झांसी उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में झांसी जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है और दिल्ली-मुंबई तथा दिल्ली-चेन्नई रेल मार्गों पर एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है. यह शहर रानी लक्ष्मीबाई के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जो 1857 के विद्रोह के दौरान ब्रिटिश सेना के खिलाफ प्रतिरोध का नेतृत्व करने वाली महान रानी थीं. यहां एक महत्वपूर्ण छावनी भी है और यह
दक्षिणी उत्तर प्रदेश में एक प्रमुख वाणिज्यिक, शैक्षिक, चिकित्सा और सैन्य केंद्र के रूप में कार्य करता है.
झांसी के नाम पर सामान्य, अनारक्षित झांसी नगर विधानसभा क्षेत्र का नाम रखा गया है, जो स्वतंत्र भारत में 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव के बाद से अस्तित्व में है. यह झांसी लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के तहत झांसी नगर में झांसी नगर पालिका बोर्ड और झांसी तहसील के बाहरी विकसित क्षेत्र शामिल हैं. यह पूरी तरह शहरी विधानसभा क्षेत्र है, जिसमें शहर का पूरा नगरपालिका क्षेत्र आता है.
झांसी नगर में अब तक 20 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2004 और 2009 के उपचुनाव भी शामिल हैं. यहां की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा का दबदबा रहा है. कांग्रेस ने यह सीट सात बार और भाजपा ने आठ बार जीती है. बहुजन समाज पार्टी ने दो बार जीत हासिल की है, जबकि एक निर्दलीय उम्मीदवार, भारतीय क्रांति दल और जनता पार्टी ने एक-एक बार इस सीट पर कब्जा किया है.
2012 में भाजपा ने चार विधानसभा चुनावों के अंतराल के बाद झांसी नगर सीट पर फिर से कब्जा किया. भाजपा के रवि शर्मा ने बसपा के सीताराम कुशवाहा को 8,080 वोटों से हराया. 2009 के उपचुनाव में बसपा ने यह सीट जीत ली थी, क्योंकि तत्कालीन कांग्रेस विधायक प्रदीप जैन आदित्य लोकसभा के लिए निर्वाचित हो गए थे. बसपा ने 2012 में अपने मौजूदा विधायक कैलाश साहू का टिकट काट दिया, लेकिन वह इस सीट को बरकरार रखने में नाकाम रही.
2017 में भी भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा. शर्मा ने बसपा के टिकट पर फिर से चुनाव लड़ने वाले कुशवाहा को 55,778 वोटों के बड़े अंतर से हराया. 2022 में कुशवाहा समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए, लेकिन शर्मा को लगातार तीसरी जीत हासिल करने से नहीं रोक सके. शर्मा को 148,262 वोट मिले, जबकि कुशवाहा को 71,909 वोट मिले. इस तरह शर्मा ने 76,353 वोटों से जीत दर्ज की.
झांसी नगर में भाजपा का दबदबा लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिला है. 2009 में भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी, जबकि कांग्रेस ने बसपा पर 340 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा ने बढ़त हासिल की, जब मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने झांसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. इसके बाद से भाजपा ने हर संसदीय चुनाव में इस क्षेत्र में अच्छी बढ़त बनाए रखी है. 2014 में समाजवादी पार्टी पर उसकी बढ़त 87,333 वोट थी, जबकि 2019 में यह 84,469 वोट रही. 2024 में भी भाजपा आगे रही, हालांकि उसकी जीत का अंतर काफी कम हो गया. भाजपा के अनुराग शर्मा को 135,202 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार प्रदीप जैन आदित्य को 103,987 वोट मिले. इस तरह झांसी नगर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को 31,215 वोटों की बढ़त मिली. कांग्रेस के साथ गठबंधन के तहत समाजवादी पार्टी ने झांसी लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा, जबकि बसपा ने अपना उम्मीदवार उतारा, लेकिन वह काफी पीछे तीसरे स्थान पर रही.
झांसी नगर में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 374,928 से बढ़कर 2017 में 398,008 और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 405,984 हो गई. 2022 में यह संख्या 422,544 और 2024 में 441,492 थी. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 413,724 मतदाता दर्ज किए गए. यह 2024 के आंकड़े से 27,768 कम है, यानी इसमें 6.29 प्रतिशत की कमी आई है.
यहां मतदान प्रतिशत मध्यम रहा है, हालांकि अलग-अलग चुनावों में इसमें कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2012 में मतदान प्रतिशत 57.03 रहा, जो 2017 में बढ़कर 60.87 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 59.08 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत मामूली रूप से बढ़कर 59.95 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 55.86 प्रतिशत रह गया.
झांसी नगर हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी भी काफी संख्या में है. मुस्लिम आबादी का अनुमान लगभग 16.10 प्रतिशत है. अनुसूचित जाति की आबादी कुल जनसंख्या का अनुमानित 22.75 प्रतिशत है. शहर की सामाजिक संरचना में ब्राह्मण, कुशवाहा, यादव, कुर्मी, लोध, साहू और अन्य व्यापारी समुदाय शामिल हैं. इसके अलावा अहिरवार, कोरी और जाटव जैसे दलित समुदाय भी यहां रहते हैं. जैन, सिख और ईसाई समुदाय भी शहर की विविध आबादी का हिस्सा हैं. चूंकि यह विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह शहरी है, इसलिए यहां के मतदान व्यवहार पर जाति और समुदाय के साथ-साथ व्यावसायिक हितों, सरकारी नौकरियों, शिक्षा, नागरिक सुविधाओं और शहर के अलग-अलग मोहल्लों में रहने वाले लोगों की समस्याओं का भी प्रभाव पड़ता है.
