गरौठा उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में एक नगर पंचायत कस्बा और गरौठा तहसील का मुख्यालय है. बुंदेलखंड क्षेत्र में झांसी से लगभग 80 किलोमीटर पूर्व में स्थित यह आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए प्रशासनिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में कार्य करता है. कृषि यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है और यह कस्बा आसपास के गांवों के लिए बाजार उपलब्ध कराता
है.
गरौठा के नाम पर एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है. यह सीट 1952 में गरौठा-सह-मोंठ उत्तर विधानसभा क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में आई थी और 1957 में इसे वर्तमान पहचान मिली. यह जालौन लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के तहत इसमें समथर नगर पालिका बोर्ड, गरौठा और मोंठ नगर पंचायतों के साथ मोंठ, समथर और पूंछ के कानूनगो सर्किल सहित पूरी गरौठा तहसील शामिल है. इसका प्रमुख रूप से ग्रामीण स्वरूप होने के कारण कृषि संबंधी चिंताएं और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच यहां के महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे हैं.
1957 में स्थापना के बाद से गरौठा में 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस ने दशकों तक यहां अपना दबदबा बनाए रखा और नौ बार यह सीट जीती, लेकिन 1993 में अपनी आखिरी जीत के बाद उसकी पकड़ कमजोर हो गई. इसके बाद भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई. भाजपा ने चार बार यह सीट जीती है, जिसमें 1967 में उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की जीत भी शामिल है. समाजवादी पार्टी ने यह सीट तीन बार और बसपा ने एक बार जीती है.
2012 में समाजवादी पार्टी के दीप नारायण सिंह यादव ने बसपा के देवेश कुमार पालीवाल को 15,798 वोटों से हराकर अपनी सीट बरकरार रखी. उन्होंने 2007 में यह सीट जीती थी. 2017 में चौथे स्थान पर रही भाजपा ने जवाहर लाल राजपूत को उम्मीदवार बनाया और उम्मीदवार बदलने का फैसला सफल रहा. राजपूत ने समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक यादव को 15,831 वोटों से हराया. दोनों उम्मीदवार 2022 में फिर आमने-सामने आए. इस बार राजपूत ने 114,059 वोट हासिल करके सीट बरकरार रखी, जबकि यादव को 80,397 वोट मिले. इस तरह भाजपा की जीत का अंतर बढ़कर 33,662 वोट हो गया. बसपा तीसरे स्थान पर रही, जबकि कांग्रेस का प्रभाव सीमित बना रहा.
लोकसभा चुनावों के दौरान गरौठा विधानसभा खंड में मतदान के रुझान भी भाजपा के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं. 2009 में बसपा ने समाजवादी पार्टी पर 15,488 वोटों की बढ़त बनाई थी, जबकि भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी. 2014 में भाजपा आगे निकल गई और उसने बसपा पर 49,748 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में भी बसपा पर उसकी बढ़त 48,304 वोट रही. 2024 में भाजपा आगे रही, हालांकि उसकी बढ़त का अंतर कम हो गया. जालौन लोकसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार भानु प्रताप सिंह वर्मा को 97,763 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के नारायण दास अहिरवार को 82,361 वोट मिले. इस तरह गरौठा विधानसभा खंड में भाजपा को 15,402 वोटों की बढ़त मिली.
गरौठा में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 314,212 से बढ़कर 2017 में 338,712 हो गई. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह संख्या 341,995 थी. 2022 में मतदाताओं की संख्या 352,222 और 2024 में 355,583 हो गई. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 319,505 मतदाता दर्ज किए गए. यह 2024 के आंकड़े से 36,078 कम है, यानी इसमें 10.15 प्रतिशत की कमी आई है.
यहां मतदान प्रतिशत आम तौर पर ऊंचा रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 66.11 रहा, जो 2017 में बढ़कर 67.55 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 61.87 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 67.12 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 58.28 प्रतिशत रह गया.
