लखनऊ राजमार्ग पर स्थित है और सड़क मार्ग से आसपास के कस्बों तथा बाजार केंद्रों से जुड़ा हुआ है. कुंडा हरनामगंज रेलवे स्टेशन कस्बे के भीतर स्थित है. सड़क मार्ग से प्रयागराज लगभग 54 किलोमीटर दूर है, जबकि लखनऊ की दूरी करीब 148 किलोमीटर और जिला मुख्यालय प्रतापगढ़ की दूरी लगभग 50 से 55 किलोमीटर है.
चुनावों में अप्रत्याशित परिणाम सामने आ सकते हैं, लेकिन 2027 में राजा भैया का लगातार आठवीं बार जीत हासिल करने में नाकाम रहना एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर होगा. हालांकि, पिछले तीन विधानसभा चुनावों में अलग-अलग उम्मीदवारों के दूसरे स्थान पर रहने से संकेत मिलता है कि कुंडा के मतदाताओं ने अभी तक किसी एक विकल्प को अपना स्थायी विकल्प नहीं माना है. 2022 में समाजवादी पार्टी ने राजा भैया की जीत का अंतर काफी कम कर दिया था, हालांकि वह तब भी 15.39 प्रतिशत अंकों से पीछे रही. 2024 के लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र में मिली मजबूत बढ़त से समाजवादी पार्टी को अपनी कोशिशें जारी रखने का आधार मिलेगा, लेकिन संसदीय चुनावों में मिली बढ़त अभी तक विधानसभा चुनाव में जीत में नहीं बदल पाई है.
एसआईआर के बाद मतदाताओं की संख्या में कथित तौर पर 54,260 की कमी आने से अनिश्चितता का एक और पहलू जुड़ गया है. इसका राजनीतिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि किन समुदायों या क्षेत्रों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ा है. अब मुख्य सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी उस विधानसभा क्षेत्र में अपनी संसदीय ताकत को विधानसभा चुनाव में जीत में बदल पाएगी, जहां वह आज तक कभी नहीं जीती है, या फिर राजा भैया का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक दबदबा आगे भी कायम रहेगा.
(अजय झा)