बिलग्राम-मल्लावां उत्तर प्रदेश का एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र है और यह मिश्रिख लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. वर्ष 2008 के परिसीमन आदेश के तहत गठित इस निर्वाचन क्षेत्र को हरदोई जिले के बिलग्राम और मल्लावां क्षेत्रों को मिलाकर बनाया गया था. इस निर्वाचन क्षेत्र में बिलग्राम और मल्लावां नगरों के साथ
बिलग्राम तहसील के अन्य हिस्से शामिल हैं और इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
बिलग्राम उपखंड स्तर का एक नगर है, जहां नगर पालिका परिषद है, जबकि मल्लावां ब्लॉक स्तर का नगर है और वहां भी नगर पालिका परिषद है. दोनों नगरों की अलग-अलग आर्थिक पहचान है. बिलग्राम सिरेमिक उत्पादन और कढ़ाई के काम के लिए जाना जाता है, जबकि मल्लावां में हथकरघा बुनाई की पुरानी परंपरा है और यहां तैयार होने वाला कपड़ा क्षेत्र के बाहर के बाजारों तक पहुंचता है. दोनों नगर मिलकर आसपास के बड़ी संख्या में गांवों के लिए प्रमुख शहरी, प्रशासनिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में काम करते हैं.
नए निर्वाचन क्षेत्र के रूप में बिलग्राम-मल्लावां का चुनावी इतिहास छोटा है और यहां पहली बार वर्ष 2012 में मतदान हुआ था. जहां बहुजन समाज पार्टी ने पहला विधानसभा चुनाव जीता, वहीं इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दो चुनावों में जीत दर्ज की. वर्ष 2012 में बहुजन समाज पार्टी के बृजेश कुमार ने समाजवादी पार्टी के कृष्ण कुमार सिंह उर्फ सतीश वर्मा को 7,328 मतों से हराकर सीट जीती थी.
वर्ष 2012 में बेहद कमजोर प्रदर्शन करने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2017 में बड़ा बदलाव करते हुए सीट पर जीत दर्ज की. वर्ष 2012 में भारतीय जनता पार्टी को केवल 2.54 प्रतिशत वोट मिले थे, उसकी जमानत जब्त हो गई थी और वह छठे स्थान पर रही थी. वर्ष 2017 में भारतीय जनता पार्टी के आशीष कुमार सिंह ने समाजवादी पार्टी के सुभाष पाल को 8,025 मतों से हराया. वर्ष 2022 में आशीष कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के लिए सीट बरकरार रखी और समाजवादी पार्टी के बृजेश कुमार वर्मा को बड़े अंतर से हराया. आशीष कुमार को 82,075 वोट मिले, जबकि बृजेश कुमार वर्मा को 57,185 वोट प्राप्त हुए और भारतीय जनता पार्टी ने 24,890 मतों के अंतर से जीत दर्ज की.
वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में बिलग्राम-मल्लावां विधानसभा क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा था, लेकिन इसके बाद अगले तीनों लोकसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन तेजी से सुधरा और पार्टी को बढ़त मिली. वर्ष 2009 में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर 11,437 मतों की बढ़त हासिल की थी, जबकि भारतीय जनता पार्टी चौथे स्थान पर रही थी. वर्ष 2014 में स्थिति में बड़ा बदलाव आया और भारतीय जनता पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर 53,524 मतों की बड़ी बढ़त बनाई. वर्ष 2019 में यह बढ़त घटकर 24,234 मत रह गई और वर्ष 2024 में इसमें और तेज गिरावट दर्ज की गई. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मिश्रिख से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अशोक कुमार रावत को इस विधानसभा क्षेत्र में 93,167 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार संगीता राजवंशी को 88,308 वोट प्राप्त हुए. इस तरह भारतीय जनता पार्टी को केवल 4,859 मतों की बढ़त मिली.
बिलग्राम-मल्लावां में मतदाताओं की संख्या में वर्षों के दौरान लगातार वृद्धि हुई है. वर्ष 2012 में यहां पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 3,30,129 थी, जो वर्ष 2017 में बढ़कर 3,57,744 हो गई. वर्ष 2019 में मतदाताओं की संख्या 3,65,384, वर्ष 2022 में 3,82,386 और वर्ष 2024 में 3,95,497 दर्ज की गई. मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव रहा है और विधानसभा चुनावों में आमतौर पर लोकसभा चुनावों की तुलना में अधिक मतदान हुआ है. वर्ष 2012 में मतदान प्रतिशत 64.34 रहा, जो वर्ष 2017 में घटकर 62.15 प्रतिशत हो गया. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में यह और घटकर 57.38 प्रतिशत रह गया, जबकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 61.52 प्रतिशत हो गया. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत फिर घटकर 55.55 प्रतिशत दर्ज किया गया.