गरौठा हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. मुस्लिम आबादी का अनुमान लगभग 4 से 5 प्रतिशत है. अनुसूचित जाति की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 30.50 प्रतिशत होने का अनुमान है. यहां की सामाजिक संरचना में अहिरवार, कोरी, जाटव, पासी और अन्य दलित समुदायों के साथ लोधी, यादव, ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी-पटेल, कुशवाहा, वैश्य और साहू व्यापारी समुदाय शामिल हैं. लोधी, यादव और दलित समुदाय यहां के चुनावी समीकरणों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं. अनुमान के अनुसार, लगभग 82.17 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 17.83 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
गरौठा ऐतिहासिक बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र का संबंध ऋषि विश्वामित्र से है. व्यापक क्षेत्र पहले बुंदेला और बाद में मराठा शासकों के अधीन रहा. 19वीं सदी के मध्य में झांसी के अधिग्रहण के बाद यह क्षेत्र ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आ गया. गरौठा को जालौन से अलग करके नवगठित झांसी जिले की तहसीलों में शामिल किया गया. ब्रिटिश शासन के दौरान यह धसान और बेतवा नदी प्रणालियों के आसपास के कृषि क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करने वाले एक छोटे बाजार कस्बे के रूप में विकसित हुआ.
कृषि आज भी स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार है. खेती, पशुपालन, कृषि व्यापार और छोटे व्यवसाय लोगों की आजीविका के प्रमुख साधन हैं. कस्बे के बाजार आसपास के गांवों की जरूरतों को पूरा करते हैं, जबकि सरकारी कार्यालय, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और परिवहन सेवाएं भी स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैं. बुंदेलखंड के अधिकांश हिस्सों की तरह यहां भी पानी की उपलब्धता, सिंचाई, ग्रामीण सड़कें, कृषि आय और रोजगार महत्वपूर्ण चिंताएं हैं.
गरौठा सड़क मार्ग से झांसी और बुंदेलखंड के अन्य कस्बों से जुड़ा हुआ है. झांसी यहां से लगभग 80 किलोमीटर दूर है, जबकि मोंठ की दूरी करीब 25 से 30 किलोमीटर और समथर की दूरी लगभग 30 से 40 किलोमीटर है. जालौन जिले का मुख्यालय उरई लगभग 100 से 110 किलोमीटर दूर है. मध्य प्रदेश का दतिया करीब 100 किलोमीटर, जबकि ग्वालियर लगभग 150 से 165 किलोमीटर दूर है. टीकमगढ़ की दूरी करीब 100 से 120 किलोमीटर है. कानपुर लगभग 200 से 220 किलोमीटर दूर है. राज्य की राजधानी लखनऊ की दूरी करीब 300 से 320 किलोमीटर और प्रयागराज की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 350 से 380 किलोमीटर है.
2009 के बाद से गरौठा का चुनावी इतिहास दर्शाता है कि भाजपा ने शुरुआत में सीमित स्थिति से आगे बढ़कर यहां मजबूत चुनावी बढ़त हासिल की है. पार्टी ने पिछले दो विधानसभा चुनाव जीते हैं और इस विधानसभा क्षेत्र में पिछले तीन लोकसभा चुनावों के दौरान भी आगे रही है. हालांकि, समाजवादी पार्टी का स्थानीय आधार अब भी काफी मजबूत है और 2024 के चुनाव में उसका प्रदर्शन बताता है कि विपक्ष यहां चुनौती पेश करने की क्षमता रखता है. एक दशक पहले की तुलना में भाजपा की स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन वह इस विधानसभा क्षेत्र को हल्के में नहीं ले सकती.
समाजवादी पार्टी को अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग से आगे बढ़कर समर्थन जुटाना होगा और लोकसभा चुनाव में हुए सुधार को विधानसभा चुनाव की मजबूत चुनौती में बदलना होगा. विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के कारण मतदाताओं की संख्या में बदलाव आया है, इसलिए दोनों पक्षों को बूथ स्तर पर अपने चुनावी समीकरणों का दोबारा आकलन करना होगा. फिलहाल भाजपा की स्थिति मजबूत है, लेकिन अंतिम परिणाम स्थानीय मुद्दों और विपक्ष की ओर से अपने समर्थकों को एकजुट करने की क्षमता पर निर्भर करेगा.
(अजय झा)