कायमगंज उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले का एक उपमंडलीय नगर और नगर पालिका परिषद है, जो कायमगंज तहसील के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है. यह क्षेत्र तंबाकू की खेती और उसके प्रसंस्करण के लिए जाना जाता है, जो स्थानीय लोगो के लिए आर्थिक अवसर के साथ साथ चिंता का विषय भी है. मूल रूप से कायमगंज को कायमगंज के नाम से जाना जाता था. गंगा नदी के करीब
स्थित यह नगर आसपास के अनेक गांवो वाले मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र के प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में कार्य करता है.
कायमगंज उन विधानसभा क्षेत्रो में शामिल था, जिनका गठन स्वतंत्र भारत में 1951-52 में हुए पहले चुनावो के लिए किया गया था. उस समय इसे कायमगंज पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के नाम से जाना जाता था, जबकि वर्तमान क्षेत्र के कुछ हिस्से फर्रूखाबाद सेंट्रल-कम-कायमगंज ईस्ट विधानसभा क्षेत्र में भी आते थे. वर्ष 2008 के परिसीमन तक यह सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र रहा. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव से इसे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया. कायमगंज फर्रूखाबाद लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रो में से एक है. इसमें कायमगंज नगर पालिका परिषद, शमसाबाद और कंपिल नगर पंचायत तथा शमसाबाद, कंपिल, नवाबगंज और गिर्द कायमगंज के कानूनगो सर्किल शामिल हैं. इस वजह से इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
कायमगंज में अब तक उत्तर प्रदेश के सभी 18 विधानसभा चुनावो में मतदान हुआ है. यहां अलग अलग राजनीतिक दलो के पक्ष में मतदान का रुझान देखने को मिला है और किसी एक दल का लंबे समय तक प्रभाव नहीं रहा है. कांग्रेस ने यहां सबसे अधिक चार चुनाव जीते हैं. इसके बाद निर्दलीय उम्मीदवारो तथा भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ ने तीन तीन बार जीत दर्ज की है. जनसंघ ने 1967 में चुनाव जीता था, जबकि भाजपा ने 1996 और 2017 में जीत दर्ज की. समाजवादी पार्टी ने दो बार यह सीट जीती है. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, जनता पार्टी सेक्युलर, जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और अपना दल सोनेलाल ने एक एक बार यह सीट जीती है. वर्ष 2002 से हुए पिछले पांच चुनावो में पांच अलग अलग दलो ने जीत दर्ज की है.
वर्ष 2002 में पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी. वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी के कुलदीप सिंह गंगवार विजयी हुए. वर्ष 2012 से इस विधानसभा क्षेत्र में केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन दल बदलता चुनावी रुझान बना रहा.
वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी के अजीत कुमार ने भाजपा के अमर सिंह को 21,838 मतो से हराकर जीत दर्ज की. वर्ष 2017 में परिणाम बदल गया और अमर सिंह ने भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की. उन्होंने समाजवादी पार्टी की डॉ. सुरभि को 36,525 मतो से हराया. वर्ष 2022 में गठबंधन व्यवस्था के तहत भाजपा ने इस सीट पर चुनाव नहीं लड़ा और यह सीट उसके क्षेत्रीय सहयोगी अपना दल सोनेलाल को मिली. पार्टी ने समाजवादी पार्टी से अपना दल सोनेलाल में शामिल हुई डॉ. सुरभि को उम्मीदवार बनाया. उन्हें 1,14,952 मत मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सर्वेश अंबेडकर को 96,409 मत मिले. डॉ. सुरभि ने 18,543 मतो से चुनाव जीता.
