जसवंतनगर इटावा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक तहसील स्तरीय शहर और जसवंतनगर तहसील का मुख्यालय है. यह एक सामान्य कृषि और व्यापारिक केंद्र है, लेकिन इसकी राजनीतिक पहचान शहर से कहीं अधिक बड़ी है. इस विधानसभा क्षेत्र में सैफई भी शामिल है, जो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव तथा उनके परिवार के घर के रूप
में देशभर में प्रसिद्ध हुआ. जहां जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र को अपना नाम देता है, वहीं सैफई ने इसे काफी राजनीतिक पहचान दी है, जिससे दोनों स्थान उत्तर प्रदेश के सबसे लंबे समय से कायम राजनीतिक गढ़ों में से एक की कहानी से जुड़े हुए हैं.
1957 के चुनावों से पहले गठित जसवंतनगर एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और मैनपुरी लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें पूरी जसवंतनगर और सैफई तहसील, भरथना तहसील का ताखा कानूनगो सर्किल और इटावा तहसील के पचार कानूनगो सर्किल की 10 ग्राम पंचायतें शामिल हैं, जिससे इसका स्वरूप पूरी तरह ग्रामीण है.
जसवंतनगर ने अपनी स्थापना के बाद से 17 विधानसभा चुनावों में मतदान किया है. इस विधानसभा क्षेत्र की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह है कि इसके हर विधायक यादव रहे हैं. यह सीट समाजवादी आंदोलन और अपने सबसे प्रमुख स्थानीय राजनीतिक परिवार से भी गहराई से जुड़ी रही है. अक्टूबर 1992 में गठन के बाद से समाजवादी पार्टी ने यहां जिन सात चुनावों में हिस्सा लिया है, उन सभी में जीत दर्ज की है. मुलायम सिंह यादव ने 1967 से 1993 के बीच अलग अलग समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियों का प्रतिनिधित्व करते हुए सात बार यह सीट जीती, जिसके बाद उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने सीट संभाली और लगातार छह बार जीत दर्ज की.
मुलायम सिंह यादव ने 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जसवंतनगर से चुनावी राजनीति में प्रवेश किया. 1969 में वह कांग्रेस उम्मीदवार बिशंभर सिंह यादव से और 1980 में कांग्रेस उम्मीदवार बलराम सिंह यादव से चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने 1974, 1977, 1985, 1989, 1991 और 1993 में जीत दर्ज की. उनकी पहली जीत के पीछे 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विधायक रहे चौधरी नत्थू सिंह यादव की भूमिका रही, जिन्होंने युवा समाजवादी नेता को चुनावी राजनीति में आगे बढ़ने में मदद की. मुलायम से पहले चौधरी अभय राम सिंह यादव ने 1957 का पहला चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीता था और नत्थू सिंह ने 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लिए जीत दर्ज की थी.
मुलायम सिंह यादव ने आखिरी बार 1993 में जसवंतनगर का प्रतिनिधित्व किया, जब उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार दर्शन सिंह यादव को केवल 1,161 वोटों से हराया. तब तक वह उत्तर प्रदेश में समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हो चुके थे. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया, केंद्रीय रक्षा मंत्री के रूप में काम किया और तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने 1996 में पहली बार जसवंतनगर सीट जीती और उसके बाद हर विधानसभा चुनाव में इसे अपने पास बनाए रखा.
कुल मिलाकर समाजवादी पार्टी ने यह सीट सात बार जीती है, जबकि कांग्रेस और जनता पार्टी ने दो दो बार जीत दर्ज की है. एक निर्दलीय उम्मीदवार, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल, लोक दल और जनता दल ने एक एक बार इस सीट पर जीत हासिल की है.
2012 में शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के लिए लगातार चौथा कार्यकाल जीता और बहुजन समाज पार्टी के मनीष यादव पत्रे को 81,084 वोटों से हराया. उन्होंने 2017 में कम हुए अंतर के साथ सीट बरकरार रखी, जब मनीष यादव पत्रे ने बसपा छोड़कर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और उन्हें 52,616 वोटों से हार मिली. शिवपाल ने 2022 में लगातार तीसरी बार जीत पूरी की, जब उन्हें 159,718 वोट मिले और बीजेपी उम्मीदवार विवेक शाक्य को 68,739 वोट मिले. उन्होंने 90,979 वोटों से जीत दर्ज की.