झांसी का इतिहास कई सदियों पुराना है. ओरछा के बुंदेला शासक वीर सिंह देव के शासनकाल में यह शहर प्रमुखता से उभरा. उन्होंने 1613 में बंगरा पहाड़ी पर झांसी किले का निर्माण कराया था. बाद में आसपास का क्षेत्र मराठों के नियंत्रण में आ गया और नेवलकर राजवंश के शासनकाल में झांसी रियासत की राजधानी बना. 19वीं सदी के मध्य में राजा गंगाधर राव यहां के शासक थे. शाही दंपति के नवजात पुत्र की मृत्यु के बाद उन्होंने दामोदर राव नाम के एक बालक को गोद लिया. 1853 में गंगाधर राव की मृत्यु के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोद लिए गए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और हड़प नीति के तहत झांसी को अपने कब्जे में ले लिया.
वाराणसी में जन्मी रानी लक्ष्मीबाई, जिनका बचपन का नाम मणिकर्णिका तांबे था, ने अंग्रेजों के इस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. 1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने झांसी का नेतृत्व संभाला, शहर की रक्षा के लिए व्यवस्था की और सेना तैयार की. मार्च और अप्रैल 1858 में ब्रिटिश सेना ने झांसी की घेराबंदी की और भीषण संघर्ष के बाद ह्यू रोज के नेतृत्व वाली सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया. रानी वहां से निकलने में सफल रहीं और तात्या टोपे के साथ मिलकर संघर्ष जारी रखा. जून 1858 में ग्वालियर के पास एक युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हो गईं और वीरगति को प्राप्त हुईं. इसके बाद झांसी का विकास ब्रिटिश प्रशासन के अधीन हुआ. रेलवे जंक्शन और सैन्य छावनी ने इसे एक प्रमुख सैन्य और वाणिज्यिक केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
आज भी यह शहर बुंदेलखंड का एक महत्वपूर्ण सेवा और व्यापार केंद्र है. इसकी अर्थव्यवस्था सरकारी और रक्षा प्रतिष्ठानों, रेलवे संचालन, शैक्षिक और चिकित्सा संस्थानों, खुदरा व्यापार, परिवहन तथा आसपास के कृषि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने वाले व्यवसायों पर निर्भर करती है. शहर में औद्योगिक गतिविधियों की भी महत्वपूर्ण मौजूदगी है. इसके ऐतिहासिक किले, रानी महल और अन्य धरोहर स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासन के क्षेत्र में क्षेत्रीय केंद्र होने के कारण झांसी में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के आसपास के जिलों से भी लोग आते हैं.
झांसी सड़क और रेल मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी जंक्शन यहां का प्रमुख रेलवे केंद्र है. निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा ग्वालियर में है, जो झांसी से लगभग 100 से 105 किलोमीटर दूर है. मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक नगर ओरछा झांसी से लगभग 20 किलोमीटर दूर है, जबकि दतिया की दूरी करीब 28 किलोमीटर है. शिवपुरी लगभग 100 किलोमीटर और ग्वालियर करीब 103 किलोमीटर दूर है. टीकमगढ़ की दूरी लगभग 105 से 115 किलोमीटर है, जबकि खजुराहो करीब 175 से 180 किलोमीटर दूर है. उत्तर प्रदेश में ललितपुर लगभग 90 से 95 किलोमीटर, आगरा करीब 230 किलोमीटर और कानपुर लगभग 220 किलोमीटर दूर है. लखनऊ की दूरी करीब 300 किलोमीटर, जबकि प्रयागराज लगभग 350 से 370 किलोमीटर दूर है.
यदि भाजपा उत्तर प्रदेश में अपनी सबसे सुरक्षित सीटों की सूची बनाए, तो झांसी नगर का नाम प्रमुखता से शामिल होगा. पार्टी ने लगातार तीन विधानसभा चुनावों में यह सीट जीती है और 2012 के बाद हुए सभी छह प्रमुख चुनावों में इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाए रखी है. इन चुनावों में पार्टी की बढ़त का अंतर भी काफी बड़ा रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त जरूर कम हुई, लेकिन वह कांग्रेस से काफी आगे रही. समाजवादी पार्टी अभी तक इस विधानसभा क्षेत्र में मजबूत चुनौती पेश नहीं कर पाई है.
भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं के बीच अति आत्मविश्वास से बचना होगा, लेकिन चुनावी समीकरण बदलने की मुख्य जिम्मेदारी समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष पर है. विपक्ष को ऐसे उम्मीदवार की तलाश करनी होगी, जो जाति और समुदाय की सीमाओं से आगे बढ़कर समर्थन जुटा सके. इसके साथ ही उसे मौजूदा विधायक के खिलाफ स्थानीय मुद्दों पर आधारित एक प्रभावशाली चुनावी रणनीति तैयार करनी होगी. भाजपा का मजबूत चुनावी आधार बरकरार रहने के कारण झांसी नगर 2027 के विधानसभा चुनाव में ऐसी सीट बनी हुई है, जिसे भाजपा से छीनने के लिए विपक्ष को केवल गठबंधन के भरोसे रहने के बजाय ठोस प्रयास करने होंगे.
(अजय झा)