लोकसभा चुनावो में भी कायमगंज क्षेत्र में भाजपा की स्थिति मजबूत रही. वर्ष 2009 से 2019 के बीच हुए चार लोकसभा चुनावो में भाजपा तीन बार यहां आगे रही. वर्ष 2009 में भाजपा ने कांग्रेस पर 1,336 मतो की बढ़त बनाई. वर्ष 2014 में समाजवादी पार्टी पर यह बढ़त बढ़कर 38,187 मत हो गई और वर्ष 2019 में बहुजन समाज पार्टी के मुकाबले बढ़त 42,247 मत रही. हालांकि वर्ष 2024 में समाजवादी पार्टी ने भाजपा को पीछे छोड़ दिया. समाजवादी पार्टी के फर्रूखाबाद लोकसभा उम्मीदवार नवल किशोर शाक्य को इस विधानसभा क्षेत्र में 1,17,867 मत मिले, जबकि भाजपा के उम्मीदवार मुकेश राजपूत को 1,06,571 मत मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी को 11,296 मतो की बढ़त मिली.
कायमगंज में पंजीकृत मतदाताओ की संख्या पिछले वर्षो में लगातार बढ़ी. वर्ष 2012 में यह संख्या 3,32,545 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,81,567 और 2019 के लोकसभा चुनाव में 3,89,211 हो गई. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओ की संख्या 3,93,084 थी. वर्ष 2024 में इसमें मामूली कमी आई और यह 3,89,618 रह गई. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में यह संख्या 3,45,753 रही. यह 2024 की संख्या से 43,865 कम है और इसमें 11.26 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई. फर्रूखाबाद जिला प्रशासन ने 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद कायमगंज विधानसभा क्षेत्र के लिए अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की है.
कायमगंज में मतदान प्रतिशत पिछले कई वर्षो से अपेक्षाकृत स्थिर रहा है. वर्ष 2012 में मतदान प्रतिशत 58.79 प्रतिशत था. वर्ष 2017 में यह बढ़कर 61.25 प्रतिशत हुआ. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में यह मामूली रूप से घटकर 60.16 प्रतिशत रहा. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत 61.52 प्रतिशत और वर्ष 2024 में 61.81 प्रतिशत दर्ज किया गया.
कायमगंज विधानसभा क्षेत्र में हिंदू आबादी बहुसंख्यक है और मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. 2011 की जनगणना के अनुसार कायमगंज उपजिले में मुस्लिम आबादी करीब 15.90 प्रतिशत और अनुसूचित जाति की आबादी 19.38 प्रतिशत थी. अन्य प्रमुख सामाजिक समूहों में कुर्मी, यादव, लोधी और शाक्य प्रमुख अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय हैं. ठाकुर, ब्राह्मण और वैश्य भी यहां के प्रमुख सवर्ण समुदायों में शामिल हैं.
कायमगंज विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है. इसकी करीब 86.52 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाको में रहती है, जबकि 13.48 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है. शहरी आबादी मुख्य रूप से कायमगंज, शमसाबाद और कंपिल में केंद्रित है.
कायमगंज नगर प्राचीन स्थल कंपिल से करीब 10 किलोमीटर दूर है. कंपिल की पहचान प्राचीन काल के पांचाल राज्य की राजधानी कांपिल्य से की जाती है. इसका संबंध महाभारत और राजा द्रुपद से जोड़ा जाता है. फर्रूखाबाद जिला प्रशासन के अनुसार कंपिल का ऐतिहासिक संबंध दक्षिण पांचाल की राजधानी से रहा है.
आधुनिक कायमगंज की स्थापना नवाब मोहम्मद खान बंगश ने की थी. उन्होंने अपने पुत्र कायम खान के नाम पर इस नगर का नाम कायमगंज रखा. फर्रूखाबाद जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार मोहम्मद खान का जन्म कायमगंज के निकट मौ-रशीदाबाद में हुआ था और बाद में उन्हें नवाब की उपाधि मिली. उन्होंने कायमगंज और मोहम्मदाबाद नगर बसाए.