लोकसभा चुनावों के दौरान जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में भी समाजवादी पार्टी का दबदबा दिखाई देता है. 2009 के बाद हुए सभी चार संसदीय चुनावों में उसने बढ़त बनाई है. 2009 में उसने बसपा पर 54,768 वोटों की बढ़त बनाई. 2014 में बीजेपी पर उसकी बढ़त काफी बढ़कर 162,341 वोट हो गई, जिसके बाद 2019 में यह घटकर 62,126 वोट रह गई. इन तीनों चुनावों में मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे. 2022 में उनके निधन के बाद 2024 में उनकी बहू डिंपल यादव ने मैनपुरी सीट से चुनाव लड़ा. उन्हें जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में 153,697 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार जयवीर सिंह को 65,565 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी को 88,132 वोटों की बढ़त मिली.
जसवंतनगर में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद तेजी से घटने से पहले लगातार बढ़ी थी. यह संख्या 2012 में 336,058 से बढ़कर 2017 में 366,434 हो गई और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 378,304 थी. 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान यह आंकड़ा 393,411 था और 2024 में बढ़कर 403,610 हो गया. 2026 की अंतिम एसआईआर मतदाता सूची में लगभग 3.51 लाख मतदाता हैं. यह एसआईआर से पहले की सूची की तुलना में लगभग 47,194 की कमी है, यानी 11.84 प्रतिशत की गिरावट.
मतदाता मतदान विशेष रूप से विधानसभा चुनावों के दौरान मजबूत रहा है, जबकि संसदीय चुनावों में इसमें कमी की प्रवृत्ति रही है. 2012 में यह 64.21 प्रतिशत और 2017 में 63.63 प्रतिशत था, 2019 के लोकसभा चुनाव में घटकर 57.50 प्रतिशत हो गया और 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 64.98 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर घटकर 58.95 प्रतिशत रहा.
जसवंतनगर एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. 2011 की जनगणना के अनुसार जसवंतनगर तहसील की मुस्लिम आबादी 5.68 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी 24.70 प्रतिशत है. विधानसभा क्षेत्र तहसील से आगे तक फैला हुआ है, इसलिए इन आंकड़ों को विधानसभा क्षेत्र के सटीक आंकड़े नहीं माना जाना चाहिए. अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक समूहों में यादव, शाक्य, कुशवाहा और काछी समुदाय शामिल हैं, साथ ही पाल-बघेल, लोधी और अन्य ओबीसी समूह भी हैं. इसके अलावा ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण जातियां भी मौजूद हैं. उपलब्ध विधानसभा क्षेत्र स्तरीय अनुमानों में लगातार यादवों को सबसे बड़ा सामाजिक समूह बताया गया है, जिसके बाद अनुसूचित जाति और गैर-यादव ओबीसी समुदायों की पर्याप्त आबादी है.
यह विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण है, जहां लगभग 94.6 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और केवल लगभग 5.4 प्रतिशत आबादी जसवंतनगर तथा सैफई कस्बों के शहरी क्षेत्रों में रहती है.
जसवंतनगर का अपना इतिहास भी आधुनिक राजनीतिक महत्व से पुराना है. इम्पीरियल गजेटियर के अनुसार इस शहर का नाम जसवंत राय के नाम पर रखा गया था, जो मैनपुरी के कायस्थ थे और 18वीं शताब्दी की शुरुआत में यहां आकर बसे थे. बाद में यह शहर एक व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और ईस्ट इंडियन रेलवे के यहां से गुजरने के बाद इसका महत्व और बढ़ गया. 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक यह अनाज, मवेशियों और अन्य कृषि उत्पादों के व्यापार के लिए जाना जाता था. इसके अलावा यहां स्थानीय निर्माण और व्यापार भी होता था.