बिलग्राम-मल्लावां हिंदू बहुल सीट है. मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का लगभग 15.70 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जाति के मतदाता लगभग 21.69 प्रतिशत हैं. अनुसूचित जाति की आबादी में पासी, चमार और अन्य दलित समुदाय शामिल हैं. व्यापक मतदाता समूह में यादव, कुर्मी और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य उच्च जाति के हिंदू समुदाय भी शामिल हैं. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 83.99 प्रतिशत आबादी गांवों में और 16.01 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
बिलग्राम-मल्लावां का भूभाग मुख्य रूप से समतल और कृषि प्रधान है और यह मध्य उत्तर प्रदेश के उपजाऊ गंगा के मैदानी क्षेत्र का हिस्सा है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है, जहां गेहूं, धान, गन्ना और अन्य फसलों की खेती की जाती है. पशुपालन और कृषि व्यापार भी लोगों के लिए आजीविका के साधन हैं. बिलग्राम में सिरेमिक और कढ़ाई से जुड़ी गतिविधियां स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं, जबकि मल्लावां का हथकरघा उद्योग लंबे समय से रोजगार और व्यापार का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है. दोनों नगर कृषि उपज के स्थानीय बाजार के रूप में भी काम करते हैं और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को प्रशासनिक और वाणिज्यिक सेवाएं उपलब्ध कराते हैं.
बिलग्राम का ऐतिहासिक महत्व भी है. पहले इसे श्रीनगर के नाम से जाना जाता था और परंपराओं के अनुसार 9वीं या 10वीं शताब्दी में एक रैकवार प्रमुख ने थाथेरों को हटाकर इस नगर की स्थापना की थी. बाद में 13वीं शताब्दी की शुरुआत में यह मुस्लिम शासन के अधीन आ गया और बिलग्राम के सैय्यद परिवारों से जुड़ गया. यह नगर वर्ष 1540 में हुए बिलग्राम के युद्ध से भी जुड़ा है, जिसमें शेरशाह सूरी ने मुगल सम्राट हुमायूं को हराया था. दूसरी ओर, मल्लावां का शुरुआती संबंध थाथेरा बस्तियों से बताया जाता है, जिसके बाद यहां चंदेलों और कुर्मियों का बसाव हुआ. यहां शुरुआती दौर में मुस्लिम आबादी की उपस्थिति भी रही और बाद में यह एक महत्वपूर्ण हथकरघा केंद्र के रूप में विकसित हुआ. वर्ष 1856 में अंग्रेजों द्वारा अवध के विलय के बाद मल्लावां कुछ समय के लिए जिला मुख्यालय भी रहा, लेकिन बाद में प्रशासनिक केंद्र हरदोई स्थानांतरित कर दिया गया. दोनों नगर अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ आज भी स्थानीय व्यापार और प्रशासन के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं.
बिलग्राम-मल्लावां की आसपास के नगरों और बड़े शहरी केंद्रों तक पहुंच मुख्य रूप से सड़क परिवहन पर निर्भर है. बिलग्राम हरदोई से लगभग 25 किलोमीटर दूर है, जबकि मल्लावां की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है. बिलग्राम संडी से लगभग 35 किलोमीटर और शाहाबाद से करीब 45 किलोमीटर दूर है, जबकि मल्लावां की दूरी लगभग 40 किलोमीटर है. बिलग्राम से लखनऊ की दूरी लगभग 150 किलोमीटर और मल्लावां से लगभग 145 किलोमीटर है. अयोध्या यहां से करीब 225 किलोमीटर दूर है, जबकि वाराणसी की सड़क मार्ग से दूरी लगभग 330 किलोमीटर है. निकटतम रेल संपर्क बिलग्राम रेलवे स्टेशन के माध्यम से उपलब्ध है, जहां से स्थानीय रेल संपर्क मिलता है. हरदोई रेलवे स्टेशन, जो निर्वाचन क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों से लगभग 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर है, व्यापक रेल नेटवर्क से संपर्क उपलब्ध कराता है.
चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बढ़त और वर्ष 2012 में बहुजन समाज पार्टी की विधानसभा जीत को छोड़कर, इसके बाद दोनों दल मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरने की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में रहे हैं. वर्ष 2014 के बाद से निर्वाचन क्षेत्र में हुए सभी पांच चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की है या बढ़त बनाई है. समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्ष के लिए राहत की बात यह रही कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने करीबी मुकाबला किया और मतों के अंतर को घटाकर 2.20 प्रतिशत अंक तक पहुंचा दिया.
भारतीय जनता पार्टी वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत का सिलसिला जारी रखने की उम्मीद करेगी और यह मानकर चलेगी कि वर्ष 2024 में घटा हुआ अंतर समर्थन में कमी का संकेत नहीं, बल्कि एक अस्थायी स्थिति थी. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव तक आगे बढ़ाने और बेहतर परिणाम हासिल करने का प्रयास करेगी. भारतीय जनता पार्टी को लगातार दो विधानसभा चुनावों की जीत का लाभ है, लेकिन विपक्ष ने यह भी दिखाया है कि मतों के अंतर को कम किया जा सकता है. ऐसे में वर्ष 2027 में बिलग्राम-मल्लावां विधानसभा सीट पर मुकाबला पहले की तुलना में अधिक करीबी हो सकता है.
(अजय झा)