कायमगंज गंगा के उपजाऊ मैदानी क्षेत्र में विकसित हुआ और बंगश नवाबो के समय यह एक महत्वपूर्ण पठान बस्ती के रूप में रहा. बाद में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया. आसपास का इलाका लंबे समय से तंबाकू की खेती के लिए जाना जाता है. कायमगंज भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की जन्मस्थली भी है.
स्थानीय अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है. कायमगंज क्षेत्र की प्रमुख व्यावसायिक फसलो में तंबाकू शामिल है. क्षेत्र की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और गंगा के निकटता ने सब्जियो तथा अन्य नकदी फसलो की खेती को भी बढ़ावा दिया है. तंबाकू प्रसंस्करण ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाई है, हालांकि चबाने वाले तंबाकू से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी सवालो के कारण यह उद्योग चिंता का विषय भी रहा है. क्षेत्र में एक चीनी मिल और छोटे कृषि आधारित उद्योग भी आर्थिक गतिविधियो में योगदान देते हैं. गंगा और उससे जुड़े सिंचाई संसाधन कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं. ऐतिहासिक अभिलेखो में भी कायमगंज तहसील के गंगा के किनारे स्थित होने और तंबाकू सहित विभिन्न फसलो की खेती का उल्लेख मिलता है.
कायमगंज की आसपास के नगरो से सड़क और रेल कनेक्टिविटी है. कायमगंज रेलवे स्टेशन उस रेल मार्ग पर स्थित है जो नगर को फर्रूखाबाद और कासगंज से जोड़ता है. यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण परिवहन साधन है. कायमगंज फर्रूखाबाद से करीब 35 से 40 किलोमीटर, मैनपुरी से करीब 50 किलोमीटर और एटा से लगभग 70 किलोमीटर दूर है. कन्नौज की दूरी करीब 90 किलोमीटर है, जबकि आगरा सड़क मार्ग से करीब 150 किलोमीटर दूर है. लखनऊ की दूरी भी सड़क मार्ग से लगभग 150 किलोमीटर है.
कायमगंज में राजनीतिक बदलाव का सिलसिला पिछले कुछ वर्षो में कुछ हद तक स्थिर होता दिखाई दिया था. भाजपा ने लगातार तीन लोकसभा चुनावो में इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाई और 2017 का विधानसभा चुनाव भी जीता. गठबंधन व्यवस्था के कारण 2022 में भाजपा के क्षेत्रीय सहयोगी अपना दल सोनेलाल ने यहां चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में स्थिति बदली, जब समाजवादी पार्टी ने इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा पर 4.70 प्रतिशत अंक की बढ़त बनाई. इससे क्षेत्र की हाल की राजनीतिक तस्वीर में बदलाव आया है. समाजवादी पार्टी के सामने लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त को विधानसभा चुनाव में बनाए रखने की चुनौती होगी. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाताओ की संख्या में हुई उल्लेखनीय कमी ने 2027 के चुनाव के लिए मतदाता आधार को भी बदल दिया है. भाजपा और अपना दल सोनेलाल के पक्ष में यह तथ्य है कि दोनों ने पिछले दो विधानसभा चुनावो में सीट पर जीत दर्ज की है. समाजवादी पार्टी 2012 की अपनी जीत और 2024 के लोकसभा चुनाव में कायमगंज विधानसभा क्षेत्र में मिली बढ़त का उल्लेख कर सकती है. सीट के आरक्षण और गठबंधन व्यवस्था का असर उम्मीदवारो के चयन पर भी पड़ सकता है.
वर्ष 2027 में कायमगंज विधानसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का कौन सा घटक चुनाव लड़ेगा, यह गठबंधन के निर्णय पर निर्भर करेगा. भाजपा और अपना दल सोनेलाल के पिछले विधानसभा प्रदर्शन तथा समाजवादी पार्टी के हाल के लोकसभा प्रदर्शन के कारण कायमगंज में अगले विधानसभा चुनाव को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
(अजय झा)