1857 के विद्रोह के इतिहास में भी जसवंतनगर का महत्वपूर्ण स्थान है. उस वर्ष 19 मई को तीसरी नेटिव कैवेलरी के विद्रोहियों ने शहर के पश्चिम में स्थित एक छोटे हिंदू मंदिर, जिसे बिलैया मठ के नाम से जाना जाता है, पर कब्जा कर लिया था. ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें वहां से हटाने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रयास विफल रहा और संयुक्त मजिस्ट्रेट घायल हो गए. उस समय इटावा के कलेक्टर एलन ऑक्टेवियन ह्यूम थे, जो बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में शामिल हुए. उस दौर के विवरण और बाद के स्थानीय इतिहास बिलैया मठ के आसपास की घटनाओं के साथ ह्यूम का संबंध बताते हैं, जिससे जसवंतनगर जिले में विद्रोह के शुरुआती दौर से जुड़े स्थानों में शामिल हो जाता है.
विधानसभा क्षेत्र का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है. इसके ग्रामीण क्षेत्र में गेहूं, धान, आलू और अन्य फसलों की खेती होती है, जबकि पशुपालन और स्थानीय व्यापार भी आजीविका के महत्वपूर्ण साधन हैं. जसवंतनगर शहर आसपास के गांवों के लिए बाजार और सेवा केंद्र के रूप में काम करता है. वहीं सैफई ने अपने आकार की तुलना में कहीं अधिक बड़ा संस्थागत स्वरूप हासिल किया है, जहां वर्षों के दौरान शैक्षणिक, चिकित्सा और खेल सुविधाओं का विकास हुआ है.
जसवंतनगर सड़क मार्ग से इटावा, सैफई, मैनपुरी, सिरसागंज और क्षेत्र के अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है. निकटतम रेलवे स्टेशन जसवंतनगर रेलवे स्टेशन है, जो शहर में ही स्थित है, जबकि इटावा जंक्शन लगभग 17 किलोमीटर दूर है. सैफई जसवंतनगर से लगभग 12 से 15 किलोमीटर दूर है. इटावा लगभग 18 किलोमीटर, मैनपुरी लगभग 50 किलोमीटर, आगरा लगभग 105 किलोमीटर, कानपुर लगभग 180 किलोमीटर और लखनऊ लगभग 225 से 230 किलोमीटर सड़क मार्ग से दूर है.
जसवंतनगर की राजनीतिक कहानी काफी स्पष्ट है. 1957 के बाद से हर विधायक यादव रहा है, मुलायम सिंह यादव ने यह सीट सात बार जीती और शिवपाल सिंह यादव ने इसके बाद लगातार छह जीत दर्ज की हैं. समाजवादी पार्टी ने 1993 के बाद न केवल विधानसभा सीट अपने पास बनाए रखी है, बल्कि 2009 के बाद हुए हर लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्र में बढ़त भी हासिल की है. 2022 के विधानसभा चुनाव में 90,979 वोटों का अंतर और 2024 के लोकसभा चुनाव में 88,132 वोटों की बढ़त इस राजनीतिक आधार की स्थिति को दर्शाती है.
2026 के एसआईआर ने एसआईआर से पहले की सूची की तुलना में मतदाताओं की संख्या लगभग 47,000 कम कर दी है. अभी तक ऐसा स्थापित करने के लिए कोई प्रमाण नहीं है कि इस कमी ने किसी विशेष जाति या समुदाय को असमान रूप से प्रभावित किया है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कमी 2022 में समाजवादी पार्टी की जीत और 2024 में विधानसभा क्षेत्र में उसकी बढ़त के अंतर से काफी कम है.
बीजेपी के लिए जसवंतनगर एक ऐसी विधानसभा सीट है जहां उसे अभी तक जीत नहीं मिली है और वह ऐसे राजनीतिक गढ़ में यादव परिवार को चुनावी रूप से पीछे नहीं छोड़ सकी है, जिसकी जड़ें समाजवादी पार्टी के गठन से भी पहले की हैं. उसकी चुनौती केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने की नहीं है, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक संगठन और पारिवारिक जुड़ाव को पार करने की भी है, जो यहां लगभग छह दशकों से बना हुआ है. 2027 का चुनाव यह बताएगा कि यह स्थापित राजनीतिक संबंध चुनावी रिकॉर्ड में दिखाई देने जितना मजबूत बना रहता है या नहीं. अब तक उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के आधार पर जसवंतनगर उत्तर प्रदेश के अधिकांश अन्य विधानसभा क्षेत्रों से अलग अपनी विशिष्ट राजनीतिक पहचान बनाए हुए है.
(अजय झा)